पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०३

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तिल-तिलक

  • समूचे घरोरमें जब एक प्रकारका लोम वा कण्टकवत् भाइम बतलाये जारी । तिल यदि

रोग उत्पन होता है, तब डाकर लोग नारनीसे उन्हें पुरुषके भरोरम दाहिनो पोर पोर स्त्रोक परोरमें बाई' बाहर निकालनेको सलाह देते है। किन्तु यदि उसमें पोर हो तो बम। खोजा तिल सौभाग्यसूचक तिलका तेल प्रयोग किया जाय तो वे सब नरम हो कर समझा जामा । १ सिनतुल्यल्प प्रमाण, तिलक मोचे गिर पड़ते पौर प्रत्येक काटेको जड़में पुमो पड बराबरको कोई वस्तु। ४ एक प्रकारका मोदमा जी कर फट जाती है। पोछे तिलके तेलमे वह पारामो कालो चिन्दीके पावारवा होता है। खियो शोभाके जाती है। जो तेल भूसो रहित सिलसे निकलता है, लिए इसे अपने गाल टुण्डो पादिमें गुदातो है।पास वह बहुत उत्कष्ट होता है। लण सिल प्रत्येक धर्म की पुतली के बोचो-बोचकी गोम बिन्दी। इसमें सामने कार्य में व्यवाहत होता है। तिनका दान लेना पाप है। पड़ी हुई वस्तुका छोटासा प्रतिविम्ब दिखाई पड़ता है। लेकिन सिलदानसे अशेष पुण्य प्राप्त होता है। तिनगनो (हि. स्त्रो.) एक प्रकारको मिठाई जो चोनी ___ जो ब्राण प्रातःकाल उठ कर तिल दान करते हैं में तिलको पाग कर बनाई जाती है। वे सब प्रकार के पापोंसे छुटकारा पति है। प्रेतोहे शसे सिलगमा ('पु.) हिमालय पर्वतमे लगा कर नेपाल तिम-दान किया जाता है। जो प्रेतोहे असे हेमगर्भः पञ्जाब तथा अफगानिस्तानमें होनेवाला. एक प्रकारका सिलदान करते हैं, उनके पिटगण तिस-संख्यक वर्ष पेड़। इसको लकड़ोरमारतोम लगतो सथा पल स्वर्गलोकमें वास करते हैं। हेमगर्भ तिल दान पाद्य पोर भयानका डा पादि बनाने काममे पातो है। एकोद्दिष्ट बाइके दिन किया जाता है। तिलंगा (हि.पु०) गरजो फोजके देखो सिपाही। प्रशोचान्तके हितोय दिन पोर पासवाहक दिन पहले पहल स्टडिया कंपनीने मन्द्राज किला बनवा पहले तिन्न-दान कर पोछे दूसरे दानादि किये जाते है कर वहकि तिलंगियोंको अपनो सेना में भरतो किया था। इस तिम्लदानको जो बामण पक्षण करते हैं, वे पवित्र समोसे पंगरेजो फोज देयो सिपाहो मात्र तिगा . समझ जाते हैं इसी कारण यह दान महाबाहाण (प्रम- साने लगे। दानो) लिया करते हैं। श्राद्ध देखो। तिलगना (हिं. पु०) तेला दे। निलमे पितृगणका तर्पण किया जाता है। किन्तु तिलङ्गो ( वि.) तिलागनाका रहनेवाला, तेल। सभो दिन तिल तर्पण करना निषित है। गङ्गादि तीर्थ- तिलक (को०) तिसवत् तिलपुषरव कायति के-क। में और प्रेतपक्षमें (प्रतिपदसे महालया अमावस्य पर्यक) चन्दमादि हारा ललाट पादि हादश पङ्गों पर धारतोय तिल-तपंण कर मकते हैं। तर्पण देखगे। चिक, वह चित्र जिसे गोले चन्दन और केशरादि ससाट, ___ जन्मतिथि के दिन जो सिल द्वारा खान, तिल-मिश्रित वक्षस्थल, बाहुपादि पङ्गों पर शोभा पथवा साम्प्रदायिक तिलहोम, तिलप्रदान, निलवपन और तिलोहतन। ससके लिये लगाया जाता है। चमतो बोलोमें इसे करते हैं, वे चिरायु होते तथा उनके सब कष्ट जाते टोका भी कहते है। पर्याय-तमालपत्र, पिक पौर रहते हैं। विशेषक । ( अमर.) रातको न तो तिल खाना चाहिये और न तिल मिश्रण हादश तिलक लगानिकी विधि-प्रत्येक जावको कोई द्रव्य हो। सलमो, नवमो, चतुर्दशी, अष्टमी, अमा मानके बाद विष्णु के हादध नाम लेकर अपने दयपक्ष वस्था, पूर्णिमा पौर संक्रान्ति इन कई एक तिथियों में पर तिलक लगाना चाहिये। (हरिमजिवि.) तिलका तेल लगामा निषिद्ध है। ललाट पर तिलक लगाते समय केशवका नाम लेना २ तिलकालक, देहस्थित तिम्लाकार चिविशेष, चाहिए। इसी तरह दर पर नागयर, वक्षस्थल पर काले सका छोटा दाग जो घरोर पर होता माधव, कण्ठकूप पर गोविन्द दचिव कुहिमें विशुबाट है। सामुद्रिक्ष तिलीको खानसे पनेक प्रकारके पर मधुसूदन, यावर विक्षिामा बामवास में वामन,