पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४८२

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४७९ विटिताक धिनताक धमाकिटि थुनथन टेशिका-।।।।। तिम्रोट-वतमानमें प्रचलित चार पदोवाला एक ताल । इममें ३ आघात पार १ खालो लगता है। प्रथम और टतोय पदम तोन तथा द्वितीय और चतुर्थ पदमें चार मात्राए होती हैं। कभी कभी दो साई और चार स्वमात्राएं भो व्यवहत होती है। बोल माकदित् धाधा घिटिताक :: द्रुतत्रितालो-वर्तमानमें प्रचलित ८ दोघ मात्राओं का तान्न। कोई कोई इसको कव्वालो करते हैं और कोई कोई यह बतलाते हैं, कि कव्वालीसे किञ्चित् विलम्बित है। कव्वाली का विवरण देखो। धिन धा व कैटे धिन धिन धा व कट तिन ता कंटे धिन धिन धा वे केटे : : द्वितीय-(॥) तुरगलोल वा तुरङ्गालोल--१। ( ) । (।। धत्ता-(।।।।) धामार-प्रचलित है।-(।।, , ,) तृतीयताल-१ (' , )-२(1.) धोमा सिताला-वर्तमानमें प्रचलित है । यह १६ तेवरा---वत मानमें प्रचलित है । यह तीव्र ताल है। दीघ मात्राोंका ताल है, इसका दूमरा नाम है लथ- इममें ३ पद और ७ मात्राएं होती हैं। प्रथम और त्रितालो। हितोय पदमें दो दो मावाए और तोमरे पदमें तीन नन्दन-( ॥), २।(।। ॥ ) मात्राएं हैं। बोल--- नन्दिवईन--(॥।।।।) नान्दो - १ (। ।।॥॥)-२।।।। ) धा धिनि नाक धागे नागे धिन नाक:: निःश -(। ॥ ॥॥॥) तोम्बुलो-(।।, ) नि:शङ्कास्लोल--(॥॥॥॥।) त्रिपुट - (।) नि:सारक-॥ (), २ (।,।) त्रिभङ्गो-सका प्रचलन प्रायः जैनों में अधिक पाया नृप-।।।) पञ्चताली-( ) जाता है; पूजाके अष्टकादिमें ऐसे तालका व्यवहार होते हैं।- १॥ (।।॥ ॥), २।(॥ ।।। ) पश्चम - ( ) पञ्चम सवारी-प्रचलित है।--(1, ,.,.,., विभिन-१ (॥॥1), २ (। ) वास-1 ) दर्पण () पञ्चाघात-(॥॥ ॥) दीपक- ( ॥।॥), २॥ ( ॥॥) पठताल-वर्तमानमें प्रचलित दो मात्राका ताल । परिक्रम- ( ॥॥॥) दुर्वल- ।।) पार्वतीनेत्र--(।।।।।।।।।।) दोबहर-यह अब भी प्रचलित और १२ मात्रामोका पार्य तोलोचन-(॥॥॥॥॥ ) ताल है। मम तोन खालो और सम् हिमात्रा काल पूर्ण ( कहाल -( )२(४।।) स्थायी होता है। बोल- पोस्ता-प्रचलित है।-( x) प्रतापशेखर-(। ) धा धिन्नाक तरकेटे गेदे घिमि प्रतिताल-(')-२१॥ )