पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६१७

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करना प्रारम्भ कर दिया। गोसाको पासोचनामें पाप तिलक महागनको निमबर नहीं दिया था, किन्तु पोटे निर्वासनको निर्वमताको बिलकुमा भूम गये और साथ अन-साधारण के पान्दोलनसे पाप निमन्वित हुए थे। हो चापका सामयिक पवमाद भो दूर हो गया । परन्तु तिलगने वहां राजभक्ति-मयापक प्रस्तावका समर्थन हाय : इसो समय पापको अम- शमय जोवनको करते हुए कहा था-"अब तक देश में स्वायत्त शासनको चिरमणिनी, समर्मियोका देहान्त हो गया, जिममे व्यवस्थाका विरोध करनेवासा कानून रहेगा. तब तक पाप अत्यन्त · व्यथित हुए। पाप विहान थे, शीघ्र ही कोई भोदयमे राजभक्ति नहीं दिखा मता।" खाट दर्शन और धर्म सम्बन्धीय पालोचनामें मन लगा कर सबने तिलकको वन सा देमेसे रोका, रस पर तिलक पापने कुछ शान्ति प्राप्त को। पापने बहुत पासोचना और उनके बन्धुवान्धवोंने अपना पपमान समझा पोर करने के बाद मौखिक गवेषणा-पूर्वक 'गोता रहस्य' नामक उसो ममय सब मभासे उठ कर चले पाये । वास्तवमें एक विशाल ग्रन्थको रचना को। निर्वासन-खामसे लौट तिलक राजभक्ति दिखाने के विरोधो न थे। दूसरो ममा- कर पापने यह ग्रन्थ प्रकाशित किया, जिमसे देशमें एक में उन्होंने स्वयं इस बातको भलो भांति समझा दिया नव-जागरण की पावाज गूंज उठो । तिलककी असामान्य था। लाट साहबके उक्त व्यवहारकै विकर बम्बई में एक वित्ता, गभोर अनुभूति पौर हिन्दू शास्त्रको मर्यादा हम सभा हु। तिलकने उसमें कहा कि "यदि सरकार 'गीता-सवमेही प्रकट हो जाती। भारतवासियोको मैन्य विभागमें याण करे, तो मैं सो १८१४०में तिलक मुक्ति पाकर अपने देशम पाये। समय पांच हजार सेना को करके दे सकता।" पापने एक पत्र में अपनी पहिंस-राजनोतिक मतवाद परन्तु गवन मेण्टमे पापको यह स्वतःप्रणोदित सहायता प्रकट किया कि-"गवर्मेण्ट धोरे धोरे भारतको उबति ग्रहण करनेमें पायद अपना अपमान समझा। लिये प्रयत्न कर रही है, पतएव रंगलेण्ड के इस दुःसमय नवोन शामन संस्कारका कान न जब छप कर प्रका. में प्रत्येक भारतवासोको सहायता देनी चाथिए ।" इसने शित हुपा तब तिलकने उस पर पसन्तोष प्रकट पर भी, पूमा पहुँचते ही सरकारने पाप पर तो दृष्टि किया था। रखनको व्यवस्था को थी।। ____सर वेलेण्ट्रारम चिरोलने सपनो “भारतमें भयान्ति" - सन् १८१५ की कांग्रेसमें तिलक महाराजने नरम नामक पुस्तक में तिलकके विरुण बहुतसो झूठो बात और गरम दलका विरोध मिटा दिया। पापो उद्योगसे लिख मारो घो। इसलिए चिरोल पर मुकदमा चलाने १८१८ सेप्टेम्बर मासमें, पूनामें "होमकल लोग" लिए १८१८ ई० में पाप विलायत गये। वहां मुकदमा नामको एक सभा स्थापित दुई। एक बार पापने लख करके पाप लतकाय न हुए। पापने विलायतके श्रम- नजको कांग्रेसमें खायत्त शासनके सम्बन्धमें बताता दो जोवो सम्प्रदायको दृष्टि भारतको भासमग्रवाकी बार थी और अपना मन्तव्य प्रकट किया था। ६१ वी वर्ष प्राकर्षित को थो। विलायतमें पाप बाधषके दायकी गाँठमें लोगोंने पापको १ लाख रुपये की थैली भेटमें रसोई जीमते थे । दोधो। ___ भारत लौट कर १८१८ में पाप पमतसरकी १८१७९ में मण्टगू साहब जब भारतवर्ष में नवोन काँग्रेसमें मामिल हुए पौर उसको प्रबन्धःकारिणी समिति शासन-प्रथा प्रवर्तन करने पाये, तब तिलक महाराजन को मापने अपने पाद में पनुप्रापित किया। इस बार 'होमकस सोग'को तरफसे उनके साथ मुलाकात की थी। कांग्रेसका कार्य सिफ पाप हो.के मतानुसार चला पापने विलायतकी बिटिय जनताको भारतको भव- था। . खाका परिधान कराने के लिए विलायत जानको इच्छा १०२०१०के जुलाई मासमें तिलक महागजको प्रकट की, किन्तु गवर्नमेण्टने रहें वहाँ जानकी पात्रान बीमागेने घेर लिया । सुयोग्य चिकित्सकों के बहुत परिः दो।११८ में 'इम्पोरियल बार कानफरन्स ने पहले बम रन पर भी पापको पुनःसाला प्राय नहीं था। Vol. Ix. 152