पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५७५

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मिर-विक विपति पश्चिममें अवस्थित एक पाचीन ग्राम । यहाँ एक बात बारसे मौत दूरोपराया पहाइवे पर बौनिवास- प्राचीन शिवमन्दिर है जिसमें बहुतसे शिलालेख देखने देवका मन्दिर प्रतिष्ठित । स पहाड़ तिरमलय पाते है। नामसे प्रसिद्ध है। यानि तिरुपति मोल पूर्वमे तिरुनाह लम्-दक्षिण पाटके अन्तर्गत तिनकोरतरले तिरुमलय पर पढ़ने के लिए चार मकान मार्ग । ६॥ कोस दक्षिण-पूर्व में पवखित एक प्राम। यहाँ पहला मार्ग मित्र तिरुपनि उत्तरकी तरफ, दूसरा अत्यन्त प्राचीन शिवमन्दिर पोर जनमन्दिर । शिव- बद्रगिरिवी बोरसे पूर्वोत्तर दिशाम, तोसरा नागपानसे मन्दिरमें बहुतसे बड़े बड़े शिलालेख। यदि परिमको तरफ पोर चोया मार्ग पापाले पूर्वको तरफ म्बलपुराणमें जैन मन्दिरका माहामा वति। . के सिवा पोर भो की एक शेटे शेटे मान। तिरुनवारि-मलवार जिलेके पोमानी तानु प- स पर पढ़नेको सोही निज तिवपतिले १ मोल दूर गंत एक प्राचीन पाम । यह सहिपुरम पोर तीवट रेलवे बोगोरस पाएको सात प्रधान बिखरें। प्रत्येक सुगमके बोचोबीच अवखित है। माँवके पास बीपि मिसर भित्र भिक मामले प्रसि। नमसे वापस विके अपर एकबाँधापाले प्रति-बारा वर्ष यसमें नामकी थिबर पर बोनिवामदेवशा मन्दिर रसलिए 'राज्याभिषेक उपलक्ष्य में यहाँ नरवलि होतो यो। लगः कोई कोई से वापसम्' भी वातास पवंतवा भग २०० वर्ष हुए, यह प्रथा सदाके लिये बंद हो गई दूसरा नाम 'बाट।। सान्दपुरावोय बाटाद्रिमाला- है। इसके पास हो एक पहाड़ोकन्दरा सी जगह स्पमें सवा विवरण इस प्रकार लिया - ठहर कर राजा बलि देखा करते थे। गाँव रामचन्द्र किसी समय विशु पापुरमै रमाके साथ जोड़ा कर जोका एक मन्दिर है। थे। शेषमाग पुरखार पर हाररावे लिए नियुत थे। तिहमामवर-दक्षिण पार्कटके अन्तर्गत तिरकोर बसनेम वायुरी पाकर पन्तःपुरम प्रवेश करनेकी पटा सूर शहरसे प्रायः १० कोस दक्षिण-पूर्व में अवस्थित एक की। शेषमागने में भीतर जानिके लिए निवध किया, प्राचीन ग्राम । यहाँ एक शिवमन्दिर है, जिसमें बहुतसे शिन्तु वायु सनको बातंकी कुछ भी परवाह न कर प्राचीन शिलालेख है। .१९५४ से पहले भी जबरन भोतर जानियो कोमिम बरने लगे। दोनों खूब यह मन्दिर विद्यमान था, क्यों कि म के उत्को झगड़ा होने लगा। सा-गब्द सन कर विचार पर शिलालेखमें पुरोहितों के साथ देवसेवाके प्रबन्धकी कथा. पाये और कहने लगे-"तुम लोग विवाद को कर रहे वर्णित है। इसके सिवा विकत सबमरमें उव्वोयं महा- " विण ने विवादका कारण जान कर शेषरे मण्डलेश्वर नरसिहदेव और चोलराज कोरि-नगर- कहा-“सारमें वायु ही सबसे बलवान है।" शेषने कोण्डनको कई एक पनुयासम-लिपियो । कहा-"भगवन् ! दोनोंमें कौन बसवान पारसका तिरुनागखर-सप्लोर जिला कुम्भकोणम तालुकके पन्त- प्रत्यक्ष कर लीजिये। जामदतटमें व्याटगिरि, में गत एक शहर। यहांको जनसख्या प्रायः छ पार उसे धेरै रगाः वायु यदि मुझो स्थानचत कर सके तो है। जिलेमें यही वन बुननेका प्रधान स्थान है। यहां समझगा वह सबसे बलवान है।" मेषनागके व्याट- प्राचीन शिवमन्दिर भी है। गिरिको वेष्टित करने पर वायुगे उन प्रयासगसे बड़ा तिकनिरहयर-एक प्राचीन पाम । यातचोर जिसके बुध- बर पचास हजार योजन दूर, दचिवसमुद्रसे १२ योजन कोणसे ढाई कोस दक्षिण-पूर्व में प्रवस्थित है। यहां उत्तर पूर्व समुद्रके पचिमभागको सुवर्षमुशी नदीके शिवमन्दिर है जिसमें प्राचीन कालके शिखालेख । वामभागमें फेंक दिया । वका शरीर विदीर्वो गया। तिरुपति (विपति)--उत्तरं पार्कट (परकार) निलेका एक वे अपनेको अपमानित समझ बणाने बियमाण हो गिरि- प्रधान वैष्णवतोर्थ पौर चन्द्रगिरि तालुकमा प्रधान यार। पर भगवान विणुका धान करने लगे। विण ने यहां पाकास गधन बाम-रवका एक शन, जो प्रसव होकर उनसे वर मांगनेके लिए कहा। मेवने या