पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५४८

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१५४ खदि बहुमूल्य उपहार दिये और पो तिब्बतमें बोई जिसमें १२०.. दोतक्द (अर्थात् १५ लायसे) धर्म का प्रचार, श्री वृद्धि, ध्वस पोर पुनः प्रचारको चेष्टा हुए थे। उन्होंने मचओ देवको एक प्रतिमा बनवाई का मारा विवरण उनमे कह सुनाया। कातर हत्यमे थो जिसमें ७ ब्रे पर्यात् एक मन मोना लगाया। उन्होंने यह भी कहा. "प्रभो पापके सिवा और कोई पुत्र पसादे पिताको अपेक्षा भविमान घे पोर प्रतिवर्ष दूमरा मनुषा नजरमें नहीं पाता जो तिब्बतको दस धर्म बुद्धगयाके विवासन ( दार्जदम) नामक बोहयोगमें विप्नवसे उद्धार कर मके, प्रतः पापको एक बार तिब्बत पूजा भेजते थे। हम पथाको इन्होंने अपने जीवन जानका कष्ट दिया जाता है।" कान तक जारी रखा था । इनके पौत्र मन्मलने लोचव पोर उनके अनुयायो पगिड़त अतिश का शिषात्व 'कह ग्यार' नामक धर्म शास्त्रको मम्प रूपसे सोने के प्रहण कर उनको सम्पति पाने के लिए दासको नाई सेवा पत्तरोंमें लिखवाया था। अमनमल के पुत्र रिहमलने करने लगे। पन्त पतिग तारादेवोको प्राकाशवाणी लामा नगरमें बहुत खच करके बुद्धमूर्तिको प्रतिष्ठा को, मे तिब्बत जानेको राजो इए। वे तिब्बनका बहुत उप- तथा उनके मन्दिरके गुम्बजको स्वर्ण मण्डित करा दिया कार प्रोर एक महामाधक (डपामक) का विशेष महा- था। रिहुमलके पुत्र सह-मल शाश्व-प लामानोंसे यता करेंगे, इस प्रकारको प्राकाशवाणो होनेसे उन्होंने बोदधम में दीक्षित हो राजमिहासन पर है। इस ५८ वर्षको अवस्था में १०४२१०को अपने प्राणकी उपेक्षा बंधी अन्तिम राजा पपुवजथे। उन्होंने पर-सव-माल के करके विक्रमशोलके सहारामको परित्याग कर तिब्बतमें आत्मोय मो-नम-दे का नाम पुखमल रख कर राजगहो प्रस्थान किया। नह-रि प्रदेशके थोङ्गि महाराममें पतिश पर बिठाया , रहते थे। उन्होंने राजाको तन्त्रसूत्र सिखाया, बाद उ वा तसेग-प्र राजाके पुत्र पसदेके वसावरोंने गुपयन् और तसन प्रदेशमें धर्म प्रचार किया। उन्होंने कई एक लुग्यबल, चित-प, लहतसे, लनलुन और तमकोर प्रदेशों शास्त्र अन्य प्रणयन किये, जिनमें से लमदोन (मत्यपथ में छोटा छोटा राज्य समापन पर वहां राज्य किया। प्रदीप) प्रधान है। ७५ वर्ष की अवस्था १.५५ ई०को विव-दे के वंशधरोंने मु, जन, तनग, य -बम भोर म्यल- पतियको मृत्यु हुई । होद-दे के पुत्र प्रत्ले दो राजत्व तसे जिलों में छोटा छोटा राज्य बसाया। होदके चार कालमें अतिशन उ, समन और खम प्रदेशोंके समस्त पुत्र थे-फवदेश घिदे. थिछुन बार नग-प। प्रथम और लामा और श्रमणको एकत्र कर कालगणमाके नतम (१.) असो-दे नियमका प्रचार किया । उत्तर भारतके शाल प्रदेश में पष्टि-मंवसरको वर्ष चक्रको गणनाक जो नियम प्रतिश- (२) वादे (११) जे-दर-मल (म) ने पाये थे, वे ही रम ममय प्रचारित किये गये। तिब्बतो (३) प्राशि-दे (११) (१२) अनन·मल सोयों ने रमका नाम रख-जून रखा। १२०५९० तक (8) भने सतिशको मतमे हो शिक्षा दो गई थी। इस समय (१३) रिहु-मल विस्थात लोचबने बहुतमे मस्त ग्रन तिब्बतोय भाषामें (२) नागदेव (१०) संग-इ-मल अनूदित किये। तेरहवीं शताब्दो, पण्डित मर्प, बिल- (s) तसल-फ्युग (१५) जे-दर-मल (श्य मोनपो, काश्मोरीय पगिहन शाक्यत्रो और न्याय भार तोय परिहतो ने तिब्बतमें बौद्ध धर्म प्रचार के लिए अमेष (७) ऋशि-३ (२म) (9) * (१६) अ-जिन मल महायसा को ' तसेदमे निम्न नवम पुरुष राजा तग-प- (८) प्राग-तमन-दे (१७) कलन-मक टेक राजत्वकालमें मैत्रेय बुद्धकी एक प्रतिमा बनाई गई तग-प-हे (१८) पर-तब-मल (१) तसेद

  • तसेदकी वंशावली-

इसके बाद वालोषा