पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५१८

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५१४ तिथि उसमें यदि मघामचनयुक्त लष्णा त्रयोदशी पड़े, तो उम- चतुर्दशो त्रयोदशीयुक्त होने पर ग्रहणीय है। मण को गजच्छायायोग कहते हैं । उममें सत्ता बारके करनेमे पक्षकी अष्टमी और चतुर्द शोमें उपवामादि कार्य में पर. पूर्वापेक्षा फल अधिक होता है। इसमें विभा अविभक्त विधाको छोड़ कर पूर्व विधाको ग्रहण करना चाहिये। का भेद नहीं है, अर्थात् ज्येष्ठ-कनिष्ठ सभी कर ज्येष्ठको अष्णा चतुर्दशीका नाम सावित्री चतुर्दशी मकते हैं। है। उस दिन अवैधवाको कामनासे स्त्रियोंको श्रद्धा ___ जमे वार्षिक एकोद्दिष्ट यापम ज्येष्ठ कनिष्ठका भेद भोर भक्तिव क मावित्रोव्रत करना चाहिये। यह नहीं है, इसमें भी वैसा ही है । इस श्राधमें पुत्रवान व्यक्ति- अनन्तचतुर्दशोको भांति १४ वर्ष पाला जाता है। को पिगडदान न करना चाहिये। जिम श्राइमें पिगड. सावित्रीवत परविडा तिथिमें करना चाहिये। यदि दानका निषेध है, उममें स्वधावचन ( "म्वधा वायिर्थ") दोनों दिन व्रतका समय हो, तो दूमरे दिन व्रत करें और का पाठ कर पवित्र मोचन न करना चाहिये। किन्तु यदि दोनां दिन प्रदोषक ममय चतुर्दशो पड़े तो भी इममें अग्निदग्धका पिड देना पड़ता है। दूमरे दिन व्रत करना उचित है। व्रतका समय प्रदोष वारुण-चैत्रमासको शतभिषानसत्रयता रुष्णा त्रयो अर्थात् रजनोमुखका समय है। दशीको वारुणो कहते हैं। इसमें गङ्गासान करनमे शत- "चतुर्दश्याममावस्या यदा भवति नारद । सूर्य ग्रहणकालीन गङ्गाखानका फल होता है। इसमें यदि उपोष्या पूजनीया सा चतुर्दश्यां विधानतः ।। (ज्योतिष) शनिवार-योग हो, तो उसको महावारुणी कहते हैं। भाद्रमासको कणपक्षोय चतुर्दशोको अघोरा चतु- उस दिन खान करनेसे कोटि-सूर्य ग्रहण कालीन मान दशौ करते हैं। इसमें शिवपूजा और उपवास करनेसे का फम्न होता है। यदि शनिवारमें शतभिषा नक्षत्र शिवलोक को प्रालि होतो है। शम योग के माथ मंयुक्त हो, तो उमको महामहावारुणी ____भाद्रमासको शुक्लाचतुदशीको अनन्त-चतुर्दशी कहते कहते है । उस दिन गङ्गाम्नान करनेसे सोन कोटि कुल- है। इस चतुर्दशोमें व्रत करनेसे मर्व काम और सर्व का उदार होता है। इस जगह फाला नका मुख्य चन्द्र फनका लाभ होता है। अनन्तवृतके निमित्त पूजा और चेत्रका गौणचन्द्र होने पर भी स्नानके मंकल्पमें होमादि करना चाहिये। यह व्रत पूर्वाह्नकालमें न हो चैत्रका उल्लख होगा। सधवा स्त्रीको वारुणो में स्नान सके, तो मध्याह्नकालमें भी व्रत सिद्ध होता है। म करना चाहिये तथा मामान्य शतभिषाम ( अर्थात् चतुर्दशी देखे।। पूर्वोक्त प्रकार योगादिके बिना मिले जो शतभिषा हो उसमें कार्तिकको कषणपनीय उदयगामिनो चतुर्दशीका भो स्नान करना ठीक नहीं । शतभिषा नक्षत्रयुक्त चन्द्र- माम भूत-चतुर्द शो है। उम दिन गङ्गास्नान, होम और में जो स्त्रो स्नान करती है, वह निश्चयमे मात जन्म तक तर्पण किया जाता है। अपामार्ग के पत्ते मस्तक पर विधवा और सभागिनी होती है। वारुगोमें स्नानके फेरे और प्रदोषमें दोपदान करे। उस दिन दोपदान लिए दिन रातका विचार नौं, अर्थात् चाहे दिन हो, करनेसे नरकसे उदार होता है। और यमतर्पणके जो चाहे रात्रि वा संध्या हो, जन्म तिथि और नक्षत्रका ममा- मन्त्र हैं, उन मन्त्रोंको बोल कर एक एकके लिये तिलक गम हो. तभो स्नान करना चाहिये । उस दिन ग्रहस्थित साथ तीन बार जन्न चढ़ावें। गाजलमे स्नान करने पर भी प्रखमेधका फल होता है। अपामार्ग पाव फेरनेका मन्त्र- चैत्रमासको त्रयोदशोमें मदनकी पूजा की जाती है । "शीतलोष्णसमायुकसकण्टकदलान्वित। चवमासको एक्ला त्रयोदशीमें जो मदनको पूजा करके हर पापमपामार्ग भ्राम्यमानः पुनः पुनः॥" व्यजन करता है, उस पर वर्ष भर कोई विपत्ति नहीं . अग्रहायण मासको वाणा चतुर्दशीको पाषाणचत- पड़तो। दशी कहते है। उस दिन रात्रिको गौरीको पूजा करके चतुर्द यौ-गला चतुर्दशो पूर्षि मायुत और साचा पाषापाकार पिष्टक भक्षयपर्वक व्रत करें।