पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६४०

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६२८ तीर्थकांक-तीर्थकर कर सृष्टि के पहले बयाको समस्त श्रुति और अन्य विद्यानों. दरिद्र नहीं रहता। 'मब पानन्दमे कालातिपात करते का उपदेश दिया था तथा परिपोर दयों को मोहित हैं। इन्ट्रको पाना पा कर कचिक पर्वत पर रहनेवाली करने के लिये वाविद्याका प्रदान किया था । ( त्रि०) देवियां पा कर नाना प्रकारमे माताको सेवा करने शास्त्रकार। लगतो है। छ: महोने बोतम पर तोथ कारको माताको तीर्थ काक ( म० पु. ) सीथ काक एव नानपत्वात् । गत्रिके शेष भागमें खेत ऐरावत हस्तो आदि १६ स्वप्रा तो स्थित काकको नाई व्यवहारो, जिम तरह कोवा दिखाई देते हैं। स्वप्नों मे माता पिताको यह निश्चय हो इधर उधर भोजन टू ढ़ने में व्यस्त रहता है, उसी तरह जाता है कि उनको त्रिभुवनविजयो पुत्ररत्नको प्रालि बहुससे मनुष्य तीर्थ में जा कर कौवेको नाई अर्थानुस. होगी। दोनी भगवान्के जम्बावधि महासुखसे कालाति. वाममें व्यस्त रहते । ये पत्यन्त पापी होने पोर प्रन्समें पात करते हैं। गर्भ में ही उनके मति, अति और पवधि नरक वास करते। (पुराण) ये तीन ज्ञान होते हैं । जिस ममय मति-श्रुत-अवधिज्ञान- सोशात (म. पु. ) सोय करोति तोथ व क्लिप तुगा विशिष्ट तीर्थद्वार भगवान का जन्म होता है, उसो समय गमय । १ जिनदेव । (त्रि.) २ शास्त्रकार। तोन लोकके प्राणी पानन्दित होते हैं और इन्द्रका प्रामन तीर (स. पु० ) तोर्थ संसारसमुद्रतरण' करोति कांपने लगता है। इससे उनको तोथ करके जन्म का संख-मुमच। जिन, जिनेन्द्र भगवान्, जेनोंके उपास्य संवाद माल म हो जाता है। माय हो भवनवासो, देव जो देवतापों से भो श्रेष्ठ और सब प्रकारके दोषों से व्यन्तर और ज्योतिष्क देवों के भवनों में घण्टा आदिका रहित, मुक्त भोर मुशिदाता हैं। इनको मूर्तियाँ दिग रव होने लगता है, जिनसे उनको भी मालूम हो जाता म्बर होतो है और उनको पातति प्रायः एकमो होतो है कि भगवानका जन्म हुआ। उसी समय कुवर लक्ष है। केवल उनका वर्ष और सिंहामनका भाकार हो योजन परिमित रम्तीको रचना करते है, जिस पर एक दूसरसे भिन्न होता है। तोरीको जितनो भो इन्द्र अपने परिवार सहित चढ़ कर मत्य लोकमें अवतरण मूर्तियां देवन में प्रातो हैं, वे सब या तो पद्मामन होतो पूव क जय जय शब्द करते हुये मगरकी प्रदक्षिणा देते है या वामन । एनके पासन मौचेहषभ, गज, अश्व हैं। इन्द्राणी प्रसूतिग्टहमें जा कर भगवान्को माताको पादि विभिन्न चि अस्ति रहते हैं, जिनसे उनका मायाबलसे निन्द्रित कर देता है और वहाँ दूमर मायामयो परिचय मिलता है कि ये अमुक (ऋषभनाथ का प्रजित बालकको रख कर तोथङ्कर भगवान्को बाहर ले पातो माथ पादि) तोहारको प्रतिमूर्ति है। हैं। इन्द्र जब भगवान के रूपको देखते देखते तृप्त नहीं . जैन-हरिवंश, जिनेन्द्रपश्चकल्याणक आदि ग्रन्थों क -

  • सोलह स्वप्न इस प्रकार हैं-१ श्वेतवर्ण ऐरावत हस्ती, २

अनुसार नीचे तीर्थों का सशिल विवरण लिखा जाता सुन्दर रूपविशिष्ट श्वेत वृषभ । बैल ), ३ उछलते हुये सुन्दर कान्तिविशिष्ट केशरी वा सिंह, · निर्मल जलपूर्ण दो स्वर्णपटोंसे जिम समय सोथ पर भगवान् स्वर्गीक विमानों से नहाती हुई लक्ष्मी, ५ आकालमें लटकती हुई कल्पतरुओं के पुष्पोंकी चयन कर अपनो माताके गर्भ में अवतरण करते है, उसके। दो माला, ६ पूर्ण चन्द्र, ७ सूर्य, ८ जलमें केलि करती हुई दो छ: महीने पहलेमे हो मौधर्म नामक प्रथम स्वग के इन्द्र मछलिया, केशर चन्दनादिलिप्त रत्नपूर्ण दो घट, १०निर्मल उस नगरको गोभा वर्षनके लिए कुवेरको भेजते हैं। जलपूर्ण सरोवर, ११ समुद्र, १२ रत्नजडित सुवर्णका सिंहासन, कुर मगरमें पाकर वहां रत्नों के मन्दिर, वन, उपवन १३ देव देवांगनाओंसे शोभित रत्नजडित भएका विमान, १४ कूप, बावड़ो आदि निर्माण करते है और साथ ही भगरमे पुषिवीको चीर कर निकलता हुआ धरणेव का भवन, १५ पच लोकी वर्षा करते हैं, जिससे नगरस्थ कोई भी व्यक्ति वर्णविशिष्ट रत्नराशि और १६ शतमहनशिस्खा विशिष्ट अग्नि । चिन्हों का गिरण 'जनधर्म" शब्दमें 'जिनमाला' शीर्षक यह हस्ति देहत मायामयी होता है, इसलिए इसके प्राम तालिका देशमा चाहिये। मागमनसे किसीको बाधा नहीं होती।