पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६२२

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तिलांजली-विली तिलाञ्जलो (स'. सो.) मृतक मस्कारका एक अङ्ग । "कुम्भकारश्च वीर्येष सथ: कोटकयोषितः । . . मुरदे के जन्न चुकने पर स्नान करके यह किया को जातो बभूव ते सकारच कुटिल: पतितो भुवि ।" . है। इममें हापको प्रगलियों में जल भर उममें निम्न अर्थात् तेलकार वा तेलोमाति कुम्भकारके पौरस डाल कर उन मृतक के नामसे छोड़ते हैं। और राज ( वा मंगतराश )के गर्भ से उत्पन हुई है, जो तिलान (40 को.) तिलमिश्रितं अच, मध्यन्नो० कर्मधा। कि कुटिल और पतित है। कशर, तिलको खिचड़ी। इमसे माल म होता है कि तेलकार वा तेलो जाति तिलपत्या (मं० स्त्रो०) तिलस्य व क्षुद्रः अपत्य वीजमस्याः, हिन्दू समाजमें बहुत समयसे पतित है। परन्तु तालिका बहनो। कणजीरक, काला जोग। गण किसी शास्त्रमें शङ्करों में मध्यम श्रेणोके भोर किसो तिलाम्ब, (म.ली.) तिलमिश्रितः अम्बु, मध्यपदलो. शास्त्र में उत्तम श्रेणोके माने गये है। कर्मधा। तिलकोटक, तिन मिन्ना हुआ पानी। पराशरपतिमें तिलयों के सामाजिक प्रवस्थानके तिलाई (म. लो०) तिनस्य अह', ६-तत् । तिलका प्राधा, बारे में इस प्रकार कहा गया है- . बहुत छोटा पदार्थ । "गोपो माली तथा नैली तन्त्र मोदको वाणिः ॥ निलाषा (हि': पु०) १ बड़ा कुओं। २ रात के समय कुलालः कर्मकारश्च नापितो नवपायकाः । कोतवाल पादिका शहर में गश्त लगाना, गेंद। . एते सत्शद्रजाताश्च नवशाखाप्रकीर्तिताः ॥" तिलिम ( म० पु. ) गोनम , एक प्रकारका साप । इस प्रमाणसे लिक तथा तैलो जाति एक हो तिलिन अपर ब्रह्म के पकोक, जिले का एक शहर । यह सकती है। लिक जातिको बहहम पुराणमें एक स्थान प्रक्षा० २१ २७ और २१ ५७ उ० तथा देशा० ८३ पर तौलिक कहा गया है। जिसका स्थान उत्तम ५८ और 2.8 २२ में अवस्थित है। भूपरिमाण ४८८ सहरी तथा गुवाकविक्रय-जीविकों में निर्दिष्ट हुपा है। वर्ग मोम्न और लोकसंख्या १०८४३ है। इसमें कुल १२० अहा वैवर्त पुराणके ब्रह्मखगड में भी लिखा है,- ग्राम नगते हैं । शहरम माव नामकी नदो प्रवाहित है। तिलिया (हिं. पु० ) मरपत। "तासां सरजातेन वभूषुर्वर्णसङ्कराः । गोपनापितलीलाश्च तथा मोदककूवगैः ॥ तिलो-बङ्गालको एक प्रभावशालो हिन्दू, जाति। रस जातिमें धमाव्य और जमींदारोंको संख्या काफी है। ताम्बुलीवर्णकारौ च तथा पणिजातयः। इत्येवमाया विप्रेन्द्र सच्छुद्राः परिकीर्तिताः॥" भारतवर्ष के अन्यान्य प्रदेशों में जो तेलो जातिके लोग। इस लोकसे तोल वा तिलो जाति मत्शूद्र प्रमाणित रहते हैं, उनके माथ इनके प्राचार-व्यवहार और मामा- होती है। जिक सम्मानमें बिलकुन मौसादृश्य नहीं है; लिए अपर जितने भी संस्कृत वचन उहत किये गये हैं, उनमें उसको हम स्वतन्त्र जाति कह सकते हैं। एक भी ऐसा नहीं जिसे बम प्राचीन शास्त्र-सम्प्रतं काह तिलो जाति लषि, वाणिज्य, व्यवसाय, महाजनो आदिका कार्य कर जीविकानिर्वाह करती है। मके । पराशरपति अथवा परशराम वा भाग वगमकत शास्त्रों के प्रति दृष्टिपात करने पर भी हमें दीख पडेगा, जातिमालाको दुहाई देकर जितनो भी वर्णमहरोत्य. कि तिल सेलो भोर तेलकारक जातिको उत्पत्तिमे तिको कथाए' कोतित है, वे सब बङ्गालको निजस्व कितना अन्तर है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में संलिक आतिकी । बङ्गालके बाहर कहीं भी उनका प्राचीन अस्तित्व उत्पत्ति-विषयमें इस प्रकार लिखा है- नहीं मिलता। बंगालके माना स्थानोंसे उक्त पति वा मालिन्यां वाग्जीवात् तलकस्य च सम्भवः ।" जातिमालाको जितनी भी पोथि निकली है, उनमें से अर्थात् वाकजोवि वा तमोलोके पौरस और ग्वालिनके कोई भी सौ वर्ष से ज्यादा पुरानो नहीं है। किसी भी गर्भ से लिक जातिको उत्पत्ति हुई है। किन्तु तेलोके महापुराण वा उपपुराणों की सूची में शाहपुराणका नाम सम्बन्ध रस प्रकार लिखा है-. . नहीं मिलता। अथवा यों कहिए, कि प्राचीन स्मृतिक-