पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४७५

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तारामवी-तारापती विकट प्रत्येकका १ पल डाल कर मृदुपग्निसे धीरे धोरे पनन्तर चन्द्रशेखर अपनी पत्नी तारावतोको लेकर पाक करते है । सबको पिण्डो हो जाने पर उमे स्निग्ध, राजधानीको लोटे । ककुत्स्यको चिनाणदा नामको दूसरो भाण्ड में रखते हैं। भोजन करने के बाद १ तोला सेवन । एक कन्या भो जो रूपमें तारावतार समान थी, स्वय करनेका विधान है। इसमे वित्तशून, कामला, पाण्ड रोग, दामियोंको अधोखरो बन का बड़ी बहन के साथ पाई शोय, मन्दाग्नि, अशे, ग्रहगी, गुल्मोदर प्रभृति रोग जाते थौं। एनका उर्वशी के गर्भ में जन्म हुषा था। बालाकाल. रहते हैं। ( भैषज्यरत्ना० शूलाधि० ) में एक दिन महर्षि अष्टाकाको व्यग करनेसे, उनके तारामयो ( • स्त्री० ) तागया: स्वरूपा स्वरूप मयट । शापमे ये तारावतोको दासो हुई थीं। महारज चन्द्र- तारास्वरूप। शेखरने दृषहतो नदोके किनारे करवोरपुर नाम का एक तारामृग (म पु०) तारारूपः मृग: मृगशिरः। मृग- नगर बमाया था और वहीं वे बहुन दिन सुखमे रहते थे। शिरा नक्षत्र। एक दिन तारावमोहषहतो नद'में स्नान कर रही थीं, तारायण ( म०पु.) आकाश । तागरि (म. पु. ) ताराणां अरिः, ६ तत् । बिट मासिक इतनमें एक कपोत नामक ऋषको इन पर दृष्टि पड़ो और वनपरपासक हो गये। येषि प्राणिवधको नामको उपधातु। पाशङ्कासे कपोत-गरीर धारण कर विचरण कर रहे ताराततो-१ राजा चन्द्रशेखरको पत्रो । प्रावित के अन्त- गत भोगवतो नगरोंमें इक्ष्वाकुवंशोय ककुत्स्थ नामके थ, इसलिए इनका नाम कपोत ऋषि पडा गया था। एक गजा थे। भर्गदेवको कन्या मनोमाथिनोके साथ कपोतने अत्यन्त कामातर हो कर इनसे विषयभोग- उन्होंने विवाह किया था को इच्छा प्रगट को। तारावतो डर गई और मुनिको मश: १०० पुत्र हुए। किन्तु कन्या एक भो न होनमे ककुत्स्थको पत्नीने कन्या- प्रणाम कर कहने लगों "मैं चन्द्रशेखरको पत्नोई, को इच्छासे चण्डिकाको आगधना को । तीन वर्ष बाद मेरा नाम है तारावतो, मैं किस तरह मात्वधर्मको छोड़ चण्डिकाने सन्तुष्ट हो कर उनको स्वपमें यह वर दिया। मकती?" महर्षि ने कहा-"डरो मत, मैं तुम्हारे बारा कि "स्त्रीलक्षण सम्पन्बा मार्वभौम राजाकी स्त्री और सर्व लक्षण मम्पन्न महावलशानो पुत्रय उत्पन्न करूंगा, नक्षत्रमालायुक्ता तुम्हारे एक कन्या होगी।" यथासमय यदि तुम मेरो भात न मानोगो, तो मैं गाप हारा तुम मनोमाथिनोके प्रमामान्य सुन्दगे एक कन्या हुई। दानाको भम्म कर दूंगा।" तारावतोने उत्तर दिया-- टेवताके वरसे इम कन्या में स्वाभाविक ताराका चित "पाप कुछ देर ठहर जायें।' इतना कह कर तारावती था, इसलिए पिताने उसका नाम तारावतो रक्खा । घरको चलो गई और अपनी बहनसे कहने लगो--'तुम सारावतीका यौवनकाल उपस्थित देख उनके पिताने मेरे ममान रूपवतो हो. तुम्हारे मिवा पब मुझे रस वैशाखमामके प्रारम्भमें वृवचन्द्र और शुभदिनको स्वयंवर- विपत्तिम अन्य कोई भो उचार नहीं कर सकता।" सभा करके चारों दिशाओंको दूत भेजे। रम मवादको चिवादा कुछ देर तक चुपचाप खड़ो रहो, पोछे तारा- पा कर सभी राजा मभामें उपस्थित हुए, पौष्यतनय चन्द्र- वतोके आदेशानुमार मुनिके पास चल दी। शेखरगज भी नानालासे विभूषित हो कर स्वयं- चित्राङ्गन्दाके अनढ़ावस्थामें हो मुनिके औरसमे वरसभामें पधारे। सुवर्चा और तुम्बुरु नामक दो पुत्र हुए । रम तरह चित्रा. तारावतीने स्वयंवरका वृत्तान्त सुन कर चण्डिकाक नदा कपोत मुनिके पास रहने लगीं। और एक दिन मन्दिरम जा देवो कालिकाको प्राराधना की। चगिडका. तारावतो उक्त दृषहतो नदीमें मान कर रही थीं। इसी ने खुश हो कर कहा-'चन्द्रशेखर नामक महिखरावतार ममय पता मुमिन चित्राङ्गदासे पूछा-"यह पसोक- पोथतनय मनोहर रूपवान् है। उन्हीं को तुम वरमाला सामान्या सुन्दरो कोन है !" चित्राङ्गादाने डरते हुए उसर देना।' तारावतीने कालिका पादेशानुमार सभा में आ दिया-- "ये राजा चन्द्रशेखरको पनो और मेरी बड़ी कर चन्द्रशेखरकी होवरमान प्रदान की। बहन तारावती है । पुन: इस नदीमें स्नान करनेको पाई