पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५७६

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२७२ तिरुपति (विपति) वर मांगा कि "पाप जैसे मेरे कुण्डल पर वैकुण्ठ में मर्वदा धारण करना चाहिए। गेमा प्रवाद है, कि. पों अवस्थित है, उसी तरह व्याटस्थित शैलरूप मेरे शरीर स्वामितोय में खान करनेमे वर काटा उसके कपोल- पर मदा वास करें।" भगवान् 'तथास्त" कह कर तभोसे देशसे अपने पाप खुल जाता है। कपिल- गाचा हाथमें लिए शेषाचल पर वास करते हैं। वे तोर्थ के पीछे जो वृहत् गोपुर है, वह पालपिलि नाम व्याटगिरिके अपर है, इसलिए व्याटेश वा व्याटपति से प्रसिद्ध है। हम गोपुरक हार तक सब येणोक मनुष्य कहलाते है । वराहपुराणमें लिखा है वे तायुगौ योराम- आ मकते है। इसके पागे हिन्दुओं सिवा अन्य किमो चन्द्रने लगा जाते समय अपने दल-महित स्वामितोर्थ में भी जातिको गति नहीं है। इस जगहसे जपर चढनके मान किया था। इस पुराणके ४१वें अध्यायमें यह भी लिए पक्को मौढ़ो एक होतो है। यह सोढ़ी करोब एक लिखा कि पाण्डवोंने वनवामके समय इम पर्वत पर मोल लम्बो और समतल भूमिसे १ हजार फुट ऊँचो एक वर्ष तक वास किया था और जिस तो/तट पर वे लोगो । बीच बीच में विश्राम थान भी है।सोढोके मच्चि थे, उसका नाम है पाहवताथ । स्कन्दपुराणाके व्याटा- स्थानमें एक वृहत् गोपुर है जो “गालि गोपुर"के नामसे पक्षमाहात्म्यमें लिखा है.. गमानुजाचार्य ने व्यङ्गटशल मगहर है। इसके पोछे वकुण्ठ नामक मन्दिरमै राम पर जा कर पाकाशगङ्गाके किनारे विष्णु के पञ्चाक्षर मणको मूर्ति विराजमान है। इस मन्दिरके ईशान मन्त्रका ध्यान किया था और विष्णु ने तुष्ट को कर उन्हें कोणमें वैकुण्ठ-गुहा नामक एक गुफा है। योरामचन्द्र दर्शन दिये थे। रामानुजने कलिके ४११८ अब्दमें जन्म के पोशल पाने पर उनके अनुचरगण सो गुफामें ठहरे लिया था। इस हिसाबसे ८०० वर्षे से पहले भी यह स्थान थे। इस स्थान में व्यङ्गटेशक मन्दिरको जानको पक्को महातीर्थ के मामसे प्रसिद्ध था। सड़क है। पर्वतखोके भित्र भित्र स्थानमें झरना और उसके तिरुमलय गिरिस्थित नगर बहुत मामूली है। यह नीचे बड़े बड़े जलाशय है, जो पुण्यतोष के नामसे स्वामितोथ के व्यङ्कटस्वामोके मन्दिरके चारों तरफ अव- प्रसिद्ध है। इनमें मात तीर्थ प्रधान है,-१म स्वामि- स्थित है। यहाँ रिन्दुअकि सिवा अन्य कोई भी जाति वास तीर्थ , २य वियद्गङ्गा, श्य पापविनाशिनो, ४थ पाण्डया नहीं कर सकता। यहाँको जनसंख्या १६ हजारमे तो, ५म तुम्बारकांण, ६ष्ठ कुमारवारिका और जम ज्यादा न होगो। यात्रियाँ टहरने के लिए यहाँ बहुत गोगर्भ । स्वामितीर्थ १०० गज लम्बा और ५० गज चौड़ा में छत्र है जिनको महिमर और कोचोनके राजा तथा है। इसके चारों तरफ ग्रेनाइट-पत्थरको सीढ़ियां बनी कालहस्ती और व्याटगिरिक जमींदारनि जनवा दिया है। हुई हैं। यह तीर्थ देवालयकं पास ही है। यात्रिगण मन्दिर पाल में सहस्रस्तम्भ मण्डप हैं, इसका शिल्य- समें मान किया करते हैं। पापविनाशिनोतोथ देवाः नं पुण्य उत्तम है। यह ग्रेनाइट पत्थर के स्तम्भ पर विस्तृत लयसे ३ मोल दूरी पर एक मामान्य जलप्रपातक नीचे है। रास्ते को तरफ प्रत्येक स्तम्भ पर मुत्ति खुदो हुई है। अवस्थित है। रम जल प्रपात में मोचे खड़े हो कर नान इस मगडपका एक अश गिर पड़ा है। एक लाख रुपयेसे करनस ब्रह्महत्या पादि महापातक विनष्ट होते हैं। इसका जोर्ण संस्कार हुआ है। इसके एक बगल एक अपूर्व यहां ऐसा किम्बदन्तो है कि, पापके तारतम्यक हेतु अन्न- प्रस्तररथ पड़ा हुआ है । चन्द्रचोल नामका किसो राजा. का वर्ष तक मलिन हो जाता है । पहाडके पूर्व को पोर ने इस प्रस्तर रथको बनवाया था। यहाँक स्वामितीर्थ- जो जलप्रपात है, वही तुम्बरकोण (तुम्बिरकोण) कर. में खान करना चाहिये। तोनी देवालय भित्र भित्र लाता है। स्थलपुराणके मतसे-पहले ऋषिगण यही प्राचोरोसे वेष्टित है। बाहरकी दीवार काले ग्रेनाइट वास करते थे। इस समय यह स्थान जङ्गलसे भरा हुआ पत्थरकी बनी है जिसके एक पाखं में एक बहत् अनु. है। यहां कोई मावत करनी हो, तो कपिलसोथ में सान शासमलिपि खुदी हुई है। इसके द्वार पर एक साधा- करके वर्म वा रौप्यनिर्मित बाटेपका काँटा गसमें रणगापुर है। यह प्राचार १३७ गज लम्बो पौर ८७