पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५८६

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५८२ तिरूवरक्षा, तिरोभाव तिरुवन-उत्तर-भाट जिन्ल के वेलर गरसे ५ को जाता है कि यह मूर्ति स्वर्ण सोताके अनुरूप है। यहाँ उत्तर-पूर्व में अवस्थित एक ग्राम और रेलवे स्टेशन। भी कई एक शिलालेख देखे जाते है। यहा के विश्वनाथेश्वर स्वामीका मन्दिर प्रत्यन्त बड़ा है। तिरूर-मन्द्राजके मलवार जिने के अन्तर्गत पोनाई तालु- उसकी दीवार पर बहुतमे अम्पष्ट शिन्नानख खुदे कका एक ग्राम । यह प्रक्षा० १०५३ उ० ओर देगा. ७५५६ पूमे अवस्थित है। लोकसंख्या लगभग ४४४४ तिरुवन्न वर-एक प्रमिह तामिन कवि और दाश निक है। यह एक रेलवेष्टेशन है। . त्रिवल्लूवर देखो। तिरूरङ्गाड़ी-मन्द्राजके मलवार जिले के अन्तर्गत पर्णाड़ तिरुवाकोड़-मन्द्राज प्रदेशकै विवाङ्गड़ राज्यका एक तालुकका एक शहर । यह पक्षा० ११२ उ. और देशा ग्राम । यह पक्षा०६१५ उ० और देशा० ७७ १८'पू० ७५ ५६ पू०में अवस्थित है। लोकसंख्या प्रायः ५४०० विवन्द्रम् शहरसे २५ मोल दक्षिण पूर्व में अवस्थित है। है। वहां डिपटो-तहसीलदार और महकारी मअिष्ट्रेटको यहांको जनसंख्या १८३८ है। यह विवाड़ राज्यको अदालत तथा प्रसिद्ध माविल्ल फकीर तारामल टङ्गाल को प्राचीन राजधानो है। यहां एक प्राचीन शिवमन्दिर है एक ममाधि है। मछली, सुपारी और नारियल यहाँका जिसमें बहुतसे शिलालेख भो खुटे हुए है । त्रिवाकर देखो। बाणिज्यद्रव्य है। तिरुवाल र--१मन्द्राज प्रदेश के तमोर जिलेके अन्तर्गत तिरंदा (हि.प.) समद में तरसा हा पोपा । समुद्रका नागपट्टन तालुकका एक शहर । यह प्रक्षा० १०.४६ उ० पानी जहां छिछला रहता है वहौं पर मंकेत के लिये यह पोर देशा० ८.३८ पूमें तमोर नागपट्टन रेलपथ पर रखा जाता । २ मछलो मारनेको वमोम वधो हुई अवस्थित है। यहाँको लोकमख्या प्राय: १५४३६ हैं। पाच छः गुम्नको लकड़ो। यह लकड़ो पानी में तैरतो यहां डिपुटो तहमालदार और जिले के मुनसिफ रहते है। रहती है और रम के डुबनेसे मछलोकं फसनेका पना यहां चावलको कल, हाई स्कल तथा बहुतसे प्राचीन लगता है। देव मन्दिर है। तिरै (हि. पु.) फोलवानोंका एक शब्द । जिसे वे नहात २ चेङ्गलपड जिले में और एक विष्णुधाम है, वह भी हुए हाथियोंको लिटानमे प्रयोग करते हैं। तिरुवाल र नाममे प्रसिद्ध है। यह मन्द्राजसे १३ तिरोत्रका (वै. त्रि.) प्रहनि भव' पक्का भवेच्छष्ट- कोसको दूरी पर अवस्थित है। यहांको लोकसंख्या मोतियत्। तिरोहितोऽकाः। एक दिनसे अधिकका। प्रायः पाँच हजारसे अधिक नहीं होगा। यहां एक रेल निरोगत (म०वि० ) अदृश्य, गायब । स्टेशन भी है। यहांको विष्णु मूर्ति देखने के लिये दूर तिरोजन (स अव्य० ) मनुषासे पृयक् । दूरक मनुष्य पाते है। यहाँ उत्सापनाशिनो नामका तिरोध ( सं स्त्रो.) तिम्-धा-विप । अन्तर्धान, अट. एक तीर्थ है। प्रवाद है, कि शालिहोत्रज ऋषिन बहुत शन। समय तक इस तापमाशिनोक किनारे कठोर तपस्या को तिरोधातव्य । स० वि०) तिरम-धा-तव्य। पाच्छादन, थो। तपस्यासे सन्तष्ट होकर विष्ण ने उन्हें दर्शन दिया। योग्य, ढाकन लायक । ऋषिन वर मांगा कि इस सरोवरमें खान करनेसे महा- सिरोधान ( म० लो० ) तिरम् धा-भाव ल्युट । अन्तर्धान, पापोका भो पाप दूर हो । विष्णु उनके मस्तक पर हाथ ' प्रदर्शन, गोपन । रख 'ऐसा ही होगा' कह कर अन्तहीन हो गये। तभोसे . तिरोधायक (म. पु. । गुग्न करमेवाला, छिपानेवाला। या तीर्थ इत्तापनाशिनो नामम प्रसिद्ध है। यहांको पाड़ करनेवाला । अनन्तशायी चतुभुज विष्णु मूत्ति का एक हाथ मालि- तिरोभविष्ट ( स० वि०) तिरस भू-टच । १ तिरोभाव, होत्रज ऋषिकं मस्तक पर रखा हुआ दोख पड़ता है। अन्तर्वान । २ गुप्तभाव, गोपन, छिपाव । एक मन्दिरमें कनकवलो देवी विराजमान है। कहा । तिरोभाव (म.पु. ) तिरस भू-भाव घम् । १ अन्तर्धान,