पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०८

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५९६ युवकोंने मिल कर "केशरों" और "मराठा" इन दो मंवाद भी इस समितिम शामिल थे। धोरे धोरम स्थलमै पीका निकालमा शुरु कर दिया । “केशरी" मगठोमें कालेजका रूप धारण कर लिया, जो कि "फर्म चन निकला पौर "मगठा" पेजोमें। ये दोनों मवादपत्र कालेज"के नामसे पूना में अब भी मोजूद है। शिक्षा अब भी महाराष्ट्रके श्रेष्ठ समझ जाते हैं। तिलक समिति के सदस्यों ने प्रतिज्ञा का लो कि "योम वर्ष तक महाराज केशरो"के लिए वोपधिकतर परिश्रम किया नाममात्रको वेतन लेकर इस कालेज में प्रधापना करेंगे।" करते थे। कारण, उन्हें मालूम था कि देशको जनशति- दाक्षिणात्य शिक्षा समितिके अधीनस्य सभो संस्थाएं धीरे को उबुद्ध करने के लिए देशीय भाषाम लिखित संबाद- धोरे सति करने लगी। समितिमे युवकों के खेलमे- पत्रको हो पावश्यकता है। अंग्रेजो भाषाके जानेवाले कूदने के लिए दो मंदान खरीद लिए । बम्बई के पूर्ववर्ती बहुत कम है। इसलिए तिलक महाराजने देशको शासनकर्ता सर जेम्स फग्गु शनको प्रतियुतिके अनुसार भाषामें देशकी बात प्रगट करनेका निश्चय कर लिया। परवर्ती शासनकर्ता लाई रोयेने उक्त कालेजको बड़ा "केशरों' का महाराष्ट्र में जितना प्रभाव था, उतना प्रभाव करने के लिए और भो कुछ जमोन दे दो। युवक-सझाने भारत के पौर किसी भी पत्र का नहीं था। "केयरी"को चतुरसिंगोके पास कालेजके लिए एक बड़ा सुन्दर भवन क्या धनी और दरिद्र, मब ममान भावसे पढ़ते थे। बनवाया। तिलक कालेज में गणितको शिक्षा देते थे 'न्य-जलिय स्वाल' धोर धोरे उवति करता गया और पौर प्रावधाक होने पर कभी कभी विज्ञान तथा संस्कृत पनाक समस्त कलामें उसोने श्रेष्ट स्थान पाया। विशु भो पढाया करता तिनक उता तोनों विषयाम समान शास्त्री चिपलोनकरने दो प्रेस खोल दिये। इन कार्य अतित्व दिखलाते थे। गणितको शिक्षा देनेमें तिलक- क्षेत्राम पाचों युवक मिल कर पूर्ण उत्साहसे कार्य करने की समानता और काई भी नहीं कर सकता, ऐसो लगे। छात्रो को धारणा थो। प्रधाापकों में इनका यश सर्वत्र पसी समयमे देशकै काममें तिलकने पामत्याग किया व्यास हो गया था। और साथ हो उन पर विपत्तियां भी पड़ने लंगो। परन्तु १८८०१०में पापको अध्यापकका पद त्याग 'केशरो' और 'मराठा'म कोल्हापुर के तदानीन्तन महा- देना पड़ा। बहुत दिनो से ममिति के सदस्यों में मनो. राज शिवाजोरावके प्रति दुर्व्यवहारके सम्बन्धी सोह्र मालिन्य चला पा रहा था । ममाज और धर्म के विषयम प्रतिवाद करके अपना मन्तव्य प्रकट किया था; रसके । पापका मत कट्टर हिन्दुत्री के समान था। इसलिए लिए तिलक महाराज और पागरकर पर मानहानिकी राष्ट्रको सहायता लेकर किसो समाज के संस्कार करने- नालिश हुई। अदालतने दोनोंको ४४ महोमिको कैदको को पावशाकता है, इस बातको पाप स्वीकार नहीं करते सा दो। पर इस कारादगड़ के फलसे तिलक पोर पागर थे। परन्तु पागरकरका मत इनसे सम्म र्ण विपरोत करको जन-प्रियता मौ गुनी बढ़ गई और वे नवोन था। वे समाज-मस्कारको पाश प्रयोजनोय समझते थे। उत्साहसे सारो यति लगा कर जन-सेवा करने लगे। समिति के पन्यान्य सदस्य भो आगरकरके मतानुवर्ती इस समय इन निर्यातिम.देश-पार युवकों को सहा. थे। किन्तु इस समय तिलकके पदत्याग करने का और यताके लिए एक नाटक खेला गया, जिसमें स्वयं गोखलेने भी एक गुरुतर कारण उपस्थित हुपा। १८८८ में नाटकको भूमिका ग्रहण की थी। अध्यापक गोखले पूनाको 'माजनिक सभा के सम्मादक १८८४ ई०के अन्तमें तिलक महाराजने "दाक्षिणाय- (वा मन्त्री ) नियुक्त हुए । इसमें तिलकको पापत्ति थो। शिक्षा समिति"को स्थापना को। इसमें पहले मिर्फ पापका कहना था कि जो दाक्षिणात्य समितिके पाजो . उनके मित्रगण को सदस्य थे; पर कुछ दिन बाद बहुत ___ वम सभ्य, सन' पपनी सम्मेण शक्ति और समय से युवकास समिति के सभासद हो गये और उत्साहके वासिजको सवतिके लिए व्यय करना चाहिए।" गोखले साथ काम करने लगे। केशकर, पहनकर बोर गोखले शिक्षक होकर भी राजनीतिक सभाके मन्बो होते.