पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६३८

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तीर्य गोपचारतार्थ में स्नान करनेमे सम्म पायोका नाश खकुलोहार, पितामह-मरमें अभिषेक करनेमे अम्निष्टोम- और देवनोकको प्रानि कोसो है। रामतीथ में स्नान का फल, कुमारधारातीर्थ में स्नान करनेमे लतार्थता करनेमे अश्वमेधका फल, साहस्रवतीर्थ में जानम गन और ब्रह्महत्या पापका विनाश, गौरोशखरतार्थ में सूय और अश्वमेधका फन्न, गजर तो म्नान करनेमे प्रारोहण, स्नान, देवता और पिटपूनम करनेसे अावमेव कुवेर-तम्य सन्तोष, मणिनागतोय में जानमे महस गो का फल भोर स्वर्गगमन, ऋषभ-दांपतर्थ और प्रोद्दा. दामका फल और सर्प विष भय नष्ट होता है । गोतमवन लकतोर्थ में अभिषेक करनेमे ममस्त पापोंका नाश, ब्रह्म- तीर्थ-यहां के प्रस्थाहदमें स्नान करनी परमगति तीर्थ में जानसे वाजपेरका फन. चम्पातोय में जानमे प्राश कोती है। श्रीदेवोतोयं में जानिरी थानाधि, उदपान मस्र गोदानका फल नरसिकातोथ में जानिमे वाजपेय का तो में अभिषेक करनेमे वाजिम फन्न प्रापि, जनकराज फल तथा सविद्यतोर्य में स्नान करनेमे विद्या प्राप्त होतो कूप तोर्थ में अभिषेक करनेमे विशालाक प्रालि, विनशन- है ! नाहियता में जाने में बहुसयज्ञ का फत. कर• तीर्थ में जानिमे वाजपेय-फन्नप्रानि विशल्यातोर्थ में अव. तायातोर्थ में लोन गत्रि अवाम करने में ११ वृषभदान का स्थान करनेमे गुज़कलो में बाग, कम्पनानढो सोर्थ में फल और कालतार्थ में जान सहस्त्र गोदानका फल और जानमे पुण्डरीकयज्ञका फन्न, विशल्यमटोतीर्थ में जानमे स्वग लाभ होता है। परहोपतोय में स्नान और विरात्र अग्निष्टोमका फल भोर देवलोक में विरवाम. माहेश्वरी- उपवाम करनेसे कामनाको भिडि, वैतरणोतोर्थ में तोर्य में जानमे प्रवध का फल और स्व कुन्लोडार, दिवो जानेसे समस्त पापों का नाश और विजयतोथ में जानिमे कःपुष्करिणो में जान में दुर्गतिका विनाश भोर वाजिः चन्द्रको भांति कान्ति होतो है । प्रभपताथ में आनिमे पाप मेधका फल, गमदतोथ में जानिमे अश्वमेधका फल, नष्ट होते हैं। शो 'भागोरथोमगाम पिट और देवता- महेश्वरपदतीर्थ में स्नान करने मे प्रावध का फन्न, नाग ता करनेसे अग्निष्टोमका फन्न प्राप्त होता है। शोग यगास्थामतीर्थ में जानेमे अश्वमेधका फल और न्द्रलोक- प्रभव, नर्मदाप्रभव और वशगुल्म, इन तोन सोथों में में बास तथा जातिस्मगतीर्थ में स्नान करनेमे जातिस्मरत्व स्वान करनेसे वाजिम का फल प्राप्त होता है । ऋषभ- प्राप्त होता है। तार्थ में जानमे महस्र गोदान का फल, पुष्पवतीसोर्थ में वटेश्वरपुर तोथ में केशव दर्शन, पुजन और उपवास स्नान और त्रिरात्र उपवास करने सरस गोदानका करनेमे अभोष्ट को मिहि होती है। वामनतोर्थ में जान- फल आर कुलोहार होता है। वदरिकानाथ में स्नान मे दुर्गतिका विनाश और विष्णुलोक प्रालि, चम्पकारण्य करनेसे दोर्घायुलाभ और स्वर्गगमन 'ता है। महेन्द्र- तोथ में एक गति अवस्था न' करनसे सहस्र गोदानका पर्वत पर जा कर स्नान कर मनामेध फल, माता- फल, गोष्ठोवनतीर्थ में एक रात्रि उपवास करनेमे अग्नि- केदार स्नानसे स्वर्ग लोक लाभ, श्रीप नामक गमती- टोमका फल्न, कन्याम वेद्यतीर्थ में पाहार जय करनेसे में स्नान करनेमे खमेधका फल और परमगति प्राप्त मनुलोकको प्राधि, निरोगनदोतो में जानम अश्वमेध- होतो है। ऋषभपर्वत पर निसे वाजपेयका फट, का फन और स्वकलोद्धार तथा वशिष्ठाश्रममं अभिषेक कविरोतोय में जानसे सहस्र गोदान कामे वाजपेययनका फल प्राश होता है। देवकूट स्नानसे समस्त पापांका नाग, गोकर्णतीर्थ में स्नान, उप- सोर्थ में वाजपेयका फल और स्वकुम्मोहार होता है। वास, पृजा प्रादि करनेसे अश्वमेध यज्ञादि का फल, मम्ब. कौशिक मुनिद-रम स्थानमें एक माम वाम करन- तोवापोतोर्थ -गमनसे रूप और मौभाग्यप्रालि, वेगवातटमें से पयामेधका फल होता है। मर्वतीर्थ वरद-यहां देवता और पिटतर्पण करनेमे मयूर और हमयुक्त विमान वास करनेसे बहसुवर्ण यागका पल पौर दुर्गतिका प्राप्ति, गोदावरोतो में जानेमे वायुलोक-प्राणि, वेगवा- विनाश होता है। वौरामतीर्थ में जानसे अश्वमेधका सङ्गममें स्नान करनेसे मर्व पापों का नाश, वरदासङ्गममें फल पनिधारा तीर्थ में जानेसे प्रखम.धका फल पौर स्नान करनेसे वाजिमेधका फन्त था ब्रह्मस्थ णसे तीन