पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५२०

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तिथि तो निशोथव्यापिनी मिश्रिमं अर्थात् पहले दिन कोजागर तो बाइके दूमर क्षणमें दिनको हो उल्कादान करें। सत्य होगा। काति क को पुर्णिमा गमयात्रा और मन्वः पहले दिन दोष समयमें अमावस्याका योग हो कर सरा होतो है। दूसरे दिन बाद काल प्राप्त हो, तो पहले दिन प्रदोष पोषमाम की पूर्णिमा के बादमे माघमामको पूर्णिमा तक ममयमें उल्फादान करके दूसरे दिन थाड करें और दोनों प्रति दिन यथानियम विष्णुको पूजा करें और उम ममय दिन अगर प्रदोषकालमें अमावस्या प्राश हो, तो दूसरे तक मूलो न ग्वा । माघमाममें मूलो खानसे ज्यादा दोष दिन करना होगा । ( तिथितत्व ) . लगता है। प्रतिरदादि तिथियोंमें जन्मफल । फाला नको पूर्णिमाका नाम दोन-पूर्णिमा है । इसमें प्रतिपदामें जन्म होनेसे मर्वदा नाना रत्नोंसे विभूषित, याकरणको दोलयात्रा करें। दोल देखो। मनोहरकान्तिविशिष्ट, प्रतापगालो और सूर्य विम्बके समान अमावस्या-अमावस्या प्रतिपयुक्त होने पर हो ग्रह- अपने कुलरूप कमलका प्रकाग-वरूप हा करता है। गोय है । भादमामकी अमावस्या को महानया कहत हितोयाका फल-हितोयामें जन्म होनेसे वह निग्विल है। उम दिन विहित पार्वण श्राद्ध और पोडश पिण्ड गुणयुक्ता, अतिशय श र, अपने कुमुदकुलके लिए चन्द्रमा- दान किये जाते हैं। मदृश, विपुलकोतिशाली और अपने भुजबल हारा कातिकको अमावस्याको टोपान्विता अमावस्या करते अरातिकनको पराजित करनेवाला होता है। हैं। उम दिन पार्वण याद किया जाता है। जो व्यकिटतोयाका फन--टतीयामें जिसका जन्म हुआ है, महालयामें उक्त थाह नहीं करते, दोपान्वितामें यह वह सकल गुणयुक्त, गम्भोर, नृपानुरागो, वायुरोगयुक्त, थाड करें। मवका उपकार करनेवाला, अन्य के अधिकारमें पाश्यो, कार्तिकको अमावस्याको स्नान के बाद दही, क्षोर और कौतुकप्रिय, मत्यवादी और समस्त विद्यासम्पन्न होता गुड़ पादि सारा टेवा और पितगको भक्तिपूर्वक अर्चना एवं पार्वण श्राद्ध करें। इसमें दोपदान करना पड़ता चतुर्थीका फन-जी चतुर्थो में जनमा है, वह सर्वदा है । क्यों कि पिटगण आ कर थाइभागको ग्रहण करते । खोय पुत्रमिव और प्रमदा, प्रमोदो, हताभिलाषा, कपा. हैं और प्रतिगमनकालम उस पान्नोकमे उनको मार्ग न्वित विवादशोल, विवादमें विजयो और कठोर होता दिखाना पड़ता है। ____ इसके सिवा उस दिन लक्ष्मीपूजा ओर उमो समय पञ्चमोका फल-पञ्चमोके दिन जन्म हो, तो वह देवरहम दोपदान किया जाता है। उसके मन्त्रमें उम राजमान्य, सुन्दरशरार, दयावान, पण्डिताग्रगण्य, कामो. दिन कोन्निकापाको व्यवस्था देवनी प्रातो है। यह गुणवान् ओर बन्धुजनों में एकमात्र माननीय होगा। पूजा प्रदोषकालमें को जाता है । यद्यपि दोनों दिन यह षष्ठीका फल षष्ठीमें जिसका जन्म हुमा है, वह तिथि प्रदोषव्यापिनो होता है, तथापि युग्मादरके कारण विदवान्, वरिष्ठ, चतुर, सुन्दर, कोर्ति सपत्र, पालम्बित दूसरे दिन होगो । दोनो दिन प्रदोषकाल न प्रान हो तो बाहु-विशिष्ट, व्रणाकोण देह, मत्यप्रतिष्ठ, धनपुत्रयुक्त और पार्वणकं अनुरोधर्म दूसरे दिम उल्कादान करें। चिरायु होता है। यदि दिनको चतुर्दशी और रातको प्रमावस्या हो, तो मममीका फल-जिमका जन्म सालमोको हुआ है, वह उस दिन लक्ष्मीपूजा करें। इसका नाम सुखरात्रिका कन्यासन्ततियुक्त, अरातिमातङ्ग के लिये. मृग-स्वरूप, है। किन्तु इसके एक विशेष वचनमें ऐसा है, कि दूसरे विशाल नेत्रवाला, प्रसिद्ध प्रभावशालो, देवहिजका अर्चना- दिन एक दण्ड रजनो तक अमावस्या हो, तो पूर्व दिन- परायण, रमिक, महात्मा, और पिटधनहारो हुषा करता को छोड़ कर दूसरे दिन लक्ष्मीपूजा करे'। ( तिथितत्त्व ) है। यदि दोनों दिम प्रदोषके ममय अमावस्या न पड़े. अष्टमोका फल-अष्टमोको जन्म देनेवाला राजलब्ध