पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६२८

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दीक्ष्ण-सीक्वमन्या तोक्षण (म.ली.) तेजयति तेच्यतेऽनेन वा तिजकस्न विहार करतो है । ललितवान्ता नामक परात्परा मनाला दोघं च। तिजेर्षिश्च । उण ३११८। १ सष्णता, गरमो। चण्डिकाका नाम हो तोरण कान्ता है। तीक्ष्णकान्ता देवो २ विष, जहर । ३ नोहभेद. इस्पात । ४ युद्ध, लड़ाई। जणवर्णा, लम्बोदरो पौर एकजटाधारिणी है। साधक- ५ मरण, मौत । । शस्त्र, थियार । ७ मामुद्र लवण. को इम देवोका पूजन मर्वदा करना चाहिए। मन्चपाठ ममुद्रो नमक, करकच। मुक मोग्वा । ८ चयक, पूर्वक इमका विकोणमण्डल करना चाहिये-"रेखे चाव। १० मरक, महामारो, मरो। (वि.) सुरेख तथा तिष्ठन्तु' यहो तीक्ष्णकान्ताका मण्डलन्यास ११ सोहणतायुक्त, तेज या सोखे स्वादवाना। प्रतिभा, मन्त्र है। होरक, कटाक्ष, दुर्वाक्य, नख. नवण, रविकर ये सब नरान्तक, त्रिपुरान्तक, देवान्तक, यमान्तक, वेता- तीक्ष्ण वस्तु है। (कविकल्पलता ) १२ पात्म यागी। लान्तक, दुईरान्त , गणान्तक और श्रमान्तक ये तीक्ष्ण- १३ निरालस्य, जिसे पालम्य न हो। १४ तेज धारवाना। कान्ताके द्वारपान हैं। मण्डल के पाठ पोर पुन मोंकी १५ तोव, प्रखर, उग्र । १६ कण कट , जो सुनने में अप्रिय पूजा करनी चाहिये। पूजा करते समय मम्बोधनान्त हो। १७ अमद्य, जो महन न हो मकै । ( पु० ) १८ यव एक नाम, पोछे "वञ्चपुष्पं तब "स्वाहा" सबको मिला क्षार, जवाधार । १८ वतकुश, सफेद कुश । २. कन्दः कर जो बने वहो पन हारपालकोका मन्त्र है। सोक्षण- रस, कंदुर गोंद। २१ ज्योतिषोत नक्षत्रगण, पार्दा, काला और उग्रतारा रन्हीं दो मूर्तियों में पात्र, उप. प्रोषा, ज्येष्ठा और भूना नक्षत्र । २२ योगी। करण, खान, न्याम प्रभृति कहना पड़ता है। चामुण्डा, तीक्ष्णक ( म पु० ) तीक्ष्ण संज्ञायां कन् । १ खेतमर्षप, कराला, सुभगा, भोषणभगा और विकटा ये व देवोकी सफेद मरमों। २ मुकक, मोखावृक्ष। योगिनी हैं। सौक्षणकण्ट क (म.पू.) तीक्ष्णानि कण्टकामि यस्य, 'हे भगवत्येकजढ़े विद्भहे वि कटदंष्ट्र धीमहि तनस्तारे प्रचोदयात् ।' बहती । १ धुतूर, धतूरा । २ इजा दीक्षा । ३ बबूर. यही पोठदेवो तोक्षण कान्ताको गायत्री है। विकट- बबूलका पेड़ । ४ करोग, करोलका पेड़ । (वि०) ५ तोक्ष्ण चगिड़का देवो इनको निर्माल्यधारिणी है। कण्टकयुक्ता, जिसमें तेज कांटे हों। - मृण्मय वा रुद्रानसे इनकी जपमाला करनी पड़तो तोक्षगकण्टका (स'. वि.) तोक्षग कण्टक टाप । है। तोरण कान्ता देवोको पूजामें यहो विशेष है। इसके कन्यारी वृक्ष एक पेड़। सिवा उपचार वलिदान जप आदि समस्त कार्य कामा तोकणकन्द (म पु०) तीक्ष्णा कन्दोमून यस्य, बहुव्रो०। ख्या पूजाके अनुसार करने पड़ते हैं । तीक्ष्णकान्ता देवोके पलाण्ड, प्याज। जनमें मदिरा, वलिमें नरवलि और मैवेद्यमें मोदक, तिष्पकम (म त्रि.) तीक्ष्ण कर्म यस्य, चहुबो । कार्य- नारियन, मांस, व्यञ्जन पोर ईख ही प्रशस्त पोर प्रोcिa दक्ष, जो काम-काज करने में तेज हो। हैं। इनकी पूजा करनेसे साधक प्रभोष्ट लाभ करत है। तीक्ष्णकल्क (म. पु. ) तोक्ष्णः कल्को यस्य, बहुव्रो । (कालिकापु ८० अ०) तुम्ब सक्ष, धनिया। तोहणकील (स क्लो०) ९ प्रकर्कर, अकरकरा। २ शुक्र- तोहणकान्सा (म० स्त्रो० ) तोक्षणा उग्रा कान्ता कमनोया मदनक्षा सफेद मदनका पेड़।। कर्मधा। मङ्गलचण्डिकाको मृति विशेष, तारादेवो, तोहणक्षोरो (स• स्रो०) वंशलोचन ।। उग्रताग। तोक्ष्णगन्ध (सं० प्र०) तीक्ष्यः प्रचण्डो गन्धो यो स्य, बनो। कालिकापुगणमे लिखा है, कि दिनरवामिनी १ शोभाखनवृक्ष, सहजनका पेड़। २ नलसो, देवौकी पीठ पर स्वयं भगवान् शम्भ, लिङ्गरूपमें, विष्णु लाल तुलसो । ३ततुलसी, मफेद तुलसी। ४ कुन्दु । शिलारूपमें और ब्रह्मा लिङ्गरूप में अवस्थित हैं। फिर नामक गन्धद्रवा। वह देवी दुर्गा तीक्ष्णकाना और उग्रतारा इन दो रूपोंमें सोहागन्धा (स'• श्री०) तीक्ष्णगन्ध-टाप । १ शतवा,