पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५४३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


सम्भोट पार्यावर्त में पहुँच कर पण्डितोंको बहुत सुवः न समस्त व्यवहारों से प्रजाका सुख स्वच्छन्द चौर दि उपहार दे लिविकर नामक बोह पण्डितो से उता शौलता दिनों दिन बढ़ने लगो। भाषा सीखने लगे। सम्भोटने बहुत थोड़े हो दिनों में संस्कृत कहा जाता है, कि राजा स्रोन सन-गम्पोने भारत- भाषा और ६४ प्रकारको लिपिप्रणालो तथा पण्डित महासागरके किनारेमे अवलोकितेश्खरके नागसार टेवसिंहके निकट कलाप, चान्द्र पोर मारस्वत व्याक- चन्दको स्वयम्भ प्रतिमा प्राल को थो। गण सोख लिया। इसके बाद उन्होंने तथा सहचरोंन । राजा नेपालधिपतिने ज्योतिवर्माको कन्यासे विवाह २४ बौद्ध प्रवचन और रहस्य ग्रन्य अधायन किये । देशमें : किया। योतुको राजाको सात प्रमूख्य द्रव्य मिले थे, लौट कर उन्होंने विद्या और ज्ञानदेवता मञ्ज श्रीका जिनमेंसे प्रक्षोभ्य बुद्ध ओर मैत्रेयको प्रतिमा, तारा पूजन किया। बाद तिब्बतोय भाषा लि वने के लिये मम्मोट- देवोको चन्दन प्रतिमा तथा रत्नदेव नामक वय मणि ने "उ चन्" (मात्राविशिष्ट) वर्णमालाको मृष्टि को प्रधान थे । और उमो भाषामें प्रथम व्याकरण शास्त्र "सुमधु दग बाद भोटपतिने चोनराज सेङ्ग-त्मन-पो को कना यिग" प्रणयन किया। राजाके हुकासे ज्ञानवान् सभो हुणषिन कुमारोको अपने प्रधान मन्त्रो गरके कोशलसे मनुषा लिखना पढ़ना सोखने लगे और क्रमश: उन नये मना कर उसमे विवाह किया। चोन गजकुमारो अपने अक्षरों की सहायतासे धर्म ग्रन्यादि संस्कृतमे तिब्बतो भाषा. माथ बुद्धम ति, एक बौद्ध धर्म ग्रन्थ तथा चिकित्सा पौर में अनदित होने लगे। राजाने प्रजाको धर्मनिष्ठ करनेके ज्योतिषशास्त्र लाई थो। लिए निम्नलिखित १६ आदेश प्रचार कर उन्हें' उसो भोटके अधिवासो राजा स्रोन-त्सन गम्पोको चेन रेस- नियमके अनुसार चलनेको वाधा किया। मिगका ( अवलोकितेश्वरका ) अवतार और उपरोक्त दो (१) कोन-छोगमें (ईखरमें) विखाम करो। रानियोको तारादेवोसो मानते थे। यथार्थमें इन्हीं तोनोंके (२) धर्मानुष्ठान और धर्म शास्त्रका पाठ करो। यत्नसे तिब्बतमें बौद्धधर्म एक जंचे शिग्वर पर पहुंच (३) पितामाताको सेवा करो। गया था। गजान १०८ बड़े बड़े मन्दिरोंका निर्माण कर (४)जानीको सेवा करो पौर विहानको उच्चासन दो। उनमें बुम त्ति प्रतिष्ठित को थौं। २५ वर्ष की उम्र में (५) उच्च वंशीय तथा वयोवडका मम्मान करो। उन्होंन मञ्ज,योका भवन पेविनके उत्तरमें १०८ मठ (६) विनय और न्यायो बनो। बनाने के लिये अपने मन्त्रोको भेजा था। (७) धनधान्यको अच्छे कामो में खर्च करो। ६३८ ई० में सोम-त्सनने तिब्बतको विख्यात लासा (८) बड़ों का पदानुमरण कगे। नगरी स्थापन को। मभो प्रमिड बोड़ ग्रन्थों का अनुवाद (e) उपकारोका प्रत्य पकार और उनके प्रति कता । करान के लिये उन्होंने भारतसे कुशर और शहर मण्डित- को, नेपालले पण्डित गोलमन को और चीनसेयन (१०) मद्भाव और प्रोति रख कर हिंमा ६ष छोड़ो। महो-तर्ष नामक प्रमिच प्राचार्य को बुलवाया था। (११) प्रात्मीय स्वजन बन्धु बान्धवो को मेवा सुश्रुषा ___चोन-राजकुमारी और नेपाल राजकुमारोसे कोई सन्तान न हुई, इसोमे सोन-त्मनने जे-थि कर और स) देश हित साधन और देशके कामोंमें तत्पर थि-चन् नामको दो राजकुमारियों का पाणिग्रहण किया। मि१३) सच्ची तौलका (बटखरा) व्यवहार करो। पहलेके गर्भ से मनःस्रोन-मन-सप्सन और दूसरेसे. गुन- (१४) स्त्रियों को बात मत सुनो। गुन-समन नामक पुत्र उत्पन्न हुमा । गुन-रि जब (१५) नम्रता और सभ्यताका व्यवहार कोदो। १३ वर्षका हुआ, तब स्रोन तमनने उसे राजा बनाया (१६) धैर्य और नम्रतासे विपद् पोर लेगका सहन और आपने वानप्रस्थ अवलम्बन किया । किन्तु दुःखका विषय है, कि १८ वष को पवस्था में राजकुमारको हठात् - कगे। गर्भ हो।