पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५८९

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मालकाचान् कोह-विदि शूल ग्रामके पास ही एक बड़ा प्रस्तर निर्मित पहालिकाका तिवहोर-या स्थान विवाह, गज्यके पानाभतोम भग्नावशेष पड़ा हुआ है। ४ कोस उत्तर-पश्चिममें पवस्थित है। यहां तामिल तिरुमालकारतान् कोह-मदुरा जिलाके रामनादसे १७ पक्षरमें लिखे हुए दो प्रस्तरस्त । इस पलावा कोस पविममें अवस्थित एक ग्राम। यहाँ एक पति यहाँ एक ईसाइयोका प्राचीन गिर्जा भो है। पहले इस सुन्दर भास्करन पुण्ययुक्त पुरतन शिवमन्दिा है और प्रदेश में एक कुप्रथा थो कि उच्चयोको हिन्दू-रमणियोंक उसमें बहुतसे शिलालेख है। किसा निर्दिष्ट दिनमें बाहर निकलने पर पुलिया मामक तिरुमुक्कडल-विशिरापल्ली के कूलितलय.शहरमे ८ कोस मोच दास जाति उन्हें पकड़ कर ले जाती थी । यहाँके पश्चिममें एक पुण्यस्थान जो पमरावतो और कारो नदो. एक शिलाले खमें इस कुप्रथाको रोकने के लिये स्थानीय के संगम स्थान पर अवस्थित है। यहाँके प्रति प्राचीन राजाको पोरसे कठोर पाद श दिया गया है। शिवमन्दिरमें बहुतमे पिलालेख मिलते है। तिवद्यार-विवाज के अन्तर्गत कला लम्से ३॥ तिरुमुरुगनपूगिड़-कोयम्बतुर जिन्न के तिरुपुर रेल-टेशन- कोस उत्तर-पथिममें अवस्थित एक ग्राम। यहाँ पनिक मे २ कोस उत्तर पश्चिममें अवस्थित एक ग्राम । यहाँके प्राचीन देवमन्दिर है जिसमें गिन्नालेख भो देखे दो प्राचोन मन्दिर में बहुत मे शिलालेख देखे जाते हैं। जाते हैं। तिरुमूर्ति कोविल-कोयम्बतुर जिले का एक प्राचीन तिरुवड़न्दै-चेलपह, जिले के चङ्गालपड शहरसे कोम ग्राम। यह अक्षा० १०२७ उ० और देशा० ७७१२ उत्तर पूर्व तथा कोवलासे ५ कोस दक्षिण-पश्चिम समुद्र पूमें अवस्थित है। यहाँ एक बड़े भोर सुन्दर मन्दिर के किनारे स्थित एक ग्राम । यहाँ एक प्राचीन शिव ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरको मूर्ति या विराजमान हैं, मन्दिर है जिनमें उत्कोण पिलालिपि भी देखो इन्हों के लिए यहाँका स्थान मशहर है। स्थलपुराणम' जाता है। इनका माहामा मविस्तर वर्णित है। यहाँ प्रति रवि. तिरुवड़दूर-तमोर जिने में कुम्भकोणम् तालुका के पन्त. वारको यात्री जुटते हैं। र्गत एक शहर । यह पक्षा० १९ उ. और देशा० ७८ देवताके वार्षिक उत्सव ममय यहां हजारों मनुष्य २७ पू० कुम्भकोणम् शहरमे ३ कोम उत्तर-पूर्व वोर एकत्र होते हैं। यहांक सहस्र स्तम्भ मण्डप देखने सोलनार नदों के किनारे अवस्थित है। यहां रेलवे मधन योग्य है । ग्राम पाम हो एक पहाड़ है। पहाड़ पर कहीं है। लोक मख्या प्रायः ११२३७ होगो। यहाँ एक पनि कहीं विष्णु के पदचिन्न खुदे हुए दोख पड़ते हैं। प्राचीन शिवमन्दिर है । जिममें तामिल भाषा उत्कोणं तिरुमोकूर-यह ग्राम मदुरा जिले के मदुरा शहरसे २ १५४४ के रामराज वल देवराय के राजत्वकालका कोस दक्षिण-पश्चिममें पवस्थित है। यहां अति प्राचीन एक शिलालेख मिलता है। मन्दिरका शिल्प-नेपुण्य शिवमन्दिर और विष्णु मन्दिर है। दोनों मन्दिरों में देखने योग्य है। इसके सामने एक सुन्दर गोपुर।' बहुतसे शिलालेख मिलते हैं। एक शिलाफलकमें तिरुवड़ि- तिरूव यार देखे।। लिखा है कि १६२२ में दलवाय सेतुपतिने यहांक तिरुवड़ि शूल-एक ग्राम । यह चङ्गाग्लपह, जिले में चहल- शिवमन्दिरका मस्कार किया था। पटुतालुकके पूर्व एक पहाड़ पर अवस्थित है। यहां तिरुवकर-दक्षिण-प्राकट जिले के विल्वपुरम पारसे एक प्रमिह मन्दिर है। कहा जाता है कि कुरुनने कोस उत्तर-पश्चिममें अवस्थित एक ग्राम। यहां एक यहाँ भी एक दुर्ग ११वों मदो निर्माण किया था। प्राचीन शिवमन्दिर है। जिममें एक गोपुर भी है पौर विजयनगरके प्रतापके ममय दो सार यहकि दुर्गका उसके चारों ओर पनिक तरहके शिलालेख दृष्टिगत मंस्कार कर विजयनगरके प्रभुत्वको अवहेला करते थे । होते हैं। कहा जाता है कि यह मन्दिर वेरके किमी विखामघातकमे उनका नाश होने पर दुग भो विनष्ट राजा द्वारा निर्माण किया गया है। हो गया। स विषयको पनेक कहानियों सनो जाती। Vol. Ix. 145