पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४६

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४२ टीपू सुलतान टोपूके वि पधारया कर मके, वरन उन्हें, नाना- यह मन्धि ज्यादा दिन तक नही रोनिजामके साथ पाहमवीसके मात्र जो उन्हनि अभिमन्धि को थो, वह भी फिर उनका झगड़ा शुरू हो गया। १७८ तक कोहदेनी पडो। टोपून जब देखा कि, कामशः उनके निजाम और टोपू सुमासानमें परस्पर युगमता रहा था। मविकर हुए जा रहे हैं, तब वे भी कामयः उत्तं जित उत वर्षके पन्समें निजामके पास गण्ट र-मरकार समर्थन होने लग कर देनेके लिए बई माटने कमान केनामोयेको मेजा। ये अपने राज्यके पश्चिमधामो हिन्दू और मायाँको पहले कुछ रोमेको मम्भावनाईयो, किन्तु निजाम. ममन्नमान धर्म में दोषित करने लगे। कोड़गके हजागे मे गण्ट र समय ना करनेमें कुछ भी पापत्ति नहीं की। अविवामियोको पकड़ कर इन्होंने उनको दामत्व वाला- ममनिपत्तनको मन्धिके अनुसार, हैदर और टोपूने निजाम- में वह किया: सभी भौत और चकित ए। कोई भी का जितना भूभाग अधिकत किया था, निझामने उनके इनक विकह कुछ बात कहने के लिए मामो नहीं हुआ। पुनमहार के लिए अग्रेन गवर्म एटमे सेना प्रार्थना की। १७८५ में टोपून अपने गज्य के उत्तरप्रदेशों पर दृष्टि इतनसे भी मन्सुष्ट न हो कर उन्होंने टीपू सुलतान पाम हालो । उनको मेनानं बहत दिनोंसे मगठोंमे यह नौ स्वर्णाक्षरों में लिखित एक कुरान अन्य उपहार दे कर किया था : महाराष्ट्रराजको मोमान्सम्धित बदमख्यक उनके पाम एक दूस भेजा। दूतमे जा कर कहा कि दिन हिन्द-प्रजा मुसलमान धर्म में दोलित र थो, रसन्निए दिन अग्रेज लोग क्षमतायौल हुए जा रहे हैं. इसमे भागे उनका सेनादल काफी बढ़ गया · इम ममय में धमन्याग- हम अपने धर्म और मानको रक्षा भो न कर मकेंगे। को अपेक्षा प्राणत्याग करना श्रेय समझ कर बहुतसे अब परस्पर एकतासूत्र में बद्ध हो कर धर्मरचाके लिए ब्राह्मणनि अात्महत्या कर ली थी। एमसे नामाफडनवीस उनके विरुद्ध कम लोगोंको अवधारण करना चाहिये। अत्यन्त विचलित हुए थे। उन्होंने देखा कि, निजाममे सुचतुर टोपू सुलतान वैवाहिकसूत्रमें वह होकर मित्रता सहायता लेना वृथा है। टोपने जिस तरहको सेना स्थापन करने के लिए सम्मत हुए। किन्तु निजामने उनका मंग्रा को है और वह भो फरामोमो सेनानायकके हारा यह प्रस्ताव प्रयाध किया। वे नोच धरमें बड़को देने के शिक्षित हुई है, ऐसो दशाम उन पर पाक्रमण करना लिए राजी न हए । अब फिर पाम्पर घोर शव ता हो मरम बात नहीं है। नानाफड़नवोमने ग्रेजोस सहा- गई। टोपून मसलिपत्तनको सन्धिको नितान्त दोषा- यता मांगो। किन्तु मङ्गल रको सन्धि अनुसार वे वह ठहराया ; बोंकि उनमें टोपूका नाम और क्षमता मध्यस्थ रहने के लिए वाध्य थे, इसलिए नानाफड़नवोसमें खोलत नहीं हुई थी। इधर ग्न गड़के रामपुरुषोंने माहाय्य-प्रार्थो हो कर यासगिरके पास निजाम और निचय किया कि, भारतमें अंग्रेजोको शक्तिचालनाके बगरक माधोजी भोमलेसे मुलाकात की। यहां परस्परमें विषयमें अपक्षपास रहनेको अकरत नहीं इसलिए टोप टोपूके विमा युद्धघोषणा और माहिर-राज्य विभाग कर भी युबका पायोजन करने लगे। लेने के लिए एक मन्धिपत स्थिर एमा। मंगल रको सन्धिक बनुमार विवाह राज्य ग्रेजों- १७८६ ई० में टोपूने न मालम क्या मोच कर उन के प्रावित है, ऐसा स्थिर हुआ। विवाह रामने उम लोगसि सन्धिकी प्रार्थना की। १७८७ 8 में सन्धिपत्र पर समय गोलन्दाजोंसे कोरणानर और पायाकोट नाम के दो जस्ताक्षर किये गये। मराठोंका कुछ राज्य और पादमि नगर सगे थे। टीपू सन दो नगरोको मांग बैठ; उन्होंने • वापिस मिले । टोपू भौ ४५ लाख रुपये देनेके लिए राजो कहलवा भेजा कि. 'जब वे दोनों नगर मारे पावित हुए जिसमें १० लाख रुपये नगद और बाकोकं रुपये कोचीन-राजके अधिकारभुत है. तब पोलन्दाज लोग उसे एक वर्ष में देनेका निणय इत्रा । टोपूने की सहसा ऐसो विसो हालत भो बेच नहीं सकते। बड़ेलाट कर सन्धि की थी, तत्कालीन किसी भी प्रतिकाममें इसका वालिमने विवाहुरराज पक्षका समर्थन करने के लिए जिक नहीं और न टीपू हो कुछ लिख गये। किन्तु मद्राजक बाज-प्रथम हासण सावको अनुमति दो,