पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५२३

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विविध-विनकमा सहार, यात्रा, उपनयन, प्रतिष्ठा, चोलकर्म, वातुकर्म, तिमिति (म' पु. ) तिबीनां पतयः, तत् । तिषियों रहप्रवेश और सम्म से मङ्गल-कार्य पक्षको प्रति- पधिपति । बाया, विधाता, हरि, यम, गया, षडानन, पदाको न करने चाहिए। (गीयूषधारात बशिष्ठ ) सक, वसु, भुजग, धर्म, देश, सविता, मन्मथ तथा कलि • किसी किसोका कहना है कि शुक्ला प्रतिपदाको ये सब देवता प्रतिपदादि तिथिके यथाक्रमसे अधिपति भांति णा प्रतिपदा भी वजनीय है ; किन्तु यह सङ्गत है। प्रमावस्याके अधिपति पिढगा है। (वृहत्सं. ९९ अ.) नहीं है। कारण मल बचनमें "मासाद्य तिर्थ!" ऐसा शुल भोर कृष्ण पक्ष प्रतिपद के अधिपति पम्बि, सोख है : यदि कपक्षीय प्रतिपदका निषेध होता तो हितोयाकं प्रजापति, तोयाके गोरी, चतुर्थी के गध. "पक्षाध तिर्थ" ऐमा पाठ होता। हितीयामें राजाक पञ्चमोके पहि, षष्ठीवो गुहा मालमो के रवि, पष्टमी के शिव, सला चिड, वास्तु और व्रत प्रतिष्ठा, यात्रा, विवाह, नवमोके दुर्गा, दशमोके यम, एकादशोके विश्व, हादगीके विद्यारम्भ, एहप्रवेश आदि समस्त माङ्गलिक कार्य हरि, बयोदशोक काम, चतुर्दशीके हर, पूर्णिमा पोर शुभजनक है। हतीयामें उक्त कार्य पहितकर है। पमावस्याके अधिपति शव है। पञ्चमीमें ऋणप्रदानके सिवा अन्यान्य मङ्गल कार्य शुभ तिथिप्रयो ( स० पु.) तिथि प्रणयति तिथि प्र-नो-क्षिप कर है। षष्ठोमें अभ्यन और यात्रा प्रतिनिता पोष्टिक पन्द्रमा। मङ्गल-काय विधेय है। हितीया रतोया और पञ्चमोमें तिथियुग्म (सं० लो०) तिष्योस्तिथि विशेषयो युग्म जो जो कार्य एम कर हैं, सप्लमोमें भो के कार्य तत्। तिथिका जोड़ा, दो तिथि । शुभजनक है। अष्टमीमें मग्राम-योग्य पखिल वास्तु तिथिसन्धि ( स० पु. ) तिथ्योः सन्धि, ६-तत्। तिथिको कर्म, शिल्प, विवाह आदि विधय है। सन्धि, दो तिथियों का एकमें मिलना। हितोया, टतोया, पञ्चमी पौर मलमी में जो जो कार्य तियो (म सो.) तिथि अादिकारादिति वा डोष । कहे गये हैं, दशमी में व कार्य विधेय है। एकादयो में तिथि देखो। व्रत. उपवास, पिटकर्म, समग्र धमकार्य और शिल्पकर्म तिथ्यई ( स० ली.) तिथीनां वर्ष, सत् । करण । विधय है। हादशोमे यात्रा और नवग्रहके सिवा अन्यान्य तिदगे (हिं. स्त्री.) वह कोठरी जिसमें सोन दरवाजे शुभ कार्य हितकर है। त्रयोदशो हितोयाति तिथि- या खिड़कियां हो। योंके सभी कार्य किये जा सकते हैं। पूर्णिमाको यज्ञ- सिदारी (हि.स्त्री० ) एक प्रकारको चिड़िया। यह क्रिया, पौष्टिक और मङ्गलकार्य, संग्राम योग्य पखिल वतककी तरह होतो और सदा जलके किनारे रहती है। वास्तुकम, उहाह, शिल्पप्रतिष्ठा पादि समग्र मङ्गलकाय यह उड़ने में बहुत तेज है और जमोन पर सूखो घासका किये जा सकते है। घोसला बनता है। लोग इसका शिकार करते। अमावस्याको पित्तकर्म के सिवा अन्य शुभकम वर्ष तिहारो (हि.स्त्री.) वह कोठरो जिसमें तोन दरवाजे नीय है। यदि कोई मोहवश निषिद कार्योका अनुष्ठाम या खिड़कियां हो। की तो सब विनष्ट हो जाते हैं । ( पी० धा० वसिष्ठवचन ) तिधर (हि. क्रि०वि० ) उधर, उम पोर। तिथि क्षय (म• पु० ) तिथीनां तिष्य पलक्षितचन्द्रकलानां सिधारा (म• पु० , एक प्रकारका थ.हर । इसमें पत यो पयारम्भो यस्मिन् बहुवी । १ दर्श, अमावस्या नहीं होते और उंगलियों को तरह शाखाएं अपरको (शब्दार्थच०) तिथीनां चयः तत् । २ तिथिका माश, निकलती है। बगोचो आदिको बाड़ या टटोके लिये दिनक्षय । (ज्योतिष) इसे लगाते हैं। इसका दूसरा माम वयो या नरमेज है। एक दिनम तीन तिथि हो, तो उसे दिनक्षय कहते तिधारीकाण्डवेल ( म० स्त्री.) हड़ जोड़। : है। इसमें वैदिक क्रिया करनेसे सहम गुण फल होता तिनकमा (हि. कि. ) क्रोधित होना, चिड़मा, नागल है। अवम और हस्पर्श देगे।