पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६३२

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तीरंदाजी यथाशक्ति पुण्योपाज नमें यत्नवान होना चाहिये । (पु.) लोग पदों (मैं खो) सौर्णः पादो मूलमनाः अन्त्य - २ मोमक, मोमा नाम धातु। ३ बाण, गर। ४ पु, लोपः कुम्भपया डोष । तालमूगो, मूमलो । टोन। ५ ममोप, निकट, पास। तोर्णा ( म० खो०) प्रतिष्ठाख्य वृत्तिविशेष, एक इत्त तोरंदाज (फा पु०) वह जो तोर चलाता हो। जिमके प्रत्येक बरगमें एक नगण और गुरु होता है। तारंदाजो' फा० स्त्रो० ) तोर चलानेको विद्या। तोथ (सं० को०) तरति पापादिकं यस्मात् हथक । तोरगर ( फा• पु.) १ तोरप्रस्तुतकारो, तोर बनानेवाला पात तुदि वचोति । उण् २।३।१ शास्त्र । २ यज । ३ क्षेत्र, कारोगर । २ एक श्रेयोके मुमलमान। पहमदाबाद स्थान। ४ उपाय। ५ नारोरज, रजस्वला स्त्रोका रज। जिलेमें इनका बास अधिक है। पहले ये युद्ध के लिये अवतार, अवतरण । ७ ऋषिजुष्ट अम्ल, वह जल जिसे सोर बनाते थे, रसोम इनका नाम तोरगर पड़ा है। ऋषिगण सेवन करते हैं। पात, बरतन। ८ उपा- अभी तोरका पादर जाता रहा. सुतरा इन्होंने भो जातोय ध्याय, गुग। १० मन्त्री, वजौर । ११ योनि, भग। व्यवसायका परित्याग किया है। प्रभो ये चोबदार या १२ दर्शन। १३ बाट । १४ विप्र। १५ पागम ।। दासका कार्य कर जीविका निर्वाह करते है। १६ मिदामा १७ वकि, पग्नि। १८ पुण्यखानादि ।। तोरग्रह ( सं पु० ) देशभेद, एक देशका नाम । काशोखण्ड में तोर्य का विषय इस प्रकार लिखा है- तोरण ( को० ) लताद, करञ्जिका, करंज । तो सोन प्रकारका है, जङ्गम, मानस और स्थावर । तौरभुति (म. पु.) देशविशेष, मका नामाकर जगत में ब्राहमणगण जमतोय है। ये पवित्रस्वभाव विदेह है। तिरहुत देखे। पोर सर्व कामप्रद है। इनके वाक्योदकके द्वारा मलिन तोरणा ( स० वि० ) सोरे रोहित कह-क। वृक्ष, पेड़। मनुष्य विशुद्ध हो जाते हैं। ब्राह्मणों को सेवा करनेसे सोरवर्ती (म त्रि.) १ जो तट पर रहता हो। २ पाप नहीं रहते और समान काममात्रको सिधि पास रहनेवाला, पड़ोसी। होतो। तोरस्थ ( स. वि) तोरे तिष्ठति तोर स्था-क. १ तोर. मानमतीर्थ-सत्य, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, दया, ऋजुता, स्थित. तट पर रहनेवाला। २ मदोके तौर पर पहुँ। दान, दम, सन्तोष, ब्रह्मचर्य, विप्रवादिता, ज्ञान, धैर्य चाया हुआ मरणासन व्यक्ति। बहुत जगह जब रोगो और तपस्या ये मानमतीर्थ हैं, उनमें भो ममको विरा- मरमको हाता है, तब उसके मम्बन्धी पहलेडीमे उसी इता हो सबसे श्रेष्ठ है। देशभ्रमण करनेसे आत्माकी नदोके तोर पर ले जाते है। धार्मिक दृष्टिमे भदौके उवति वा बहुदर्शिता होती है, इसलिए भो तोर्थ यात्रा- तौर पर मरना अधिक उत्तम समझा जाता है। को हिन्दगण अति पुण्यदायक समझते थे। तोर्थ में तोराट ( पु) लोध्र, लोध । जानसे मन विशव होता है और साधुमके दर्शन तोरान्सर (स. क्लो०) तोरस्य अन्तर, ६-तत्। दूसरे पात्मा भी पवित्र होती है। जिन महात्माषीक पाश्रम पार। जाते हैं, उनका उत्तान्त स्मरण करनेसे जगतको पनि- तोरित ( स० वि० ) तोर-त। कार्य समालि। स्थता स्पष्ट ही प्रतीयमान होने लगती है, सैकड़ों मनुष्य तौर स'. पु.) १ शिव, महादेव। २ शिवको उन भावों में पा कर जन्म और मृत्यु के हाथमे उबार सति । हुए है। इन सब विषयोको चिन्ता करनेसे मन में एक तोण (स० वि०) तक। १ उत्तीणं, जो पार हो गया उदारभावका उदय होता है और सर्वदा पापोंसे दूर हो। २ अभिभूत. हराया इमा।. ३ श्रासन, जो रहनेको च्छा जाग्रत होतो है। पतएव प्रत्येक भोगापा हो। ४ प्रतिक्रान्स, मो सोमाका उन्धन मनुष्यको पात्माको अवतिके लिए तीर्थ यात्रा करनी कर चुका हो। चाहिये। मारे शरीरको पानी में डुबा कर खान कर सोपा पदा ( स्त्री) मुगलो, सालमूला . लेने तीर्थ स्थान नहीं होता, यथार्थ तो सामी वहाँ