पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६१२

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तिक थे, किन्तु पब उमको ग्राहक मस्या काफो बढमे संगो। इन्तजाममें लग गयेउस समय के परोको मारमा राजद्रोहक मुकदमाक ममय रसके सात हजार ग्राहक संख्या बहुत हो बढ़ गई थी। इसलिए पापक्षा, प्रेमशे हो गये। जेलसे लौट कर पापणे "के गरों का पहलेका लिए एक अच्छो मनोन की जरूरत पड़ो । महाराज माय- कर्ज मब चुका दिया। पाईन-कालेजक बन्द हो जाने कवाड़ने पापको ख मूल्य में पूमाका गायकवाड बाड़ा तथा कारखाने में नुकसान पह जानेमे प्रच पापको पर्याः बेच दिया । उम जमोन पर पापने प्रेस के लिए मकान गमका उपाय सिर्फ "केयरों" हो रह गया। इसलिए बनवाया। तिलक महाराजने मुद्रण-यन्त्र को उबतिको पापको "केशरों के लिए और भी अधिक परिश्रम करना खिए अपनो असामान्य प्रतिभा नियोजित कर वहां भी पडा। एक पात कार्य कर डाला। लोमो-यन्त्रमे काम श्रोबाधा महाराज नामक एक मरदार सिसकके पाये ऐमा मराठो. टाइप बमाया जा सकता है या नहीं, मित्र थे। उनका भी वामस्थान पूना था। थोबाबा महा- भाप रस विषय को चिन्ता करने लगे। पापने लोना. राजको खोका नाम था ताई महागज । मरते समय यन्त्र के लिए जैसे मराठो राप बनाने को कल्पना को उन्होंने एक छापन' लिखा जिममें तिलकको वे अपनों थो, उमका विलायतवालो ने अनुमोदन किया। परन्तु सम्पत्तिक परिचालक नियुक्त कर गये । यह घटना वैसे रूकामे माय लोनो यन्वर मगनिम बाधा पड़ तिलककै काजतमे कुटने के बाद ही हुई थी। बीबाबाका गई, विलायतक कारखाने उस तरहको सिर्फ एक हो कुछ ऋप भी था, तिलक महागजमे ऋण चुका दिया मयोन ठाल पर भेजमा स्वीकार नहीं किया। पौर विशेष शृङ्गलाके साथ उनको सम्पत्तिका रक्षणावे समग्र भारतमें, एकता स्थापन के उद्देशा एक हो क्षण करते रहे। श्रोशवाके कोई पुत्र न था, इसलिए निषिके प्रचार के लिए तिलक महाराजने यथेष्ट प्रयास पापन ताई महागजको दत्तकपुत्र प्रहण करनेका पग किया था । १८.५ में "एकलिपि विस्तार समिति" मर्श दिया। ताई महाराजने अपनी पच्छानुसार एक के पधिवेशन में बाबू रमेशचन्द्र दत्त महाशय सभापति बामाको पुत्ररूपमें ग्रहण कर लिया । सिलकको सुव्यव- हुए थे, जिसमें तिलक महागनने भारत के सर्वत्र नागरो । स्वासे पोराक स्वार्थ में बाधा पही। पाखिर स्वार्थी लोग प्रखर प्रचलन पर जोर दिया था और नामा यतियों साई महाराजको कुपरामर्श देकर बहकाने लगे। ताई दारा उसे उपयोगो बतलाया था। वास्तव में देखा जाय महाराज भो बातों में पा गई। उन्होंने पवित्रहदय तिलक तो एक बिपि हुए बिना सम्म प जातियों में एकताका महाराज पर जाल, प्रवचना, मम्मति न होने पर भी होना असम्भव है। दत्तक-ग्रहण करना चादि दफा मातमें मालिश कर दी। . तिलक धार्मिक और सामाजिक उबतिके परिपन्थी न १८०१ से १८०० तक, चार वर्ष मामला चला। छोटी थे। १८०६ ई० में पापने काशीमें हिन्दूसमाजक मस्कार- प्रदानतमे सिलकाको दोषी ठहरा कर १॥ वर्षको मजा. के विषय में जैसा मत दिया था, उसमे ऐसा हो प्रतोत का हम दिया। मेघनमें पपोल की गई । अजमे दण्ड होता है। पापन कहा था, कि वैदिक युगमें भारतका घटा कर ६ महीनेको मजाका हुक्म दिया। फिर हाई बाहरको किसो भो समाज वा जातिसे मस्पर्श न था। कोर्ट में अपोल हुई और खम्लाम हो गये। जजने स्पष्ट भारतक अधिवामी उस समय परस्पर एक दूमरेक माथ शब्दोम प्रकट कर दिया कि मि तिलकने किमो प्रका घनिष्ट संबन्धसे मवा थे और सबको मात्र एक ही रको भी प्रवञ्चना नहीं को, जालका अभियोग मिथ्या विराट जाति थी। भारतके नेताओंका कर्तव्य है है। इसके बाद पापने साई महाराजको सम्पत्तिके कि उस एकताको पुनः प्रतिष्ठा करें। कामो के हिन्दू तत्त्वावधायकका पद छोड़ दिया। जैसे, बम्बई, मद्राजो हिन्दू भी ठोक वैसे ही है। - इसके दूसरे वर्ष तिलक महाराजका ध्यान अपनी विभिन देशवासो हिन्दुओंकी भाषा और पहनावेमें सम्पत्ति पर गया । आप अपने दो संवादपों पौर सके अन्तर हो सकता है, पर जिस पसमापनासे वे अनुप्राणित