पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५३१

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(दुर्ग) है। दोकप नामक दुन्नि जाति पर शासन रखनेके अराधातसे यह चिज उत्पब एए । उनका यह भी लिये दुर्ग के मालिक तिम्बाधिपिति के अधीन प्रतिनिधि कहना है कि पहले या पर्वत कैलासके जपर ही स्वरूप है। ये पहले दोकप-रान कहलाते थे। उन पस्थित था, किन्तु अनुमान रसको केनासपर्वतसे तिब्बतके पूर्व में तुषारमण्डित उच्च तमि (कैलास पर्वत), पलग कर खतन्त्र स्थापनपूर्वक उस पर रहते थे। मो. मफम (मानस-मरोवर ) द पौर शुगोल नामक से जाना जाता है, कि तोपिक (ब्राण) गण इसे निझारका जल बहुत पवित्र जाना गया है। जो इसे हनुमान पर्वत कहते हैं। इस पर्वतके अपर कई जगह पोते हैं, वे मुक्ति पाते हैं। उता निझर सोगर नामक ऐसे चिड है। भारतवासो उन्हें शिवदुर्गा, कात्तिक, हामके एक स्वतन्त्र गारपोम (गवर्नर) या शासनकर्ताके बकासुर, हनुमान प्रभृति के पदचिह बतलाते हैं। यहां अधीन है और ये भो नासाके प्रधान शामनकर्ताको मातः जिगतेन-चौगछियुगेर नामक एक पवित्र गुहा है। इसमें है। कैलासके पूर्वाञ्चलके लोग कहते हैं कि वे समस्त मानममगेवर और कैलास पर्वतकी महिमा एक चिक सिद्धपुरुषों के है। 'सदाक' प्रदेश में ले खर (8) तिब्बतोय पुस्तकम लिम्वी है, कि केलासमे चार प्रधान दुर्ग अवस्थित है। यहाँके लोग काश्मीरको नाई परि. नदियां निकली है। इन नदियोका उत्पत्तिस्थान क्रमशः छदधारी है। रमको टोपी चोन देशके अपराधियों को हाथो, गिह, घोड़े और सिंहके म मरोखा है। टोपीमी होतो है। याजकगण साल भोर काले रंगको पन्यान्य पुस्तकों में उन्हें क्रमशः गाय, घोड़े, मय र और टोपो पहनते हैं। लवगके पूर्व को पोर गुरी प्रदेश है। मिरमुखके तुल्य बतलाया है। इन्हीं स्थानोंसे गङ्गा, यहाँका थोडिङ्गका पाश्रम बहुत विख्यात है, जो लोचव- लोहित्य ( ब्रह्मपुत्र ), वक्षु (पक सस् ) पौर मिन्धुको रिन्छेन माङ्गयो हारा प्रतिष्ठित एमा। इसके पूर्व में उत्पत्ति हुई है। पुरण प्रदेश है। यहां पहले सोन-तमन-गम्मो व गोय. मिन्धुमदी पश्चिम दिशामें तिब्बतके प्रतर्गत बलति राजा गन्य करते थे। राजा होद पम वंशमें बहुत प्रसिद्ध प्रदेशमें होती हुई काश्मीर पसर्गत कपिस्थान नामक हो गये हैं। इसके दक्षिण में अत्यन्त पुराना और प्रसिद्ध स्थानमें दक्षिण-पश्चिमको पोर भारतमें प्रवेश करतो है। 'चोभो जमली'का मन्दिर है, जिसे खुरकोग मन्दिर भो पशु नदो कैलासके उत्तरपश्चिमीशमे निकल कर थोकर कहते हैं। पहले इस स्थानसे कुछ दूरमें एक मन्यामो प्रदेश मध्य होतो हुई पश्चिमको पोर तुर्कियोंके देशमें रहते थे। उन्होंने अपनो कुटोमे ७ ार्य बौडपण्डितो. प्रवेश करती है। कैलास पर्व तमे सोता नामक और को पाश्रय दिया था। ये पाचार्य जब भारतवर्ष को एक दूमरी नदी पूर्वा शसे निकल कर प्रभो मानम लौटे थे, सब इन्होंने संन्धामौके पास सात बोरे रख सरोवरमें गिरता है। कहा जाता है, कि पहले यह छोड़े थे। बहुत वर्ष बोत चुकने पर भी वे वापस न देशके मध्य हो कर पूर्व मागरमें गिरती थो। गये। पन्तमें सन्यासीने बोरों को खोल कर देखा, कि कैलासपर्वतके मामनेका गोनपेगे नामक एक छोटा उनमें कई एक थेलियां हैं और उन पर 'जमलो' नाम पर्वत तीर्थोकी हारा 'हनुमन्त' कहलाता है। इस लिखा हुआ है। मन्यासाने उन थेलियोंको भो बोला, पर्वतमें. हलसे जमीन खोदने पर जैसे गहे हो आता है. उनमें कई एक चांदोके टुकड़े पाये । वे समस्त टुकड़ाको वैसे दाग दोख पड़ते हैं। इसके विषयमें कई एक गल्प ले कर जुमलस नामक स्थानको गये और वहां उन्होंने १.तिब्बती लोग कहते हैं, कि जे-त्सन मिन्नरप पौर नगे- उसो चाँदोसे एक बुद्ध मूर्ति निर्माण कराई । जब प्रतिमा पोनछुच, नामक दो तिब्बतोय ज्ञानी पण्डितोके धर्म घुटने तक तैयार हो गया, तब वह पापसे पाव चलने विचारके समय उनमेंसे थेष व्यक्ति नीचे गिर पड़े थे, लगी। म पर संन्यासी बहुतसे लोगोंको अपने साथ उन्होंकी देहके भारसे ऐसे चित्र हो गये हैं। भारत ले उस प्रतिमाको तिब्बत ले पाये। यहां पहुंच कर वासियोंके मतसे कार्तिक वाय शिक्षाकालमें उनके वह प्रतिमा पचल हो गई। उसो सान पर संन्यासोने