पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६२३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


निवन्धमै हामं पुराणके बंधन उईत नहीं हुए । बल- मिर्वय करना न्यायसङ्गत भो। जाति विषय में कत्ते में विभिन्न स्थानीसे जितने भो वहम पुराण मुद्रित उहत नोक किसो विशेष उहख-साधनके लिए. पाधु- हुए हैं, उनके उत्तरखण्ड में ( श्रेषभागमें ) १३३ और निक समयमें रखे गये है, इसमें कोई भी सन्देह नहो १४वें अध्यायमें जो वर्णसारप्रकरण अधित इमा, वा है। एक अपूर्व वस्तु हो माल म पड़ती है। जिन धर्मसूत्र बगाम्समें साधारणतः तिली, तेलो पोर 'कोल' ये और स्मतिसि हितापम वर्षसहरका प्रसार, उनमें सेन जातियां पाई जाती है जिनमें तिलो जातिका मर्वत्र अनुलोम और प्रतिलोम सङ्करीका पृथक पृथक पाचार-यवहार उच्चश्रेणोके हिन्दूषो ममान है; उप. उझेख किया गया है, परन्त वृहदम पुराण में अनुलोम नयनके सिवा गम जातिमें पन्य संस्कार मुख्य वा. गोण- पौर प्रतिलोम दोनों प्रकारको २० सारजातियोंको श्रेष्ठ रूप में प्रचलित है। इस समाजमें विधवा विवाह प्रचलित वर्ण सहर कहा गया है। भवर्यको बात कि हम नहीं है, किन्तु विधवाएं यथारोति ब्रह्मचर्य का पालन पुराणके पाठभेदसे तैलिक वा तौलिक जातिको एक मान करती है। तिलो पोर सेलो जातिमें परस्पर कोई सम्बन्ध लेने पर भी उक्त पुराणको “वैश्यास्तु द्विजकम्माया जातोता नहीं। तेलो जातिका मामाजिक प्रामन तिलो' म्भूलितौलिको।' (१२१) अर्थात् 'वैश्यक पोरस और जातिसे बहुत नोचे है। कहीं कहो तेलो जातिका बााणकन्या के गर्भ से ताम्बलि और तौलिक जाति उत्पन गामी नहीं चलता, पान्तु तिलो जातिका पानो मर्वत्र हुई है। इस प्रकार उत्पत्तिको मान कर साम्बलि और और उच्च ब्राह्मण भी ग्रहण करते हैं। उन तितो और सोलिक जातिको किसी प्रकार भी श्रेष्ठ वर्णसरोंमें तेलो जातिको अपेक्षा 'कोल जातिको सामाजिक नहीं गिना जा सकता। ऐमो दशामें उन्हें प्रतिलोमनात अवस्था और भी हीन है। कहीं भी इसका पानी नहीं होन वा सहर माना जा सकता है। चलताः सर्वत्र हो यह पस्पृश्यजातिको तरह मामी जाति इसमें सन्देह नहीं कि ब्रह्मवैवर्त पुराण के अध- है। वंगोय शास्त्रकारों ने तेलोजातिका 'तैलिक' नामसे खण्डका १०वा अध्याय, जिसमें वर्ण सहर जातिमाला तथा 'कोल' जातिका 'तैमाकार' मामले उल्लेख किया कोतित हुई है, वह भी नितान्त पाधुनिक समयको हैं एमी दशा परणाम वा पराभरपडति, ब्रह्मवैवर्त । रचना है। उक्त अध्यायमें यह नोक मिलता है पारधर्म पुराण में जो सैलिकजातिका प्रसङ्ग , . उसे . "म्लेच्छात् कुविन्दकन्यायां जोलाजातिभूव ह।" (१०।१२१) हम तेलो मान सकते है और जहां तैलकार जातिका अर्थात् म्लेच्छ वा मुसलमानक पौरस और कुबिन्द कन्या प्रसङ्ग, ससे "कोल"। यह पहले हो लिखा जा चुका गर्भसे 'जोला' जाति उत्पन्न हुई है। है कि हम पुराणमें तैलिक'को जगह 'तोलिक' भो 'जोला' शब्द केवल बङ्गालमें ही प्रचलित है, बङ्गाल- पाठ है। भोर भी देखिये- . को छोड़ कर उत्तरपश्चिम प्रान्तोंमें 'जुलहा' कहते है। "तैलिकेल्यकरोदामयाँ गुवाकविक्रये खलु।" (१४६ बंगालमें मुसलमानोंके पानेके बाद, उनके सम्पर्क से इस अर्थात् तैलिकको गुवाक (सुपारी) विक्रय करने के लिए जुलहा जातिको उत्पत्ति हुई है और इसीलिए ब्रह्मवे. पाधा दो गई थी। यहां किसो किमो मुद्रित पुस्तक वर्तपुरावक ब्रह्मखण्ड में वर्णित वर्षसहरजातिमालाका तौलिक पाठ रहने से, कोई कोई ऐसा समझत. कि शपाधुनिक सिद्ध होता है। माडके युद्ध में "राढ़ीय' सिम्ली जातिमें कोई कोई सुपारोका रोजगार करता और "वारेन्द्र" वोरोंका उसख (प्रजातिखण २०१०)से इमलिये तिलो पौर तौलिक दोनों एक ही जाति । या वात प्रमाणित होती है कि प्रचलित अवैवर्त में परन्तु यह उनका भ्रम है। तौल वा सोलिक शब्दका बहुत से लोक ऐसे भी हैं, जो पोछसे बङ्गालियोंने बमा पाभिधानिक पर्थ चित्रकर (पर्यात् जो 'तूलो' वा लिए है। इसलिए पूर्वोचत लोकोंक अनुसार 'सिलो' • चोसे चितारण हारा जीविका निर्वाह करे) है। 'तैलिक' वा तौलिक' और 'रेलवार जातिको उत्पत्तिका माधुनिक हार्म पुराणमें तोशिक जातिका गुवाक-