पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५०९

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चौथमान वा वर्षमान चन्द्रालाका विस्तार करता, चन्द्रकी प्रथम बलाको पनि, हितोय कलाको रवि, उस कालविशेषका नाम ही तिथि है। पाधारस्वरूपा तोयको विश्वदेव,चतुर्थ को सलिलाधिप, पक्षमको वषट महामाया जो देहियोंकी देहधारिणो हो कर पवस्थित कार, षष्ठको वासव, सनमको ऋषिमण्डल, पष्टमको . तथा जो चन्द्रमण्डल के षोड़शभाग परिमित चन्द्रको पजेकपाद नवमको यम, दशमको वायु, एकादपको देहधारिणी पमा पोर महाकला नामसे प्रसिद्ध नित्य । धमा, हादश को पिटसकल, बयोदशको कुधर, चतुः पोर पयोदयरहित है, उनका नाम भो तिथि है। ऐसी दंगको पणपति और पञ्चदश कलाको प्रजापति पान तिथिया दो भागोंमें विभक्त र शुक्ला और माणा।पमा- करते है। समस्त कलाए जब पोत हो जाती है. तब वस्या के बाद प्रतिपदासे पूर्णिमा तक और पौणिमामोके चन्द्रमगडन बिलकुल दिखाई नहीं देता। जो षोड़श बाद प्रतिपदासे प्रमावस्या तक. पन्द्रह पन्द्रह दिनोंका कलाएं मर्वदा जलमें प्रविष्ट होती है तथा प्रमा एक एक पक्ष होता है। इस प्रकार भदसे चन्द्रकी शाम- सोम ओषधिको प्राप्त होती है तथा पोषधिगत और पम्बु. वृद्धि हुमा करतो है। स्मात भट्टाचार्य ने इस प्रकार गत होने पर उनको गो पाम करता है, वह गोसम्म त लिखा है-"वृद्धिकरः शुकः कृष्णचन्द्रक्षयात्मक अर्थात् जोरसमूह पमृतस्वरूप है, हिजाति हारा मन्नपूत हो जिन पन्द्रह दिनों में चन्द्रको वृद्धि होती है, उस पक्षको कर यज्ञोय पग्नि में हत होता है, उससे चन्द्रमा पुनः साल कहते है और जिन पन्द्रह दिनों में चन्द्रका काम वृद्धिको माल होता है। इस तरह दिनों दिन क्षिप्रान होता है. उमको कृष्णपक्ष करते है। चन्द्रमासमें हो कर पूणि मामें वह पूर्ण ताको प्राप्त करता है। पहले शुक्लपक्ष और पोछ लष्णपक्ष व्यवहात होता है। सिहासशिरोमणिके मतमे चन्द्र सूर्य से विनिःसूत मभी तिथियां प्रायः ३० दण्ड परिमित है। सूर्य मण्डलसे हो कर पूर्व को भोर गमन करता है। विनिम्मत हो कर चन्द्र जो विशागात्मक राशिक हाय अमावस्या के दिन शोघ्रगामो चन्द्र सूर्य मगडलके अधः- भाग तक गमन करता है, वही एक एक निधि है, पदेशमें पोर मध्यगामो सूर्य चन्द्रमण्डल के जई प्रदेश में राशिका परिमाण १५० दण्ड है, सुतरां उसके २० भागके रहता है। सूर्य को मम्म र्ण किरण चन्द्र के उपरिभागमें १२ भागमें हो६० दण्ड हुए, इस तरह दण्डही एक पड़तो, निम वा पाखें किसी भी तरफसे नहीं निकल एक तिथिका परिमाण है। जिसका नाम पमा है और मकतों। चन्द्र के उपग्भिागमें पतित हो कर उसी तरह जो क्षयोदयवर्जित, ध्रुव, षोडशीकला है, वह काल ही अवस्थित रहतो है, पम तरह चन्द्र पोर मूर्य के गति- समान्यत: तिथि है। विशेष के कारण तथा सूर्य रश्मियोंके सम्पूर्ण पभिभूत . हविक्षययुक्त पञ्चदशकलारूप जो कालविभाग है, येही होने के कारण चन्द्रमण्डल जरा भी दिखाई नहीं देता। पन्द्रह तिथियां है। वह प्रादि पन्द्रह देवता उक्त पन्द्रह पोछे चन्द्र शीघ्रगसिके द्वारा सूर्य से बिनिःसृत हो कर कलाको क्रमसे पाम करते हैं। जैसे-वक्रि देवता पूर्व दिशाको गमन करता है अर्थात् विशत्-पंश युक्त प्रथम कलाको पान करते हैं, इसलिए उनका नाम प्रथम राशिम हादश शहारा सूर्य का उमान कर है एव सदुत कामविशेषका नाम ही प्रतिपद है। गमन करता है । अतएव उस समय चन्द्र के पञ्चदश इसी प्रकार हितोया पादिके विषयमे ममझना भागों में प्रथम भाग दर्शमयोग्य होता है। सूय की चाहिये। इस तरह कलाएं जब पीत होतो है, तब किरणे उस प्रथम भागमेंसे निकलतो हैं. इसीलिए अष्णपक्ष होता है। और तदनुसार प्रथम कला, द्वितीय चन्द्रको उस प्रथम कलाको सब देख नहीं पाते मोर उसो काला होती है एवं तदुता वाली प्रतिपदा हितीया कलाको प्रथम कला कहते हैं। जा कसानिष्पत्ति परि. इत्यादि कहलाता है। इस प्रकारसे जब समस्त कलाएं मित कालको हो नाम तिथि है। हितोया पादिमें भो चन्द्रमणसको पूर्ण करती है, तब उस समय का नाम इसी तरह समझ लेना चाहिये। . . समापन होता है। · चन्द्र पौर सूर्यको गतिक बारा जिस समय कालका Vol. Ix. 127