पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५५८

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५५४ तिमिगिलगित-तिमिर तिमिलिगिल (स०४०) तिमिलि गिलति तिमिङ्गिल. मणिका, मयक, केगजाल, मगडमा, पताका, मरीचि पौर एक, रस्स ल, पगिलस्येति पर्व दासात् न भुम् । प्रति कुगल समूह देखने में पाते हैं, अथवा जलमग्न वा दृष्टि छहत् मत्साभेद, एक प्रकारको बहुत बड़ी मछलो। होतो है, ऐसा मालूम पड़ता है। पथवा मेघाच्छन वा तिमिशिलाशन (म. पु०) सिमिषिलो ममाः अश्यते यत्र तिमिगच्छनके जैसा दीख पड़ता है। दृष्टिको भान्तिसे पश प्राधार ल्य ट । १ दक्षिणस्य देशभेद, दक्षिणका एक दूरस्थित वस्तु निकटमें और निकटस्थित वस्तु दूरमें मालूम देश-विभाग जिमके अन्तर्गत लङ्गा प्रादि हैं। यहां पड़ता है और कोशिश करनेमे भो सूचीपाखं नहीं निवामो तिमिङ्गिल मछलोका मांस खाते हैं । २ उक्त देश : देखा जाता। दोषके हतोय पटल में रहनसे बहदाकार के निवासी। ३ उस देशकै राजा। पौर वम्बाच्छनके जमा दोव पड़ता है और कर्ण, तिमिज ( म० की. ) तिमितो जायते जन-ड। मुक्ताभिद, नामिका तथा चक्षुःविशिष्ट सभी प्रातियाँ विपरीत तिमि नामक मछलोसे निकलनेवाला मोती । यह मोतो; भावसे देखने में प्रातो हैं। टोष वलवान् हो कर जब वेधनोय है, किन्तु अपरिमित गुणचालो जान कर इसका दृष्टिके अधोभागमें रहता है, तब समीपस्थ द्रश्य, जई, भाग- मुख्य शास्त्र में निर्दिष्ट नहीं हुआ है। यह राजाओं का में रहनेमे दूरस्थ द्रव्य और पार्श्वभागमें रहनेमे पाखं स्थ सुत, अर्थ, मौभाग्य और यग: सम्पादक, रोग शोक- द्रव्य नहीं दीखता । दोष जब दृष्टिमें चारों तरफ हारक तथा कामप्रद है : (वृहत्सं० ८१ अ०) फैल जाता है, तब मभो वस्तु मङ्गचित दोख पड़तो हैं। तिमित (म० वि० ) तिम कतरित निश्चत स्थिर दृष्टि में केवल दो स्थानों में यदि दोष रहे, तो एक प्रातति २ क्लिन, पाई, भौंगा। तोन बार और यदि अवस्थित भावसे रहे, नो बहुत बार तिमितिमिलि (म. पु० ) महामत्साभेद, एक प्रकार टेवतो है। चतुर्थ पटल में दोष रहनेमे तिमिर रोग को बड़ी मछलो। उत्पन्न होता है । तिमिर गेगमे, एक ही समयमें दृष्टिगंध तिमिध्वज (म. पु.) दानवविशेष, शम्बर नामक दैत्य होनेसे वह लिङ्गानाथ रोग हो जाता है। तिमिर रोग. जिसे मार कर रामचन्द्र ने ब्रह्मासे दिव्यास्त्र प्राप्त किया के अत्यन्त गभोर होने पर चन्द्र, सूर्य, विद्युत् और नक्षतविशिष्ट प्रकाश तथा निर्मल तेज और ज्योतिः था। ( रामा• २।२०।११) तिमिर (म. क्लो०-पु. ) सिम्यतीति तिम-किरच । इषि म पदार्थ देखने में आते हैं ! लिङ्गनाश रोगको इम अवस्था को नोलिका वा काच कहते हैं। यह लिङ्गानाथ रोग मदि मुढीति ! उण ११५२।१ पन्धकार, पधेरा । २ चक्षु रोगविशेष, अाँखका एक रोग। मका विषय सुश्रुतम यदि वायुमे उत्पन हो, तो सभी पदार्थ लाल, सचल और मैले दोखते हैं। पित्त कत्तक उत्पन्न होनेसे पादित्य, इस प्रकार लिखा है- खद्योत, इन्द्रधनु, तडित् और मयूरपुच्छके जैसा दृष्टिविशारद पण्डितोका कहना है, कि मनुषों को। विचित्र वर्ण पथवा मोल वा कृष्णवण, वा खेत चामर दृष्टि पञ्चभूतोंके गुणसे बना हुई है। वाह्य पटलमें वा खेतवर्ण मेधक जेसा अत्यन्त स्थल अथवा मेघशून्य प्रव्यय तेज कतक पाहत, शीतल प्रकतिविशिष्ट, समयमें मेघाच्छनके जैसा, अथवा मभो पदार्थ जम्न- खद्योतके दोनों विस्फुलिङ्गोंसे निर्मित पोर मसूरदल परि- प्रावितमे दोखते हैं। रक्षा कसक उत्पन होनेसे सभी मित विरवालतिविशिष्ट, इन सब दृष्टिगत रोगीक तथा रतवर्ष और अन्धकारमय, कफमे उत्पन्न होनेसे सभो पटलके अभ्यन्तरस्थ तिमिर रोगके लक्षण कहे जाते हैं। सतयण और सिन्ध तेलात जैसे दोखते है। पित्त दोष विगुण हो कर शिरा-समूहके अभ्यन्तर जाता कत क उत्पब होनेसे परिम्नायिरोग होता है। इसमें है और उसके दृष्टि के प्रथम पटलमें ठहरनेसे सभी रूप सभी दिशाएं नवोदित सूर्यको नाई वा खद्योतपूर्ण वृक्ष पव्यसा भावसे देखे जाते है । विगुणित दोषके दितीय समूहको नाई दीख पड़ता है। वायु कत्तक दोष पटलमें रहने दृष्टि विल हो जाती है और सब जगह सत्य होनसे दृष्टिमणल रसवर्ष, पित्त परिमायि.