पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६१४

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भारतके विभित्र प्रदेश सम्मिलित होकर एक युक्त- हम भारतवासी जन-साधारणक महान रखकोसिद्धि राज्यका माटन करेंगे तथा बिटियोपनिवेशिक स्वायत्त के लिए व्रती हुए। नोकरमाको यदि हमारे ४. शासन बारा, देश देगवामियों के हारा और भारतके हजार भारयों को एक माथ कैद कर ले. तो भो प्रधान केन्द्रीय गवर्मगट (ग्लैण्ड में रह कर निखिल भारत विव्रत होनेके सिवा उन्हें कोर सुफल नहीं पास हो सम्बन्धी ममस्याओंका समाधान करेगा। स्वायत्त शासनको सकता। वावसायव में प्रसुविधाको मुष्टि कर एवं व्यवस्थासे प्रादेशिक गवर्मेण्टों में भी सुव्यवस्थाको प्राका- सरकार वा नौकरशाहोके विरोधो हो कर हम बण्ड क्षाका हम पोषण करते है। परन्तु ये भो बहुत दूरको की दृष्टि प्राकर्षित करना चाहते हैं। रेल चला कर, बातें, अबसे शुरू होने पर बहुत दिनों बाद मम्भव शिक्षाको वावस्था कर और सरकारी कार्य में एक मात्र पर हो सकती है। फिलहाल हम अपनी कार्य यातिके अग्रेजी भाषाका वावहार कर जगह और भारतका जरिये नोकरशाहीको ममझाना चाहते है, कि उनको एकताके पादर्शको परिपुष्टि तो को है, पर यह सब सभी कार्य पक्षति पच्छो हो, ऐसा नहीं। सम्प्रति कुछ उन्होंने अपनी इच्छासे नहीं किया। इटिग-पाधि हमारे बिटिम कर्मचारियों को गतिविधि बहुत ही पत्यक प्रबल प्रतापसे भारतवासी अपने ही पाप हो बिगड़ गई है।.........किस प्रकारसे हम नौकरशाहो एकताके सूत्र में पावह होना सोख रहे हैं। किन्तु रस को सचेत कर मकते हैं, यही हमारो वर्तमान समस्या एकताको परिपुष्टि कई पोटियों के बाद हो सकतो है। है। इस नौकरशाहों में हमारे प्रतिनिधि स्थानीय वाक्ति प्रतएव हमें प्रभोसें ही अपने उद्देशको पुष्टि के लिए उतने नहीं हैं, निमयदों पर अधिकार करनेके सिवा सम्म खोन होना चाहिए; हमको दूसरे मार्ग पर न हमारा नौकरशाहो में माय और कोई सम्बन्ध नहीं हो चल कर पहले सो मार्ग पर चलना उचित है।" पाया है। यहीं पर 'माडरेटों के साथ हमारे मत का लोकमान्य तिलक महाराजने एक जगह कहा है- पार्थ क्य है । 'माउंट'-गण अब भो यह पाशा रखते हैं, "हमारा यह विद्रोह सम्म भावसे बिना रमा-पात में कि हम ग्लेण्डमें प्रतिनिधि भेज कर अग्रेज जन- हो होना चाहिये। किसीको भी ऐसा न समझ लेना 'साधारणको मतिगतिमें परिवर्तन ला सकते हैं। स चाहिये कि रत-पात न होगा, इस कारण लोगोंको दुव देशमें जितने भो अंग्रेज हैं, उनके मसि-परिवत नको कष्ट भी न होगा, कष्टोंका मामना तो हर हालत में 'पाशा तो दोनों हो दलों ने, बहुत दिन हुए छोड़ दी करना पड़ेगा। बिना रता-पोतके हो हमें जिन, कष्टोको है। 'माडरेट' गण खण्ड के लोगों से पब भो प्राथा भोगना पड़ेगा, वे सामान्य नहीं है। यह बात निश्चित है रखते है. पर 'चरमपन्यो' गण ऐमो पाया नहीं रखते। कि यदि हम दव-अष्ट सहने के लिये तैयार नहीं है, तो .........हमारा पादर्श है, 'पात्म-निर्भरता'-भिक्षा हमार धारा किसी भी उद्देश्यको सिद्धि नहीं हो सकती।" वृत्तिका तिरोधान। सूरत कांग्रेसके विच्छेदके बाद भारत के राजनीतिक 'माधारण स्वदेशो-पान्दोलनको मिवा बायकाट और क्षेत्रमें और भी भीषण घटनाएं होने लगौं। सरकारने निष्क्रिय प्रतिकूलता भी हमारे पत्र। हम बायः पपनी दमननोतिको कठोरताका किशिमात्र हो सास फाटके लिए किमी पर बल प्रयोग करनेके पक्षपातो नहीं नहीं किया। परिणाम यह निकला कि बङ्गाल में विद्रोह हम किमोको विलायती चोजे खरोदनेके लिए मना उपस्थित हो गया। मजफ्फरपुर में बम फटा। जिसे नहीं करते और न दूकानदारके दरवाजे पर जा कर मारना चाहते थे उसे तो मारा नहीं, पाततायियोंने दो धवा देनेको हो सलाह देते है। और निष्क्रिय प्रति- परिज रमणियोंको मार डाला। बम फेकनेके बारेमें हसतामें भी हम सिर्फ 'राजद्रोहमभा-निषेध'को पाईन संवादपत्रों में पालोचना होने लगो। 'केशरी में भी जैसो व्यवखाको उपेक्षा करेंगे। हमारे भाग्यमें जो इसके प्रतीकारके विषयमें कई धारावाहिक लेख प्रका कुछ होने दो; उसके लिए हम चिन्तित नहीं है। पित हुए। रन सेखों में देवकी तदागोन्तन अवसरका