पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५९५

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विरोत- तिर्वोतर १८३ पदर्शन, लोप। २ पाच्छादन। ३ गुनभाव, हिपाव। तियं वा (स'• स्त्रो० तियं भावे तल । बनत्व, तिरछा. तिरोभूत (म. वि. ) तिरस भूत। पन्तहित, गुप्त, पन, पाड़ापन । छिपा हुपा। ' तिर्यकत्व ( स० लो० ) तियं च भावख। १ वक्रत्व, तिगेग-मध्य प्रदेश भण्डारा जिलेको उत्तरोय तहसोल। तिरछापन। यह पक्षा० २१.१०और २१४० उ० तथा देशा० तिय गति ( स. खो. ) तिरखो गतिः कर्मधा । वन- ७.४३ और F०४.पू०के मध्य प्रवस्थित है। भूपरि गति तिरको चाल । माण १३२८ वर्गमील और लोकसख्या प्रायः २८१५२४ निर्यक पातो (म० वि०) तिर्यक् पतति पाणिनि । है। इस तहसीलमें ५७१ ग्राम और ११ जमोदारियों ।। १ वक्र प्रमारित. पाड़ा फैलाया हुपा।२ कुटिलतिता, जमोदारोष्टेटका रकवा ७६८ वर्ग मील है, जिसमें १६९ जो कुटिल वृत्तिका हो। वर्ग मोल जंगल है। तिर्यक प्रमाण (म'• लो. ) तिर्यक् प्रमापः कर्मधा। तिरोवर्ष ( स० वि० ) तिर: तिरोहितः वर्षाः यत्र । वृष्टिः विस्तार-प्रमास, चोड़ाई। से रक्षित, जिसका बरसासे बचाव हुपा हो। तिय कमेक्षण (स० वि०) तिय क प्रेक्षण यस्थ, बहुप्रो । रोशित ( वि.) तिरम-धा-ना । १ अन्साहित, प्रदृष्ट, वनाष्टिकारी, तिरो नजर से देखनेवाला। छिपा हमा। २ पाच्छादित, ढका हुषा। तिर्यक प्रक्षो (सं. वि.) सिय क्या यथा तथा तिरो -तिरोत्राहा दे।। प्रेक्षते प्रति णिनि । वनदृष्टिकारो, जो तिरछो मजरसे तिरौदा (हि.पु. ) तिरेंदा देखा। देखता हो। .. तिय क भेद (म. पु० ) दो पाधार पर रक्लो हुई वसका तिरौर-पञ्जावक कर्नाल तहसील और जिले का एक बीचमें दबाव पड़नेसे टूटना। ग्राम । यह प्रक्षा० २८४८३० और देशाः ७६५०पू०. तिर्यक लोक (सं० पु. ) जनमतानुमार वह लोक जहाँ के मध्य पानसेर से १४ मोल दक्षिणमें पवस्थित है। ___ मनुष्य, देव और नारकियों का अस्तित्व न हो। यह लोक- ११८१ ई में अजमेरके चौहान राजा पृथ्वोगजने महमद स्थित नाडोके बाहर है। 'जैनधर्म' शपमें लोरचना' देखे।। घोरको इसो स्थान पर परास्त किया था और फिर तिर्यक व्यतिक्रम (म० पु०) जैनमतानुमार दिग्वतका एक ११८२ ई० में आप भी यहीं पर परास्त हुए थे। इसका पतोचार। तिर्यगतिकम देगे। प्राचीन नाम अज़माबाद है, क्योंकि यहां और जेवक तिय क स्रोतम (संपु० ) तिय क वक्र स्रोतः पाहार- पुत्र प्राज़मशाहका जन्म हुआ था । १७३८ ई० में मादिर चारो यस्य. बहवी । पशुपक्षी प्रभृति। भागवत शाहने इसे नोता था। पहले यह ममृहयालो शहर था, . MAIT लिखा -बिलोगों पाज कल इसको अवस्था शोचनीय है। अर्थात् पशुपक्षियोंक सृष्टि अष्टम है। ये २८ प्रकारक लिय ( म. वि. ) तिल-मिमित. जो तिलका बना हो। माने गये है। ये ज्ञानशून्य तथा तमोगुणविशिष्ट तिर्यक ( म० त्रि०) वक्र, टेढा, पाड़ा, तिरछा । मनुषा । मौमे पाहारादिमाव-परायण । ये कंवस घाणेन्द्रिय को छोड़ पृथिवौके समस्त जीव तिय क् कहलाते हैं हारा ही अपने पर्थ को मिधि करते हैं, उनके पन्तःकारण क्योंकि खड़े होममें उनके शरीरका विस्तार अपरकी में किसो प्रकारका ज्ञान नहीं बनाया गया है। तिर्य- पोर नहीं रहता, पाड़ा हो जाता है। इनका खाया कस्रोतापी के नाम-(दो खुरवाले) गाय, बकरी, भेंस, हुमा पत्र पेटमें सीधे जपरसे नोचको पोर नहीं जा कर सणसाामृग, सूपर, नोलगाय, करु नामक मृग, मेड़ पाड़ा जाता है (पु.)।२ चचल धातु, पारा। पोर अंट: (एक खुरवाले-) गदहा, घोड़ा, खच्चर, गौर सियक चिल (स.बि.) तिय क वक्रमावन बिक मृग, शरभ, सुरागाय ; ( पचन) कुत्सा, गोदड़ भावरे विसजो तिरछा गिरा। भेड़िया, बाघ, विशी, खरक्षा, सिंह बदर, हाधो, कछुवा,