पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५१६

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दशमी में देवीका विसर्जन होता है। यह पायकोने हादशी और राविक शेष बादशोका चय हो और वो पर अमाधा दशी हो, तो पूर्णाको ग्रहण करना चाहिये । वारण ऐसे ___ एकादशीके साथ यग्मादर होनेके कारण परयन स्थल पर पारपयोग्य समय नहीं मिलता। यदि पूर्व- पर्थात हादयोयना एकादयो हो प्रशस्त है। दोनो पक्ष दिनमें दशमीयुक्ता एकादयो हो तथा दूसरे दिन बादशी. को एकादशो में गृहस्थ, यति, ब्रह्मचारो और माग्निक युक्ता, पर्थात् पूर्वेदिनमें यदि १५ दगड़के उपरान्त एका. मभीको उपवास करना चाहिये। किन्तु पुत्रवान् परस्य दशो हो और दूमरे दिन पारणयोग्य समय तक हादयो कणपक्षम उपवाम न करे । शयम और बोधन के मध्य जो रहे बा न रहे, तो भी दामोयुक्त एकादयोको छोड़ देना कृष्णपक्षीय एकादशो पड़तो है, उसमें पुत्रवान् गृह. चाहिये। स्थको भी उपवाम करना पड़ता है। इसके मिवा अन्य । दशमोविशा एकादशो कभी भी न करें। यदि सूर्यो- सभापक्षीय एकादशोमें उपवास न करे । पुत्रवती मधवा दयके वाद अल्प समय तक दशमी, पीछे एकादशो पौर स्त्रोको तो कोई भी उपवास करना उचित नहीं । उप उसका क्षय हो कर हादशो हो तो शुद्ध हादशीमें ही वाम करनेमे म्यामोको पाय क्षय होती है। किन्त उपवास करके त्रयोदशोको पारण करें। इस प्रकार स्वामोको अनुमति लेकर उपवास कर मकतो है जो एकादशो करनेमे शत यज्ञ का फल होगा। किन्तु ऐसा नारी विधवा हो, उमको दोनों पक्षों में एकादशोप्रत करना होना अत्यन्त दुर्लभ है। चाहिये। यदि न करेगो, तो उसके ममात पुण्यादिका यदि एकादशी षष्टिदण्डात्मिका दूसरे दिन न रहे नाश होगा भोर भ ग हत्याजनित पात लगेगा। और हादशो पा जाय तो हादशोके एक पदका परित्याग वैष्णवोंके लिए शुक्ल और लष्णपक्षके कारण एकाट करके पारण करें। कारण, हादशीका प्रथम पाद एका. शो में कुछ प्रभेद नहीं है। जो व्यक्ति रस प्रकारसे ममान दशो व्रत नित्य है, इस कारण अशौचादिको प्रतिबन्ध- जान रखता है, वही वैष्णव है। विष्णुमतिपरायण कता होने पर भी व्रत भङ्ग नहीं होता । वैषणावोंको भक्तियुता हो कर प्रत्ये क पक्षमें एकादशोका। यदि एकादशोके दिन स्त्री रजस्वलादि कारणों से उपवास करना चाहिये। इनमें ग्रहस्थ पुत्रवान् है। अण्ड हो, तो वह स्वय' उपवास करके दूसरे के द्वारा रमका भो कुछ भेद नहीं। विष्णुभक्त के लिए एकादशी पूजा पादि करावे । एकादशी न कर सके तो उसके अनुः नित्यव्रत है। विष्ण को प्राप्ति के लिए एकादशो उनका कल्प है, उपवास करने में असमर्थ व्यक्ति यदि फल-मुन नित्य कत्तव्य है। वा जलाहार करे वा एक बार इविष्य वा विष्ण का नैवेद्य ब्रह्महत्या आदि जो पासक हैं, वे एकादशोके दिन खावे, तो वह प्रत्यवायो नहीं होगो। और उपवास अबका पाश्रय ले कर वाम करते हैं; अतएव उस दिन करने में यदि बिल्यास हो असमर्थ हो तो एक ब्राह्मण- पबभक्षण करनेसे उक्त समस्त पाप गरोरका प्राय लेते को जिमा दे वा भोजनसे दूना मूल्य दे देवे। हैं। इस लिए एकादशोके दिन अब न खाना चाहिये। इस जगह विशेष नियम यह है कि विष्ण शयन, पोर ८ वर्ष से लगा कर ८० वर्ष तक एकादशीका उप- पाखें परिवर्तन पोर उत्थामको एकादयो में उपत नियम वास करना चाहिये। लागू नहीं होंगे। एकादयाका व्यवस्खा। पूर्ण एकादशी प्रथोत् षष्टि- भगवान्ने स्वय कहा है, कि मेरे शयम, उत्थान पौर दहामिका एकादशोका परिवाग करना चाहिये। यदि पार्श्व परिवर्तनको एकादपी में जो फल-मूल पोर जल. हितोय दिन कुछ ममय तक एकादशी हो, तो पूर्ण एका मात्रका पाहार करेगी, वह मेरे दयमें शब निक्षेप दोको छोड़ कर दूमरे दिन उपवास करना चाहिये। करेगी। इसलिए सभोको न एकादपियों का पालन और यदि बादशीमें पारगायोग्य समय न मिले प्रर्थात् यदि करना चाहिये । भोम एकादशौक विषयमें भी ऐसा हो पूर्व दिन द. दण्ड एकादशी, दूसरे दिन १ दह फिर नियम है।