पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४९९

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ताश पाता है, उसमें गणलोलाको हो अधिक । धेरै है। शेष ताशमें सिर्फ वर्माहतके पुरुषों के हो विव ससबोरे है। थे। (७) नौपति-राजा जहाजके अपर सिंहासन पर इस खेलको उत्पत्ति किस देश में पौर किम समय में | बैठे हैं और चौको पर जोर । फुटकर सायोंमें नावको हुई, इसका पता हमलोगोंको इसोमे लग जायगा, कि ससवोर रहतो थौं । (८) स्त्रोपति-प्रथम ताशमें सिहा विलायतमें रायेल एशियाटिक मोसाइटो नामको एक सनके उपर रानो और दूसरे में वजोरको स्त्री चोको पर म्साएब्रगे है जहां हजार वर्ष पहले का एक जोड़ा ताश बैठी रहतो थौं। दूसरे दूसरे ताणों में भी स्त्रोको तसवारे मिलता है। किन्तु वह साथ एक हजार वर्ष पहलेका थो। (८) देवपति-पहले ताशमें इन्द्र सिंहासनके जर है. रसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। भारतवर्ष के भोर दूमरेमें उनके मन्त्रो चौंको पर बैठे रहते थे। शेष जिस ब्राह्मणसे यह ताश खरोदा गया था, उमने कहा | ताश देवतापोंको तसवोगेसे चित्रित रहते थे। (१०. था, कि यह हजार वर्ष पहलेका है। पसुरपति-दाजद के पुत्र सुलेमान मिहामन पर और वोर ___सर विलियम जोन्स लिख गये हैं, कि भारतवर्ष में चतु | चोको पर बैठे रहते थे ; और मन ताशाम देयोको तम. राजी नामक एक खेल बहुत दिनोंसे प्रचलित है। प्राईन वोरे रहतो थीं । (११) वनपति-पहले ताश, पशराज ए-अकबरीमें अबुलफजलने कहा है, --"प्राचीन ऋषिोंने | मिहका और दूसरे में चौताका चित्र और शेष दश साशोंमें स्थिर किया था, कि ताशके कुल बारह रंग हो, और बरह जङ्गलो पशुओं को प्रतिमूर्ति रहतो था । (१२) अहिपति- रंगों के बारह बारह ताशी : पर वे प्रत्येक रंग भित्र मकरके अपर सर्पराज और मयं के ऊपर वजार बैठा भित्र बारए गजा नहीं मानते थे।" रहते थे । दूसरे दूमरे तामि माँ के चित्र रहते थे। अकबरके समयमें भारत वर्ष में जो नाश प्रचलित प्रथम छः रंगोंक ताश को "विशवर" अर्थात् विशबल थे, उनके रंगों के नाम भिव थे : जैसे, (१) अश्व- या "अधिकबल" पोर शेष छःको "कमवर" अर्थात् कम- पति-यह मबसे प्रधान रंग था। ताशके अपर | बल या "अल्पबन्न" कहते थे। बादशाह अकबरको तमोर घोडे पर बादशाह अकबरने ताशौमें और भी कई प्रकार परि- बनी रहती थी। उनके हाथमें छत्र और पताका शोभित न किये थे, जैसे-धनप्रति धनदान कर रह है, बजार थो। बाद दहलासे ले कर एका तक के पत्ते घोड़े को भण्डारको खवर ले रहे हैं। शेष दश ताशोंमें राजकोषमें तसवीर पर चित्रित थे । (२) गजपति-इसमें ताशकं पहने नियुक्त प्रतिमूर्तियां थीं यथा -जौहगे, धातु गलानेवाला, पतं पर उड़ोमाके राजाको तसवीर हाथो पर बनो । रुपया मुहर आदि काटनेवाला, वजन करनेवाला, होती थी। उनके वजीरको तसवीर भी उमो तरह थी। छाप देनेवाला, मुहर गिननवाला, 'मान' नामक मुद्रा बूटियोवाले ताश हाथी पर छपे रहते थे। (३) नरपति- गिननेवाला, पोद्दार तथा धातु पीटनेवाला रहता इममें बीजापुरके राजा मिहासन पर बैठे थे, पाम हो था । एक ओर प्रकारके ताशमें बादशाह अकबरन भूमि- उनके वोरको भो तसवोर थो, और सब ताश पदाति दाता राजाओं की तमवीरें दी है। उनके मामने फर- सैन्यके चित्रोंसे चितित रहते थे। (४) गढ़पति-गढ़के अपर मान, दानपत्र, टपतरके कागजात रखे हुए है। नोचे सिंहासन पर बैठे हुए राजाको तसवीर और गढ़के | वजीर बैठे हैं और सामने दफतर है। अन्यान्य खुचग अपर वजीरको तसवोर रहती थी । (५) धनपति-राज सागों में गजस्व सम्बन्धीय कर्मचारियों के चित्र है, यथा- सिंहासन पर बैठे हैं, सामने अर्थराशि है और कागजी, कागज पर रूल ग्वींचनेवाला, दफतरके कागज बगल में वजीर बैठ कर राजकोषका हिसाब कर रहे हैं: । पर लिखनेवाला, कागज पर सुनहरो रुपहरी काम करने शेष पत्तों पर मोने और चाँदीसे भरे हुए घड़ोंको तस. वाला, नकमा खोंचनेवाला, सोने के जल और नोन रंगसे वीरें रहती थौं । (६) दलपति-वर्माहतके राजा सिहावा खोचनेवाला, फरमान लिखनेवाला, खाता बांधनेः सन पर बैठे हुए है और चारों पोरसे वहांके लोग उन । वाला तथा रगरज। फिर एक प्रकारके ताशी अकबर