पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०६

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विटल-भता सम्प्रदाय के लोग वैशवोंकी तरह ललाट हैं। उस रेखाके उभय प्रान्त मलाटख जईपुंडके निम- पर दो खेतवर्ण अर्ध्वरेखा चिकित करते हैं। भागने लगे रहते हैं। भारतवर्ष के दक्षिणखण्डके अन्तर्गत __वाभाचारी मम्प्रदाय के लोग लम्लाट पर दो जव - ! मुगोपट्टन हरिव्यासियों का प्रादि वासस्थान है। रामात पुण्ड, बना कर फिर उसे नासामूलमें पईचन्द्राति करके । सम्प्रदायो रामप्रसादी लोग भ के बोधकालो बिन्दो न मिना देते हैं, इन दो पुगड के बीच में एक वतु लाकार लगा उससे कुछ २ ( ललाट के बोचमें ) सफेद बिन्दु रावण का तिलक बनाते स सम्प्रदायकै भनागण लगाते हैं। यह बिन्दु हरिव्यासियों को अपेक्षा बड़ा होता योवैष्णवांकी सरस बाहु और वक्षःस्थान पर शक, चक्र, है।इम तिलकको बेणोतिलक कहते हैं। इनमें ऐसो गदा और पन अहित करते है तथा कोई कोई श्याम किम्बदन्तो प्रसिद्ध है, कि मोतादेयोने अपने हाथसे राम- बिन्दो नामको कालो मिट्टो अथवा अन्य प्रकारको काले प्रमादके ललाट पर यह तिलक पङ्गित किया था। बड़गन रंगकी धातु हारा उल्लिखित वतुर्लाकार तिलक धारण नामक रामात-सम्प्रदायके वैषणव अपर निखे अनुसार करते हैं। बिन्दु न करके रामानन्दियो को तरह उध्वं पुडके बीच में चरणदासो सम्प्रदाय के लोग लन्नाट पर चन्दन वा रक्तवर्ण 'यो' भजित करते हैं। परन्तु उनको तरह गोपीचन्दनको एक लम्बी रेखा खींच कर तिलक करत नासिकाके जपर और भ के नोचे सिंहासन नहीं बनाते। है। उदासीन शैव हो वा वैष्णव, तिलक देख कर उन्हें इमी मम्प्रदायके लस्करो नामक वैषणव रामानन्दियों को सहजमें पहचाना जा सकता है। भांति सिंहासन बनाते हैं, पर उनको तरह रक्तवण वैगगी लोग नासामूलमे ले कर केश पर्यन्त जवं- नहीं बल्कि खेतवर्ण । रेखा और शैव लोग ललाटके वामपाल से लगा कर चतुभुजोका तिलक गमानन्दियोंके समान होता दक्षिणपाखं तक विभूतिसे तोन रेखाएँ वोचते हैं । प्रथ- है, सिर्फ ललाट पर 'श्री' नहीं होता। 'श्री'का स्थान मोत तिलकको अध्वं पुरान कहते है और शेषोक्तको खाली रहता है। वैष्णवधम में तिलकको बड़ी महिमा त्रिपुण्ड । वैष्णव अर्ध्वपुण्ड लगाते हैं और शव त्रिपुड। बतलाई है। बङ्गालमें भित्र भित्र वैषणव सम्प्रदायों में उत्कनमें जैसे तिलकके पार्थ कासे पतिबड़ी और बिन्दु- विभिन्न प्रकारके तिलक प्रचलित हैं। नित्यानन्द प्रभुके धारो भादि मम्प्रदायोको पहचाना जाता है, उसी प्रकार परिवारमें वेणपवाक्लति, पहत प्रभुके परिवारमें वटपत्रा- हिन्दुस्थानमें भी हरिष्यामी, रामप्रसादी, बड़गन पाटिको क्वति, प्राचायंप्रभुके परिवारमें तिलपुष्यामनि, गौरीदास- मनायाम हो पहचाना जा सकता है। के परिवार में रसकलिकालति इत्यादि नाना प्रकार तिलक निमात सम्प्रदायी हरिप्यासी लोग अन्यान्य मशोंमें प्रचलित है। ये मभी तिलक नासिका पर नगाये जात रामानदियोंकी भांति हो तिलकमेवा करते हैं, विशेषता है। इसके पतिरिक्त उपयुक्त वैष्णव-परिवारके लोग मिफ इतनो हो है कि ये लम्लाटस्य पुंडके बीच में रत. ललाट पर भी नाना प्रकारके अध्वपुर देखनमें पाते। वर्ण 'श्री' ( अर्ध्वपुलको मध्यरखाका नाम 'श्री')न गोपीचन्दनमें सफेद रजा, श्यामबिन्दो नामको मिट्टोंमें बना कर भ-युगलके बीच श्यामबिन्दी नामक लणवर्ण काला रङ्ग तथा हल्दो, सुहागा और नोबुका रस मिला मृत्तिका हारा एक कोटो बिन्दो बनाते है । श्यामबिन्दो- कर पीला पौर लाल तिलक लगाया आता है। इस का प्रभाव हो तो गोपीचन्दन हारा वर्ण बिन्दु बनाया (शेषोक्त ) तिलकक उपादानमें सुहागाका पंश अधिक जा सकता है। रामानन्दो लोग भ्र युगलके नीचे तथा होनेसे रंग लाल हो जाता है; नहीं तो एक सरहका नासिकाके ऊपर गोपीचन्दनका लेपन कर जो अईगोला पीला रंग हो जाता है। कति वा तदनुरूप एक प्रकारको प्रावति बनाते हैं; उसे २ सौवर्चल लवण, मीचर नमक। ३ मणवर्ण सिंहासन कहते हैं। हरिष्यासो लोग इस तरह सिहा- सौवर्चल लवण, काला मोचर नमक । ४ राजसिहासन सनन बना कर पई-गोलाकति रेखामान पहित करते पर अधिरोहण, राज्याभिषेक, राजगद्दी । ५ विवाह-सम्बन्ध