पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५१५

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पलाया , किन्तु ऐसा हो नहीं सकता।बोकिसूर्य के "बामशोक हरामी मामासामुभम । समस वपात पवमानसे प्रमावस्या होती है। ज्योति: पियामि शोकसन्तप्ता मामशोकं सदा ६० ॥" शास्त्र में ऐसा नियम है। यहां मानना पड़ेगा कि सूर्य कामी देगे। हादश मासमें हादश राशियोंमें भ्रमण करता है। यदि नवमी-प्रष्टमोयुक्त नवमो पार, बोचि पष्ठमोके ऐसा हो, तो भाद्रमासमें जिस राशिका भोग करता साथ नवमीका मादर होता. भाद्रमासको पात है, पन्य मासमें इस राशिका भोग किस तरह कर सकता महानवमोमें बोधन तथा कल्यारम्भ किया जाता .? पतएव बारह महोने रोहिग्यीयुक्त पष्टमौका होगा। है। रस नवमोको बोधनमवमो करते है। यदि उस दिन नितान्त संभव है। पा नक्षत न हो, तो तिथिमाहात्म्य के कारण उस दिन दूर्वाष्टमी -भाद्र मासको शतपक्षोय अष्टमीको दूर्वा- कार्य करना होगा। रामो कहते है। यह पूर्व युक्त प्राध। कातिकको लापक्षोय नवमोको प्रयाने पण्डी-पूजा महाश्मी-पाखिन मासकी शमाष्टमीको महाष्टमी को थो पोर वह दिन युगका प्रधान दिन था, इसलिए कहते हैं। इसमें दुर्गा-पूजा पोर उपवास करें। पुत्रवान उस दिन चण्डोपूजा की जातो है। व्यक्षिके लिए उपवास नहीं है। खियोंमें सभी कर सकती माघमासको तानवमीका नाम है महानन्दा, उम .; दूसरे दिन पारण करना चाहिये। सास कोटि दिन स्नानादि करनेसे उसका फल पक्षय होता है। एकादशी पालनेसे जितना फल है, माष्टमोके उपवास बोरामनवमी-पेबमासको पुनर्वसनजनयुत पला- करने पर भी उतना हो फल मिलता है। मामीका नवमी के दिन भगवान ने रामक रूपमें जन्म लिया था, व्रत नवमीयुक्त होने पर ही करें। इमलिये उता तिथिका नाम रामनवमो पड़ा है। कोटि ___गोपाष्टमी-कार्तिकको शक्का मष्टमीको गोपाष्टमी सूर्यपहर कालको तर उस दिन जो कुछ किया जाता है, उससे अक्षय फल प्राप्त होता है। कहते हैं, उस दिन गो-पूजा, गोग्रासदान और गवानु. __ णयों के लिए अष्टमीविधा रामनवमोका मानना गमन करनेसे महापुण्य होता है। उचित महौं पर्थात् विष्णु परायण व्यक्ति को दशमीयुत पष्टका-अग्रहायण, पौष पौर माघको जणाष्टमोको होने पर उपवाम पादि करना चाहिये । उपवासके रुप पष्टका कहते हैं । अग्रहायणमामको जणाष्टमोका नाम रान्त दशमोको पारण करें, यदि दूसरे दिन दशमी महो पूपाष्टका है, उस दिन पिष्टक बारा पितरोका बाह किया एकादयो हो, तो पाष्टमौविधा हो माधारण उपवास जाता है। पौषमासको लवाष्टमीका नाम मांसाष्टका है उसमें पितरीका मांस हारा थाह होता है। माघमास- __दपमो-पोय दशमो एकादशीयुत पोर माण की मष्णाष्टमीको शावाष्टका करते हैं, उस दिन शाक पक्षीय दशमो नवमीयता ग्रहणीय है पर्थात् उपवास और हारा पितरोंका बाद किया जाता है। देव-पव-कर्म में उक्त प्रकार प्रसिह । भीमाष्टमी-माघमासको शलाष्टमाको भीमाष्टमी दशहरा-ज्येष्ठ मासको शुक्लपक्षीय दशमोको दशारा करते स दिन चारों वर्णीको भोमका तर्पण करना कहते है। इस दिन गङ्गासान करनेसे दयविध पापोका पड़ता है। तर्पण देगे। चय होता है, इसलिए उसका नाम दशहरा पड़ा है। पशोकाष्टमी-चैत्रमासको हमाष्टमीका नाम ज्यमासकी शक्लपक्षीय दशमोमें यदि स्तानचत्र भयोकादमी है। इसमें ८ अशोक कलिका पाई जाती है योग हो. तो गङ्गाखान मात्रसे दध-जनजात पाप नष्ट हो तथा शानदानादि करनेसे मोकने छुटकारा मिलता है। जाते। सोषित जल में स्नान परमाको विषय है। . विनबादयमी-पाखिनको सलादयमीका नाम विजया- पोकाकालिका भवच करनेका मन्च-. . दशमी।। या दशमी तिषि उदय प्रयस्त है। इस