पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५८८

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५४ ति-निर्व मैठक; (जलचर- ) मकरादि जन्तु ; ( नभचर-) तिथंग्ज (म. वि. ) तिक्षक जन छ । १ जो पणे रत्वा- गोध, बगला, मोर, भ, कोवा, पंचक इत्यादि। दिसे उत्पन्न हो । (पू.) पक्षो इत्यादिको जाति । तिर्य ग ( स० पु. ) तिर्यग ग, कुटिलगामो पशपमधादि, तिग्जन ( स० पु. ) तिर्यक जनः कर्मधा० । कुटिल, वे पशुपक्षी जिनको चाल टेढो हो। कपटी मनुष्य पादमी। तिय गतिकम (म• पु.) जन्मतामुमार टिग्वतके पांच तियग्जाति ( २० स्त्रो०) तिरश्चां आति ६-तत्। पक्षि- अतीचारोमिम तोमग प्रतीचार। पर्वतादिको गुफापों जाति। तथा सुरंग आदिम टेसा जाना, जिममे व्रतमें दोष लगे, तिर्य ग्दिश (सं. स्त्रो.) तिर्यक दिश-क्तिप । उत्तर- तिर्यक-अतिक्रम लाता है। (तत्त्वार्थसूत्र १३.) दिशा। तियगम्तर (स. क्लो. ) दो द्रव्यां के मध्यस्थानका परि. तिर्यग्धार (म पु० ) तियं क -धन । वक्रधार, जिसका माण। किमारा तेज हो। तिर्यगयन (म. ली.) तिरयां अयम, ६ तत्। १ पशु- तिर्यग्नासा (म. स्त्रो०) तिर्यक नासा यस्य, बहुव्रो । वह पक्षियोको गति तिर्यक अयन कर्मधा० । २ वक्रगति, जिमको नाक तिरछी या टेढ़ो हो। टेढो चाल। तिय भागवातिक्रम (म. पु. ) सागारधर्भामृत नामक तिर्यगागत (म त्रि. ) तिर्यक वक्रभावेन भागतः। जैम अन्यमें वर्णित अतोचा भेद । जो वक्रभावमे पाता हो। नियंग्यवोदर (सं. क्लो०) जोका दाना (Burley corn) तिर्यगोक्ष (म त्रि.) तिर्यक् रक्ष-अच् । वक्रमावसे तिर्यग्यान ( स० को०) तिर्यक याम यस्य, बहुवो । देखना, जो तिरछो नजरमे देखता हो।' कुलोर. केकड़ा। तिर्यगोश (म पु० क्वष्णका एक माम। तिय ग्योन ( स० पु. ) शकमारिकादि पक्षो जाति, मोता तिर्यगेकादश जनमतानुसार ग्यारह तिर्यक प्रातियों का और मेना पक्षोकी जाति। नाम । तिर्यञ्चगति प्रादि २, एकेन्द्रियादि जाति ४, प्रासाप तियग्योनि (स'• स्त्रो०) पशुपक्ष्यादि तिर्यक जाति । उद्योत, स्थावर, सूत्म और माधारण --ये ११ तिर्यक प्रक- एहस्थ यदि ब्रह्मचारियोका वेश धारण कर भिक्षादि लिया है। इनका उदय तिर्यञ्चगतिमें ही होता है; इमोसे हारा जीविका निर्वाह करें, तो वे नियंग्योनि को प्राप्त 'तिर्यगेकादश' ऐसा पड़ा है। होते हैं। पशु, पक्षी, मृग, मरीसृप और स्थावर इन्हीं (गोम्मटसार कर्मकांड ४१. ) देखो। पांच भागों में तिय क योनि विभक्त है। तिया (म त्रि.) नियंक, गच्छति तिय क-गम-ड। तियग्योन्यन्वय (म पु०) तियक योनोनां अन्वयः ६ तत्। कुटिलगामी, जिमको गति टेढ़ी हो। पशुपक्ष्यादि जाति। लियंग्गत (म'• वि.) तिर्यक वक्रमावेन गतः । वक्रगामो। तिर्यग्विड ( म. वि. ) सिय क भावन विहः । सुश्रुतोत तियग्गति (म स्त्री०) निरखो गतिः, कम धा०।१ वक्रा- एक प्रकारका शिगवेध । तियं क (वक्र)-भावसे शस्त्र. गति, तिग्छो या टेडो चाल। कम वग पशु योनि प्राप्त । पात होनसे यदि समस्त अङ्ग कट जॉय, केवल थोड़ा हो तिर्यश्चगति देखो। (नि.)२ लियं क गति यस्य । ३ वक्र- बच रहे तो उसे तिर्यक विद कहते है। यह तिय वेध गमन योन, जिभको चाल टेढी हो। अत्यन्त दूषणोय है । (सुश्रुत चिकि० ८अ०) २ जो तिर्यक - तियं म्गम (म० को. ) तिर्थक गम गमन। वक्रगमन, भावसे विश्व किया गया हो। टेढोचा। तिया नास ( स० पु० ) वह जिसको नाक टेढ़ी हो। लियम्गमम (स' क्लो०) तिर्यक गम्-न्युट । १ वक्र गमन, तिर्यच (पु.) तिरो प्रति-तिरम अलिप . तिरमः टेढी चाल (त्रि.) तिय क गमन यस्य। २ वन। तिरि पादेशःण लोक्छ । विश प्रभूति, पक्षो गतिधोरबायु। सत्यादि । पाप करने पर मनुष पचो-योनिमें जनता