पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५६७

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मिर्जापुर-मधुवनौसे: कोस उत्तर-पूर्व में यह पाम बाधमतोके बाये किनारे पर अवस्थित है। यह एक उप- पवस्थित है। यहांके बाजार में नेपालको तराईसे अनाज विभागीय सदर थाना है। पाता है। यहाँस ६ कोस उत्तर-पूर्व में वलराजाका ___दरभगा शब्दमें विस्तृत विवरण देखो। ध्वंसावशिष्ट दुर्ग है। इस ग्रामका नाम भो वलराजपुर जिमच-या दरभङ्गासे डेढ़ कोस पूर्व कमलाक है। दुर्गको लम्बाई ४सौ गज और चोड़ाई २ सो गज है। किनारे पर है। यहां कार्तिक पोर माघी पूर्णिमामें एक बलराजा कोन थे, इसका पता नहीं। मेला लगता है, जिसमें पुत्राथि नी हिन्दू स्त्रियाँ कमलाम जयनगर-यहं नेपालकी मोमा पर अवस्थित है और नान करने पातो हैं ! उनका विश्वास है कि स्नान करने. एक मृण्मय दुर्गका भग्नावशेष है। पहाड़ियोंको से वध्यात्वदोष दूर हो जाता है। शासनमें रखनेके लिये किसी मुमलमानने यह दुर्ग लेहरा-यहां तोन बड़ी दिग्गो है। घुड़दौड़ नामको निर्माण किया था। दुर्ग बनवाते समय पृथ्वोसे एक मृत- एक दिघी (दिग्गो) २ मोल लम्बो है। दरभङ्गाके राजा देह पाई गई थी, इसी कारण यह स्थान प्रशुभकर शिवसिंह पुष्करिणो खनन करने का सङ्कल्प करके एक समझा जाता है। मम्भवतः १५६३४ में बङ्गाल के शासन हाथमें जलपूर्ण झारो ले घोड़े पर सवार हुए, भोर कर्ता अलाउद्दीनने कामरूपसे बेतिया तक जो जल गिराते गये। उन्होंने प्रण किया था, कि झारीका मोमान्त दुर्ग निर्माण किये थे, उन्हीं में यह एक दुर्ग जल जहां खतम हो जायगा, पुष्करिणोको लम्बाई भो होगा । नेपाल युद्धके समय यहाँ अंगरेजोका स्कन्धावार उतनो ही दूर तक रखो जायगो। यह वही दोधिका है। था। इस ग्राममें नोलको कोठी और चोनोका कार- प्रभो रममें उतना अधिक जल नहीं है। इसके एक खाना है। प्रशमें सामान्य जल है और अन्यान्य प्रशोमें खेतो होती शिलानाथ-जयनगरके निकट कमलाके किनारे है। कमला नदो किसी ममय हम दोर्घि काके समीप हो शिलानाथ ग्राम है। वैशाख महोन में यहां पन्द्रह दिन कर हतो थो, बह इसका मब जल निकाल ले गई। तक मेला लगता है। इस मेले में तिरहुतमे अनाज और इसके निकट १३ बीघा जमोनमें शिवधि हके प्रासादका मवेशी तथा नेपालसे लौहपिण्ड, कुठार, तेजपत्ता और भग्नावशेष है। कस्तरी पाती है। मेले में पहले शिवदर्शन के लिए बहुत संहिया-बहरामे ६ कोम दक्षिणा मिडिया ग्राम- सन्यासो आते थे, किन्तु कमलागर्भमें उस मन्दिर और में कराई नदोके किनारे एक कोमको दूरी पर मङ्गल प्रतिमाका लोप हो जान मन्यामी बहुत कम पाते हैं। नामका एक दुग है। इस दुर्ग की परिधि प्राय: डेढ़ मोल ककरोल-दरभङ्गासे ६ कोस उत्तरमें यह ग्राम है। इसके चारों पोर ३०४० फुट चो मिट्टोको दीवार पड़ता है। यहां तिरहुतीय याग ब्राह्मणों का बास अधिक और उसके बाद गहरी खाई है। मङ्गलगढ़के भीतरमें है। कुकी कपड़े के लिए यह स्थान प्रसिह है, नेपाली अभी कोई पहालिका नहीं है, बल्कि वहां खेतो होतो लोग इस कपड़े को अधिक व्यवहारमें लाते हैं। हुसेन- है। किन्तु १॥ से २ फुट तकको बहुतमो ईटे देख. पुर नामक ग्राममें कपिलेखर महादेवका एक मन्दिर है। नेमें पातो है। इसका इतिहास कुछ भा जाना नहीं प्रवाद है कि पुराग्योत कपिल मुनि यहां रहते थे। वे ही जाता है। प्रवाद है, कि बलराजाने दुर्गाधिपति राजा. शिव प्रतिष्ठाता माने जाते हैं । माघ मासमें यहाँ एक मङ्गलको परास्त और विनष्ट किया था ! गढ़के पूर्व में मेला लगता है, जिसमें कुकी कपड़े, पीतल के बरतन और नीलकी कोठी है। अनाज प्रादि बिकते हैं । यहांको पुष्करिणो में मोखना पहियागे-कामटोन ग्रामके दक्षिण पूर्व में यह ग्राम मामक एक प्रकारका सुखाटु फल उपजता है। अवस्थित है। यहाँको लोकसंख्या प्रायः ढाई हजार दरभङ्गा-यह तिरहुतमें सबसे बड़ा नगर है। यह है। वैसाख महोममें पहल्याम्यान वा मिहेश्वर नामक अचा० २६१०० और देशा० ८५५४ पू०में छोटी स्थानमें एक मेला लगता है जो केवल एक दिन तक रस्ता