पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५६५

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वस्थताल और काल है। शहरं बहुत परिष्कार और सड़के कर्णोलको नौल-कोठी बाजारसे बहुतं ममोप है। यहां प्रशस्त । यहाके बाजार बड़े बड़े और सुबह शाम जी दूमरे देशों में भेजे जाते है। . उन्में विक्री होती है। अदालत के समोप माम नामक एक कण्टाई -यह मुजफ्फरपुरसे ४ कोस दूर मोतिारोके गह के महश जलाशय है जो किमो नदोके पुरातन- रातपर अवस्थित है। सो स्थानमें कटाई नील गर्भ का अंश मात्र है। बाजार में तालाब किनारे राम- कोठो है। परले यहां मोराको भो कोठो थो। सबास्में मोता और शिवका मन्दिर है। यह शहर बहुत प्राचीन दो बार हाट लगती है। यहां मोनापुरका रास्ता मुज- कालका नहीं है। इसके स्थापनका मुजफ्फर का एक फरपुर के रास्ते में प्रा मिला है। 'पामिल' वा 'चकला नाई' (मायक ) थे। कम्पनीको बनसण्ड कला-यह मुजफ्फरपुरसे १४ कोस दूर दोवामी मिलनेके बहुत पहले उन्होंने उत्तर में सिकन्दर सोतामढ़ोके रास्ते पर अवस्थित है। यह स्थान पुगनी पुर ग्राम, पूर्व में कणों को ग्राम, दक्षिण से यदपुर पोर बासमतो नदोके किनारे बसा है। यहां एक बड़ी पश्चिम में मारिहागजमे ७५ बोचे जमीन निकाल कर उसो नौलको कोठो है। में अपने नाम पर नगर स्थापन किया। क्रमशःमको राजगड - मुजफ्फरपुरमे ११ कोस उत्तर-पूर्व में यह उनति होतो गई । १८१७ ई में छोटो गण्ड के बढ़नेमे बड़ा ग्राम पवस्थित है। यहां भैरव नामका एक बड़ा इसको बहुत क्षति हो गई है। मेला लगता है। इस मेले में गाय बैलको विक्रो होती है। रहुआ-यह मुजफ्फरपुरमे ३ कोस दूर, पूमा रास्त के यहां एक नोलको कोठो है। पहले यहां धोनीका कारः जपर अवस्थित एक छोटा ग्राम है । यहाँ जुलाई महो- खाना था। इसके पश्चिम में लावाडाई नदो प्रवास्ति नमें ७ दिनका एक मेला लगता है। यहां पौरका एक है। स्थान है जहां बहुतसे यात्रो एकत्र होते हैं। कटवा वा अकबरपुर-या लाखाबाई मदोंक सरिया-यह मुजफ्फरपुरसे दक्षिण पचिम र कोस. किनारे पर अवस्थित है। रसके पश्चिममें एक टूटा फटा टूर, बया नदोके किनारे अवस्थित है। यहां नोलको एक महाका किला है। किलेका परिमाण प्रायः ६० बोधा और कोठी है । बयाके जपर छपगके रास्ते पर तीन गुम्बजका दोवार ३० फुट अंचो है। राजचन्द नामक एक व्यति' एक पुल है । यहाँसे थोड़ो दूर के फासले पर पत्थरका एक दम दुग के अधिपति थे। दरभङ्गा जाते समय अपने स्तम्भ है जो किसो एक ब्राह्मण हारा स्थापित हुमा है। परिवारवर्गसे कह गये थे कि यदि उनको ध्वा गिर लोग इसे 'भीममिको लाठी' कहते हैं । यह २४ पुट जावे तो उनको मृत्य, निश्चित समझना चाहिये। एक ऊंचा और सिर्फ एक पत्यरका बना हुपा है। इसके अपर कुरमो राजाका शव था, उसने धजा तोड़ डालो और चौकोन पत्यर पर एक पत्थरको मिहमूत्ति है । सिंहमूर्ति राजपरिवारको रसको खबर दो। इस पर वे जलतो तक खम्भे को ऊंचाई ३० फुट है। डा. राजा राजेन्द्र हुई चितामें जल मगे। लाल मित्रके मतसे यह एक अशोकस्तम्भ है। इसके मधुवनी-दरभङ्गा शहरमे ८ कोस उत्तर-पूर्व में बगल में एक गहरा कूी है। यह शहर अवस्थित है। यह मधुवनी उपविभागका वसन्तपुर-सरियाको नीलकोठीसे कुछ दक्षिण में यह सदर थाना है। यहाँका बाजार खब विस्तत। माग हात् प्राम पवस्थित है। यहां ग्राम्यसमिति है। सनो और कपड़े पादि प्रधान बाणिज्य द्रव्य | शहरके साहेबगल-मुजफ्फरपुरसे १५ कोस उत्तर-पश्चिममें उत्सर दरभङ्गा-राज मधुमिहके तोसरे लड़के कौत्ति बयो नदीके किमार पर यह शहर अवस्थित है। यहाँसे मिहका वंश "मधुवनोके बाबू" नामसे प्रमिय . मोतिहारी, मोतीपुर और लालगन तक सड़क गई है। इन्होंने जबदो परगने के कई ग्राम राजपरिवारसे पाये यहांका बाजार बहुत लम्बा चौड़ा है। तेलहन, अनाज, है। इस शहरके भीतर नेपाल जानेका प्रधान पथ है। गेह, सरद पोर नमकका व्यवमाय पधिक होता है। भौवारा-मधुवनौसे पाव कोस दक्षिणमें यह बड़ा Vol. Ix. 141