पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०१

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प्रति बोधे २॥ मेर लगता है । सिल पक जाने पर उसे और 'र' यही दो प्रकार तिल मिलते हैं। प्रथम काट लेते और टिया बांध कर ध पमें सुखाते है। जब कारका तिल हो उत्कष्ट होता और प्रोमकामा छोमो कट जातो है, तब तिल झरने लगता है, बाद उसे उपजमा है। उत्तर पक्षकाडु जिसमें बड़े और छोटे- परिस्कार कर अलग रख देते है। तिलका उंठल जम्लाम के भेदसे दो प्रकारका तिन होता है। यहाँ लाठोसे पोट के काममें पाता है। असमय वृष्टि हो, वा फल लगते कर तिन निकालते हैं। इस देशमें ४ मेर सिल में ममय हो, तो इसका बहुत नुकसान होता है। पाखिनमें १मेर सेल निकलता है। यहाँ सभी प्रकारके तेलों में वृष्टि होनेसे तो यह फसल बिलकुल ही नहीं लगती। तिलके तेलका हो पादर यथेष्ट है। यह तेल रसोई में ज्वार वा कपासके माथ बोमेसे प्रति बोधे पाध मन तोम तथा सभी कामों में वावरत होता है। याने पधि- मेर पौर यदि फसत बोया जाय तो १॥ मनसे २ मन तक कांश तिल यू रोपको भेजा जाता है। उपजता है। ___ महिसुरमें बोल एक कार एम' पौर 'गुर एन.' सिन्धुप्रदेश-यहांका तिल एक प्रधान शास्व।सब येही तोन प्रकारको सिल उपनते है। तिलके पोधों को जिलों में इसकी खेती होती है। महमदखां जिलेको जला कर जो राख बनतो है, उसे वे खादको तरस खेत में जमीन तिलके लिए बहुत उपयोगी है। इस जिले में प्रति डालते हैं। अठारह दिन तिलका खेत सींचा जाता है। साढ़े चार तिलका म्यवसाय -तिलका वायसाय बहुत विस्तृत महोने में सिल पकता है और प्रति बोधे २॥ मन उपजता है। बङ्गाल और पासाममें जो तिल पैदा होता है है। नौशहर जिले में तिल पाषाढ़ मासमें सरस उत्बाट उससे कुछ तो बङ्गालमें ही खप जाता है और पधि- अमोनमें बोया आता है। हर एक खेतमें ८ बार जल कांश मन्द्राज भेजा जाता है। मन्द्राज में जो कुछ उप. देना पड़ता है। यहां पाँच महीने में विल पकता पौर जता तथा बागसमे जिसमा भो पाता है उसमेमे बारह प्रति बीघे बोस सेर उत्पन होता है। पाना हिस्सा ब्रह्मदेशको रफतमो होतो। सोसे बम्बई प्रदेशके गुजरात, खानदेश, पूना, नासिक, कर्णा- मन्दाजमें तिलका कावसाय खूब चलता पयोध्या पौर टक, कोहण, रनगिरि पादि स्थानों में तिलको खेती होतो युक्तप्रदेशको उपजमसे कुछ सो बम्बई पोर कुछ बालको है। कनाड़ामें पधिक वर्षा होने के कारण वहां बिलकुल भेजा जाता तथा प्रविष्टाय एसो देश व होता है। तिम्त नहीं होता। सत स्थानों में बाण और श्वेत दोनों मध्यभारतका समस्त तिल बम्बई भेजा जाता है। प्रकारकं तिल उपजते है। धसर तिल केवल गुजरातमें बम्बई में जो कुछ उपजसा तथा जो कुछ प्रामदनी होतो हो होता है। वहां बाजराके साथ मिला कर इसे बोते है, उसमेंसे पधिकांश उसी देशी पर्च होता पौर जो हैं। काठियावाड़ प्रदेशमें खेतमष्ण पौर रत तीनों जाता है, वह यूरोपका रवाना होता है। सिन्धुपदेश- प्रकारके तिल पाये जाते है। खेत तिलका तेल अन्य का अधिकांश तिल युरोप जाता है। यूरोप में तिलसे जिमों के तेलसे मुखादु और अधिक से लद होता है। खोट प्रॉयल, भलिभ ऑयल भादि तैयार कर फिर य पुरबिया सिलकाको उपजता है। इस देश में पाते हैं। विपुराक पार्वत्यप्रदेश तथा कामोर मन्द्रान प्रदेश के गोदावरी जिले में तिलको काट कर प्रदशसे भो तिल भारतवर्ष में पाता है। . अटिया बांधते और ताड़के पत्तों से ढककर पाठ दिन तिलको भूसो मवेयो पादिको खिलाई जाती है। धूपमें रख छोड़ते हैं। पोहे घटियोंको झाड़नेसे बारह पसाब तथा निम्न बङ्गालके गरोब ममुख भूसोको पार्टमें पामा तिल नीचे गिर पड़ता है और जो कुछ रह जाता मिला, पोठी बना कर खात। पश्चिममें इसका . वर भी दो तोन दिन तक धूप खामके बाद बिकता है। झड़ जाता। कोयम्बतोर जिले में क्या दलदल और तिलका भेषनगुण -तिल पर्शरोगका रामवाण है। या सूखी जमोन सभी में तिल उपजता है। यहां 'कार' रहासावो पर्थ में, तिसके पानी में माखन मष कर Vol. Ix. 148