पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६१९

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तिलचटा ( पु.) एकास्वा भीगुर। तिल, तितका तल । मन प्रकारको निशाना तिथचावली खिो .) तिस पोर बावनको तेल प्रशस। .. .. .... .. . पिचड़ो। (वि.) जो कुछ सफेद और कुछ कामा.हो। इसको गुप-कापान खादुः ज्य, पित्तात् बार.. तिलमित्रपत्रक (स.पु.) तिलचित्राणि तिलबत् विनि. नाशक, अभावक, मेवा, पण ड पोर विकार- वापि पवाषि.यस्थ पी० कप । तैलकन्द। माशक, हच पोर अमनाशक । .. :: तिखचूर्ण (म० की) तिलस्म चूर्व सत्। चुक्षित हिन, भिव, चत, पृष्ट, चत, भग्न, पबिहार, शिमा, तिलकुट । पर्याय-तिलवारक, पसल पोर पिष्टक अभ्या, विषपावगाहम, पान, बस्तिनिया, मस से इसका गुरु रुष, पित्त, 'रत क्ल पोर पुष्टिदायका कपूरब इन सब स्थानों में तिलका तेल विषय ।। (हारीतम.) तिलच्छक ( स. पु०) हामगे, कोक, 'मदिया। . तिलका तेल बालय, उप सोचा, मार, पुष्टिकर, सिमज ( को) देल, तेल। .. ::- हृतिकर, ग्राम्य-धर्म में उत्तेजक, सूच, नियन, गुरु, तिलमटा (सी .) तिसमचारी, तिलका मजर।। मारक, विकायो, तेजाकर, मेधा, भरोरको कोमलता, तिनगा (मस्त्री . ) सिलवासिनो धान्य. एक प्रकारका पोर मासको दृढ़ करनेवाला, वर्षकर, बलकर, हुष्टि धाम जिसको सुगन्ध तिल जैसी होती है। गहित्य. साधक, मूबरोधक बनकर, तिल, कषाय, तिला गा-उत्तरबिहार में प्रवाहित एक नदी । वह नेपाल याचक, वासनेचानायक, समिन्न. योनिशूल, थिएःशूल को सराईसे निकल भागलपुर जिला होतो दुई तिल- और कर्णशूसमें शान्तिकार, गर्भाशय का पोषणकर, हि कैम्बर ग्रामके निकट दक्षिणपूर्व की पोर धूमकर मारने | भिव, उत्पिष्ट, विड, शुस, मथित, पत, भन्ना, मुड़ित फशिया परगनेमें प्रविष्ट हुई है। फिर बार नामक शारदग्ध, पम्बिदन्ध, विशिष्ट, दारित, पमिहत, दुभंग्न स्थामपर भागलपुर जिले में प्रवेश कर ठोक पूर्वको पोर और मगम्याम्सादि दष्ट इन सब स्थानों में तिलका नेता जा कर मौगवती ग्रामके निकट कोसो नदो गिरो। बहुत हितकर है। (मत ) .... इम नदीमें बारहो मास नाव पातो जाती है। इससे तिनदानी (हिलो . ) दरजोको सर, तागा, गुः कई एक शाग्वा नदी और खाल निकलो है। माना पादि पोजार रखने की कपको चला। .. तिलछना ( क्रि०) बेचैन होमा, विकला राना। तिसदेखराध ( पु०) तिलदेवर इति नाना प्रसिद्ध सिलड़ा हि वि०)। जिसमें तीन माह तौथें । रेवानदोके तोरवर्ती नोर्थ विपिष, एक तीवंका (fo) २ पत्थर गढ़मवासोको एक छेनी रससे वे नाम जो रवानदोके किनारे पखित "सका मग टेढो लकोर या सरदार बायो बनाता नाम तिलकेश्वरतीर्थ ।। रेवामाइ म्य। . • तिलहो (स्त्रिो .) सोन लाटोको एक माला। इसके तिमाहादशो (सं० स्त्री.) बादशीमद । इदशी देशो।' बोच में जुगनो लटकती है। सिलधिन (सं. बी.) तिलनिर्मिता धनु, मधलो. सिनतासक (स• लो०) तिलस्व तहत एव कायति- समधा। विधानपूर्वक तिसनिमित धनु, एक के कपालिन । (पु. ) तिलस्व तणसः, सत्। प्रकारका दान जिसमें तिलोसी गाव बना कर २ मिष तिल, चना भूसोका तिल।। तिलमिश्रित दान करते है। पापुराव लिखा पोय पाठक सबकुल, तिल मिला एषा चावला अर्थात् चौसठ मेर तिखसे माय पोर पार पाठक पर्थात् तिलतमा (स.सी.) तिलाव अजयति पुरादितिज- . सोलह मेर तिखो वड़ा बनाना चाहिये। उसके रखक अच टाप । खताभेद, एक प्रकारको बेला कड़ों के वेरफलों के दांत, गन्धमयो नाच पोर ग्रा तिलतल (स, बी.), विकास और तिख-तैखच्। को जीभ होनी चाहिये । सो त तिखधन प्रस्तुत होतो स्नेह तेलच । पा १।२।२९ इति सूत्रस्य भाषिया न्। पोर उसे बास नगर्म मि सापित कर व गरा