पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६२५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


तिली-सिखोचमा ६१३ चलो गई है। बङ्गालमें तेलो नवशाखमें शामिल किये चोदार्य, वदान्यता, पमाविकता पादि गुणोंसे बङ्गालके जाते है । तेलो जातिमें अब बहुतोंने कोलह चलाना छोड़ एक पादर्श पुरुषके रूपमें सम्मान पा रहे है। दिया है और भिव यावसाय करने लगे हैं। इनमें जो बङ्गालमें तिलो जातिके धनाण्यांको संख्या काफी है। 'धानो' ( कोल्ह) चलाते हैं, वे 'चनातमा कहति है। काशिमबाजार. दोघापतिया, राणाबाट, वयड़ा वैद्यलर. यह कहना वार्थ है कि उक्त विभिन्न प्रकार कार्यास थोरामपुर, फरासडांगा, फरोदपुर, भाग्यफूल, चूड़ामन पादि स्थानोंके जमोदार इमो जातिके है। तिलो जातिका कोई सम्पर्क नहीं है। सम्भवत: यह तिलेतो ( हिंस्त्री०) तेलहमको खूटो जो फसल काटने जाति बहु पूर्व कालमे तिल उत्पादन पोर तिलका व्यव- पर खेतमें बच जातो है। माय करतो थी और इमोसे इसका नाम तिलो पड़ा है। तिलेदानी (हिं. स्त्री० ) तिल दानी देखेंगे। तिलो जातिका वर्तमान हिन्दूसमाज पर कितना ति नेगू (हिं. स्त्रो• ) सेलगू देखो। प्रभाव है, म बातका निर्णय उनको शिक्षा दोचा पोर तिलोकपति (हिं. पु०) विष्णु । धनवताको पालोचना करनेमे हो हो सकता है। तिलो तिनोको (हि.पु.) त्रिलोकी देखो। लोग पाचार-वावहारमें ब्राह्मण पौर कायस्थोंकी सरह तिलोचन (पि .) त्रिलोचन देखो। सदाचारी होते है। स्त्री-जातिका परिश्रम कर जोविका तिलोत्तमा (म. स्त्री० ) तिलप्रमाणे : सर्वरखाना शे निर्वाह करना मामाजिक मोचताका चित्र है; किन्तु गत्तमा। स्वर्वेश्या, स्वर्गको एक वेश्या । सुन्द पोर उप तिलियों में ऐसो स्त्रियां बहुत कम है जो कायिक परिश्रम सुन्द नाम के दो असुर थे, जो देवताओं द्वारा पवध्य पौर हारा जीविकानिर्वाह करतो हों। प्रवल पराक्रमी थे। ये दोनों भाई यदि परस्पर न लड़ते, इस जातिमें हजार पोछे २८ शिक्षित व्यक्ति है। नो रनको मृत्य होनो दुर्घट थो । लोक-पितामह भग- तिलो जाति बहुत प्राचीन है, इसमें सन्देह नहीं। वान् ब्रह्मान इन दोनों असुरोंके विनाशार्थ समस्त बोका बङ्गालमें बहुतोंने सम्मानजनक कार्य कर कोति प्राल को तिल सिल ग्रहण कर तिलोत्तमाको सृष्टि की थी । है। पुण्यकांति रानो भवानीने इसी जातिके दयागमको इसके समान रूपवतो रमणो स्वर्गगज्यमें दूमरोन दीवानोका पद दिया था। अंग्रेजोंके अभ्य दयके प्रारम्भ थो । तिलोत्तमाके रूपलावण्यका विषय इस प्रकार वर्णित में काशिमबाजार राजवशके प्रतिष्ठाता कान्त बाबूने है-'एक दिन एक असामान्य रूपलावण्यवतीने महा वारेन हेष्टिस् पादि समपदस्थ व्यक्तियों का सोहाचं देवको प्रलोभित करने के लिए उनके चारों पोर घूमना प्राप्त किया था। कान्त बाबूके पान्तरिक प्रयत्न पोर शुरू कर दिया। उस समय महादेव भी उस पर मोहित चेष्टामे, हेष्टिं सको इस देशमें मुशासन स्थापन करने में हो गये और उमको देखनेको अभिलाषासे, जिस तरफ बहुत कुछ सहायता मिलो थो। कहा जाता है, किमण वह गई, योगवलसे उसो तरफ वे अपना मुंह बनाने मगरके सुप्रसिद्ध राजा कृष्णचन्द्रने तिलोजातोय एक लगे। इस प्रकार तिलोत्तमाके दर्शनके लिए महादेवको व्यक्षिको राजवैद्यका पद दिया था। चार म बनाने पड़े थे। इस युगमें कष्णदास पालम जातिका मुखोज्वल * "तिलं तिलं समानीय रस्नानां यद्विनिर्मिता। कर गये हैं। पाप असामान्य प्रतिभाशाली लेखक और तिलोत्तमेति तत्तस्याः नाम चके पितामह असाधारण वाग्मो थे। पापका राजनीतिक मतवाद उस (भारत आदि. २११ अ० ) समय सर्वत्र पादरके साथ महोत होता था। तिलो ६"यतो यत: सा सुदती मामुपाया पदन्तिके। जातिके गजमण राय भी सुप्रसिद्ध कवि और नाव्य कार ततस्ततो मुखश्चारु मम देवि विनिर्गतम् ॥ एवं श्रीयन्यासिक हो गये हैं। फिलहाल काशिमबाजार. तं दिक्षुरहं योगाचतुतित्वमांगतः। के लोकमान्य महाराज सर माणोन्द्रचन्द्र नन्दो चतुर्मुखश्च संवत्तो दर्शयन् योगमुत्तमम् ॥" बहादर, जिन्होंने सो तिलोजातिमें जन्म लिया है, अपने (भारत अनु० १४१॥२३) Vol. Ix. 154