पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०९

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और समिति के पन्चान्य सदस्य उममें सन्मति देत का नाम "पोरायन रक्तामयाइस पुस्तकमें, योक- यही तिलक पदत्यागका मूस-कारण घा। इस तरको अपेक्षा हिन्दू सभ्यताको प्राचीनता के विषयमें तिलकने पपने पभोष्ट कार्य-प्रध्यापकत्वको छोड़ दिया पायने बहुत से प्रमाण दिये । मोक् पाख्यायिका पौर राजनीतिक जीवन यापन करने में पत्त हो गये। मृत शिकारोके 'पोरापोत' नामक नवराशिम खान- सी समय सरकारने "सहवास-सम्पति"वाला लाभको जो कथा है, इसके माध ( नवराशिका प्रस्ताव पास करना चाक्ष, जिस पर देशव्यापी तुमुल हिन्दू-नामकरण ) मृगशिरा पोर सूर्योपखामकाल मान- आन्दोलन शुरू हो गया। तिलक रस काम नो पाश शो मासका जो शब्दगत साह, उस विषयकों होने के विरुद्ध जोजानसे कोशिश करने लगे। जिस मोति विस्त पालोचना कर तथा 'अग्रहायण' ( मार्ग ) अनुसार विदेशी विजातीय गवर्मे र प्रजाके धर्म और शब्द का अर्थ 'वर्ष का प्रथम दिन, कों, मका विचार समाज सम्बन्धी यम-नियमों में तप कर बाध्यता- कर तिलक महोदयने दिखलाया है कि बदके जिम मूलक पारन बनाने के लिए पग्रसर हो, तिमका महाराज स्तोखोंमें उता ग्रहायण शब्दका सखर वा सस. उस नोतिक कार विरोधी थे। सहवाम-मति पाईनका विषयको भामा पाख्यायिका जिम समय रचो गई पाश होना कितना ही हितकर बों न हो, गवर्मेट घौं, उस समय तक योक लोग हिन्दुषोंने एयक नहीं हुए बलपूर्वक ऐमो व्यवस्खा करतो घो, इस कारण समाज. थे। सूर्य देवके मगधिरामचनम अबखान करते समय संस्कार के विशेष पचपातो और भी बहुतसे व्यक्ति सर- जब वारका प्रथम माम एक होता था, तब (अर्थात् कारके घोर विरोधोहो गये थे। . सासे नाराजार वर्ष पहले) पर दोनों प्राचीन काखेजक अध्यापकका पद त्याग कर तिलकाने पुनः जातियाँ एकहीखानमें रहती थी और इस ममय अम्बेद कानन एढ़ानेको व्यवस्था को। बम्बई-प्रेसिडन्सो यही को गाथाए रची गई यो । प्राय और प्रतोच विधान पहल-लॉ-कालेज है। कालेज में हाईकोर्ट लिए वका- कैसो प्रगाढ़ बिहत्ता होने पर पोर कैसो सोच्छ दृष्टिसे सती विद्या पढ़निका बन्दोवस्त हो गया। इसके बाद गवेषणा करने पर ऐसा सिमान्त खिर किया जा सकता दाक्षिणात्य समितिके सभ्यों में एक बटवारा पा. जिसमें यह बात साजो समझ सकते है। मधिस- तिलक अकेले "केशरी" और "मराठा" पत्रके खत्वाधि- विद्यामि तथा फलित ज्योतिष तिलकबसाधारण पधि कारी और सम्पादक हुए। "केशरो"के सम्यक कारका परिचय सौसे मिल सकता है। सबके भावसे तिलकके कर्व त्वाधान होने पर, दिनों दिन उसको प्रकाशित होने पर पध्यापक मोकामूलर, जैकोबो, वेवर उबति होने लगी। पौर परटनो प्रादि प्रमुख पायास्य विज्ञानाने तिलको तिलकने राजनीतिक क्षेत्र में प्रवतरण करने पर भी सो महसे प्रशंसा को थो। 'जन हकिन्स विश्वविद्या- अपनी पसाधारण मनीषाको केवलमात्र उसमें मिबह लय के डाकर समफिल्डने विग्यविद्यालयके वार्षिक नहीं रक्खा था, प्रत्युत विद्या में भी उनका असीम अनु. अधिवेशन पर कहा था, कि "पोराबनके लेखनन पपने राग था । अवसर पारी हो पाप शाखाध्ययम करते थे। प्रतिपाद्य प्रधान विषयों पर मुझे विखाम करनेके लिए वेदक काल-निण यके विषय में पापने कई निबन्ध लिखे वाध्य किया है, यह बात मैं मुखकसे कहता। है, जिससे पापक पसाधारण पाहित्यका यथेष्ट परिः 'पोरायन' भव साहित्य जगत्में कुछ समयके लिए महा चय मिलता है। १८७२ में लण्डनमें प्राचविद्यावित् पान्दोलनको मष्टि करता रहेगा। साहित्य चोर इति. विहानोको एक पन्तर्जातीय बैठकई थो, उसमें तिलक हासके चत्रम सचमुच ही पोराबन'. विश्वको सष्टि महारानके उस निबन्ध भेजे गये थे। उनसे तिलकाकी को। . .. विधाता पौर प्रतिभा चारों पोर ब्याज हो गई । १८८३ मो ममय तिलक महागबम्बई प्रादेशिक काम- में ग्रे निषावार में प्रकाषित किये गये। पुस्तक के मन्त्री नियुत्व हुए। लगातार पांच अधिवेशनों तक Vol. I. 150