पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५७२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


तिककोइलूर ( निरुको बिलूर तिवर्षणगोई उनका भार बाये पर पर पौर दहिना पैर ब्रह्मनोक : उत्सव मनाया जाता है जिसमें दूर दूरको लोग पाते है की ओर फैला हुआ है। प्रतिमाके पास हो पायोनि सिबकोहर । एक प्राचीन ग्राम, जो मदुग जिलेके मध्य- समकाटि ऋषि पूजा कर रहे हैं। माघ मामको शुक- वर्ती शिवगङ्गामे ८ कोस उत्तामें अवस्थित है। यहाँका पसमोसे ले कर पूर्णिमा तक विष्ण के वार्षिक उत्सव, शिवमन्दिर बहुत विख्यात है। यहाँक शिलालेख के पढ़नेमे दोलोत्सव, रथोत्सव धादि बहुत ममारोहमे मनाये माल म पड़ता है कि रघुनाथ तिरुमलय मेतपतिने १६०१ जाते हैं। में मन्दिरके खर्च के लिये बहुत जमोन दान को थो । यहाँ नित्य वेदपाठ और देवनत कियोका नाचगान तिसकरकाबूर-तचार जिने के अधीन कुम्भ कोषमी ७ कास हमा करता है। प्रति शनधारको अभिषेकादि का उत्सव दक्षिण पश्चिममें अवस्थित एक ग्राम । यहाँ एक अत्यन्त होता है। उस दिन वहाँ बदत मनुष्योंका समागम प्राचीन शिवमन्दिर ओर उममें एक शिलालेख है। होता है। इस मन्दिरके खर्च के लिये गवर्मेण्ट प्रति- सिरुबारकुगडम चेङ्गालपट्ट, जिलेके मध्यवर्ती चेङ्गलवा, वर्ष १८सीरुपये देती है। मन्दिरकै धर्मकर्ता को उता शहरसे कोम दक्षिण पूर्व में स्थित एक मनोहर प्राचीन रुपये खर्च करनेका अधिकार है। यहाँ विल्वपुर गुण्टा- ग्राम । यहां हिन्दूराजा कि भमयका एक बड़ा मण्डप है कुल रेलवेका एक स्टेशन है, जो पेवर वा पिणाकिनी जो पहाड़ बाट कर प्रस्तुत किया गया है। इसके मिता नदीके बाये किनारे देवनूर नामक ग्रामके ममोप यहां एक सुन्दर शिल्पकाय युमा प्राचीन मन्दिर है। प्रवखित है। स्थलपुराणमें वर्णन है, कि पूर्व समयमै तिरबाट पक्षो--सञ्जोरसे ६॥ कोस उारमें अवस्थित एक बालविल्य महर्षियोंने देवभर ग्रामके निकट पिणाकिनोके प्रसिद्ध ग्राम । यहां चोलराज-मिमि त एक प्राचीन शिव. किनार तपस्या को थो; लेकिन तपस्या करने के स्थानका मन्दिर है जिसमें खुदा हुमा शिलालेख देखा जाता है। पता नहीं चलता। बहुतये यात्रो यहाँक शिवलिङ्ग देखने के लिये पाते हैं। इतिहास-पहले यह शहर जिझोके हिन्दू-गजाओंके तिकारवाशाल-सखोर तिरुवाल रेल सेशनसे 84 कोस अधीन था। पोछे विजयनगरके राजाओंके हाथ लगा। दक्षिण अवस्थित एक ग्राम। यहां शिवमन्दिर है प्राय: १५५४ में गोलकुण्डाके सूबेदारने बेल रके जिममें प्राचीन कालका शिलालेख पाया जाता है। मरसिंहरायको जोत कर जिलोको मुसलमान राज्यभुक्ता तिरुकोलाडि-मदुरा जिलेका एक अत्यन्त प्राचीन ग्राम कर लिया और पाप वहांक नवाब बनाये गये । वे हो जो मदुग शहरम १५ कोम उत्तरपूर्व में अवस्थित है, यहांक सामनकर्ता थे। १६७७१ में शिवाजोन जिञ्जो यहांके प्राचीन शिवमन्दिर पाण्ड य गजाकि समयके अधिकार कर वहाँ एक सुहढ़ दुर्ग स्थापन किया। खुद हए वहसमे शिलालेख है जिनमेंमे दो त्रिभुवन शिवाजी स्वदेशको लौटते समय वहाँ एक शासनकर्ता छोड़ चक्रवर्सी सुन्दर पाण्डाके १९३ और २०वें वष में तथा पाये थे। किन्तु उनके पाने के बाद ही मुमतमान शामन एक त्रिभुवन चक्रवर्ती वोर पागडदेवके गज्यस्थ ३१वें कनि रस, पर अपना अधिकार जमा लिया। जिजोक वर्ष में उत्कीर्ण हुए है। हिन्दू राजाधान हो यहाँका मन्दिर स्थापना किया था। तिरुचङ्गगोड.-- सलेम जिले के अन्तर्गत तिरु चोड़ तालु. भिगिडवनम रेल मोशनमे तिरुवनमालय की ओर २८ कका मदर। यह मक्षा ११.२२४४४. पोर देशा. मोल दूरमें भग्नावशिष्ट जिलोका दुर्ग है। ७७५६२० पू० शागिरि दुर्गसे साढ़े तीन कोस दूर तिरकोल र विष्ण मन्दिरमे पाध मोलकी दूरीमें एक अंचे पर्वतके मोचे समतलभूमिसे १२०० पुट ऊंचे पिशाकिनी नदोके किनारे किसुर ग्राम अवस्थित है। पर अवस्थित है। शहरमें तथा गिरिचूड़ामें कई एक यहाँ एक पुरातन शिवमन्दिर विद्यमान है। यह मन्दिर शिवमन्दिर है, जिनमो नारोखरके मन्दिर में १५२२मे लगभग ५०० वर्ष का होगा। मन्दिरका प्रबन्ध सुचक १५८१ शक में उत्कीग बहुतसे शिलालेख है। कैलास- रूपसे चलाया जाता है। फाला न मासमं यहां एक माधबारके मन्दिरमें भो कर एक शिलालिपि है, जिनमें