पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४९०

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४८६ तालपूर एक घमसान युद्ध विहा । इस युद्ध में मोरविजयको हो कार्यका बन्दोवस्त करने के लिये एक गरेज दूत वहाँ जोत हुई युद्ध के बाद गुलाम नबोके भाई अबदुल नबीखा गया, लेकिन कोई फल न निकला, मोरोंने जब कराचो- मिन्धदेश के राजा ए भोर मोरविजय उनके मन्यो बने। के अंगरेज दूमका घर छोड़ देने को कहा, तब वे उसो १७८१ ई०म मोर विजयाने शिवारपुर के समीप सिन्धु आक्र. ममय शहर छोड़ चले गये । १८०८ ई तानपूरकि मगाकागे कन्धार मेनाको परास्त किया। रमका पराक्रम। साथ अंगरेजोंको एक मन्धि हुई। धोरे धोरे अंगरेज और क्षमता देख कर अपदुम्न नवो बहुत जल उठे आर लोग अपनी गोटो जमाने लगे। उन्हान मारविजयको मरवा डाला । १७८८ ई में यह कावुलमें जब लड़ाई विडो थो, तब अमोरोने अंग- घटना हुई थो । नारको प्रबटुल नवीन भयभीत हो कर रेगको पच्छा सहायता न की यो। एमी विखास- गज्य छोड़ खिलातमें जा कर पाश्रय लिया। मोर- घातकता के कारण हटिशगवम गट मिन्धराज्यको हस्त विजयके पुत्र अबदुलावा तानपूरने मोर फतरखॉके माथ गत करने के लिए अग्रसर हुई । उस समय तालपुर लोगों में मित्रता करके मिन्धु शून्य-सिंहामनको हथिया लिया। गृहविवाद जोरोंसे चल रहा था। उन्होंने अन्त में प्रग- अवटुल नवोने फिरसे सिन्धगजको पान के लिए बहुत रेजोंके साथ इस शर्त पर सन्धि कर लो, कि वे उन्हें कोशिश को तथा जहां तक हो सका अपनी चान्न लगाई, वार्षिक कर दिया करेंगे। किन्तु चाल्स नेपियरने पर कोई फल न हा। पोछ उसने बहुत हीनवृत्ति हारा दशको पच्छी तरह अपने दखलम लानको इच्छा रखते अबदुम्न खाँ तालपुरको मरवा भी डाला, तो भो उसका' हुए नये नियमसि सन्धि करनका प्रस्ताव पेश किया। उद्देश्य मिह न हा । मोर फते पन्लोग्वनि उसे पुनः मिन्धु अन्तमें ग्राहकलहमें नियुक्त होनम त तालपूर लोगोंके देशमे निकाल भगाया। फते अनोखॉन मचेष्ट हो कर साथ हटिशगवण्ट को लड़ाई छिड़ हो गई। युहमें कन्धारके शामनकर्ता जमालशाहसे एक सनदपत्र ग्रहण तालपूर लोग हार गये और उनके राज्यशासनका किया, जिसमें सिन्धुराज्यका शामनभार तालपूर लोगों के अस्तित्व मदाकै लिये जाता रहा। हाथ पाया, एमा लिखा था। फतह अलोखामे हो तासपूरोका कहना है, कि हमीमके पुत्र मोर हमजा तानपूरवंश लोग उबतिकी चरममोमा तक पहुंच उनके आदिपुरुष हैं। ये लोग अरब-जातोय बलोची- गये थे। शाखासे उत्पन्न हुए हैं। इनके मोर शाहदादखॉ नामक १७८३ ईमें मोर फतेभलोग्वा सिन्धक मिहामन एक दूसरे आदिपुरुष थे, जिन्होंने अपने चाचासे मनामा पर बैठे। उनके पुत्र मोर फरोखाँ गाहबन्दरमें भोर लिन्य हो जाने के कारण कलहोरा-राज मियों सहलके मौरमाहबखोरोहरो प्रदेशमें शामन करने लगे। अधीन नोकरो को था और सियाधमको अवलम्बन किया कालपूरव श साधारणतः ३ शाखाओं में विभक्त है,। था। उनके माथ प्रनिक बलोचो सिन्धुदेशर्म पाये थे। पाति- ( १ ) हैदराबाद ( या शाहदादपुर ), (२) मोरपुर, (३) । यता और अभ्यागतको प्रवर्थ नाके लिए तो तालपूर- ग्वैरपुर (या सोहरवाना)। पहलो शाखा मध्यसिन्धु प्रदेशों- वंशीय राजा बड़े प्रसिद्ध थे, किन्तु वे इतने पढ़े लिखे में, दूमरो मोरपुरमें और तोमरी खेरपुरमें बाम करतो न थे। वरपुरके तालपूरगण अपनी सेनाको यथेष्ट घो। हैदराबादसे कुछ दूर जूदबाड़ नामक स्थानमें ताल- जागोर देते थे। ये लोग बड़े मितव्ययो थे, किन्तु घोड़े पूरव शोय अधिक संख्यामें रहते थे। हैदराबादके तथा अस्त्र शस्त्र खरीदते समय मितव्यताको पोर ध्यान सालपूर लोगोंको सभी शाखाए अक्षा और सम्मान को नहीं देते थे। शिकार खेलने में भी इनका प्रचुर अर्थ निगाहमे देखती थी। उनकी सलाह निये विवा कोई खर्च होता था। सालपूर शासनकर्ता किसो गुरुतर काममें साथ नहीं सालपूर मीरगण बहुमूल्य लुङ्गो तथा कश्मोरो शाल : डाल सकते थे। पहनते थे। सिन्धुदेश में पाज कल जेसो टोपोका व्यव- १९६८ में सालपूरव शीय मोरोक माथ बाणिज्ध हार है, वे लोग उसी तरहको टोपो पामते थे। इनकी