पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५३७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


.... स्कार-विधि-नसी सवा पार पोरन और मावान बुत परी (वापिरिस्तान बाबाक. गाइते, परन अंचे खानमें फैक पाते हैं। गोदड़ ड्यामें प्रचलित भाषा और पवरमाला)से तोड़ फोड़ कर माम खा लेते और हण्डो छोड़ देते हैं। धनोको देशको मावायुक्त 'बुधन' पक्षर निकाले गये है। यही तिम्वत देश सख्ते पर रख कर एक ऊँचे पर्वत पर ले जाते हैं, को प्रथम वर्णमाला है। राजा सोन-तमन-गम्यो नेपाल- (स्मशानके उद्देश्यमे हो यह पर्वत व्यवहत होता है) को राजकुमारीसे विवाह कर वसे पक्षोभ्य बुद्धको पोर वहां मुर्दे के शरोरसे वे मांस काट कर अलग करते (पक्ष ध्यानो बुद्ध से एक ) और चीनको राजकुमारोके है, बाद मण्डोको चूर चूर कर पागमें हालते और धुपों साथ विवाह कर वहांसे शाक्य मुनिको प्रतिमा उत्पादन करते हैं। धुएँ को देख कर गिड, गोटड़पादि लाये थे। ये हो दोनों तिब्बतको सबसे पसी पहुँच जात पोर उन्हींको काटा एपा मांस दे दिया जाता और प्राचीन बौद्ध-प्रतिमा है। रस-थ ल-न-कि-लखं है। प्रधान प्रधान लामाको मृतदेह उन्हींके गोनपके नामक मन्दिर बनवा कर गजाने उन दो मूर्तियों को मध्य नवोन प्रस्तुत समाधिमन्दिरमें गाड़ते हैं। निमापद- स्थापित किया। इसी मन्दिरके मामानुसार उनको राजा के लामाको देश जलाई जाती है, किन्तु भस्मराशिको धानोका नाम 'लासा पड़ा है। थोन्-मि-सम्भोट और वन- पासव-पुत्तलिका बन्द कर मन्दिरमें रख छोड़ते हैं। के भनुगामिगण राजाके पादेशसे तिब्बत नवसष्ट माधारण लोगोंके लिए पारसियोंकी नाई दोवारसे घिरा अक्षरों में तिब्बतीय भाषामें मस्क तसे बौखपन्य पनुवाद हुधा 'मृतस्थापनस्थान' है। मङ्गोलियामें कोई कोई करने में नियुक्त हुए । संग्य फलपो-छे प्रभृति अन्यहो मृतदेहको जलाते और कोई पत्थरके टेरमें गाड़ी तथा सबसे पहले पनुवादित हुए थे। कोई निर्जन स्थानमें फेंक पाते हैं। ये हठात् मत थि सोन-दे-त्सन् गजा मा पोषक पवतार माने शिशुको देशको रास्ते में फेंक देते हैं। जाते थे। उनके राजत्वकालमें महापण्डित शान्तरचित, धर्मविस्तार और धर्ममत-तिब्बतमें बौडधर्म प्राचीन पद्ममम्भव और अन्यान्य भारतवर्षीय बौध पण्डित वा नदर और पाधुनिक वा छिदर इन दो भागों में विभक्त तिब्बतमें पामखित 'हए। इन लोगों के साथ सात है। नह-थित्-त्सम्यो राजाके समयसे अधस्तन २६ पुरुष श्रमण बौद्ध-सन्यासो भो पाये थे, जिनमें वैरोचन ममरि-सोन्-त्सन राजाके राजत्वकाल तक तिब्बतमें प्रधान थे। इनके शिचादानसे देशमें शोधही बहुतसे बौडधर्म की बात कोई नहीं जानता था। लर-थो-रि- लोचत्र (मस्वतन्त्र तथा दो वा तोन भाषावित तिब्बतोय मन-त्सन नामक राजाके राजत्वकालमें राजप्रासाद पर लोग) हो गये। लोचवोंमें सुर बनपो, सेगोर वैरोचन, कई भाग 4 को छ यग-ग्य पुस्तक प्रकाशमे गिरी थी, प्राचार्य रिव्हन शेग, येमे बनपो, काछोग शङ, प्रति इस पुस्तकका अर्थ नहीं जाननेके कारण तिब्बती लोगों प्रधान है । पन्होंने सूत्र, तम्ब और ध्यानशास्त्रका सिम्बतोय भइसका नाम 'न-पोसां-व' रखा। यहाँसे बौडधम का भाषामें अनुवाद किया। ये शान्तरक्षित दुख ( विनय ) सूत्रपात हुआ। राजाको स्वपमें माल म हो गया, कि शास्त्रसे माध्यमिक शास्त्र तक शिक्षा देते थे। पनसभव उनसे अधस्तन पञ्चम पुरुष में इस पुस्तकका अर्थ प्रचा जानी छात्रों को तन्त्रशास्त्र सिखाते थे। इस समय प्रयन् रित होगा। इसोके अनुसार बोधिसत्व अवलोकितेश्वर ___ महायान नामक एक चोम देशीय पण्डिसने सिम्बत के अवतार श्रोन्-त्सन गम्मो राजाके अधिकारके ममय था कर एक नया मत प्रचार किया। वे करते थे "सत्य उनके मन्त्री खोन-मि-सम्भोट भारतवर्ष में उपस्थित हुए हो वा प्रमत्य, मन जब तक पासता रहेगा, तब तक पौर मन्होंने बौदधर्म के नाना पान अध्ययन किये। वे उसको मुक्ति नहीं है ; शृङ्गल लोहेका हो या मोनेका हिन्दुपोंके गानोंमें भी व्युत्पत्ति लाभ कर तिव्वतंको लौट वह समाम भावमे बाँध रखता है। बिना मिरासत गये। तिव्बतमें जाकर उन्होंने ही सिम्बतको 'बुचन' हुए बार बार जन्माणसे परित्राण नहीं है।' यह नामक पक्षरमालाको मोष्ट को। माबाबुमा नागरी पचर मत प्रचारित होने पर मातापितका दर्शनमा Vol. Ix. 134