पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६४१

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होता तब वह उसी ममर्थ १००० नेत्र बना लेता है। प्रथम नहीं होता और न वे भोजन हो करते हैं । समेवसरण में स्वर्गके सौधर्म इन्द्र प्रणमा कर भगवान्को गादमें लेते है पाये हुए प्राणो भो परस्पर विरोधी मैत्रोभाव धारणा पोर हितोय वर्ग के ईशान इन्द्र उन पर छा लगाते हैं। करते है। पाकाश, दिया और एथिवी निर्मल हो तीसरे और चौथे स्वर्ग के इन्द्र दोनों तरफ खड़े हुए जातो है। छहों ऋतुभोंके फल एक माय फल जाते है। भगवान पर चमर ढारते है। अन्य समस्त पन्द्र एवं देव चतुर्दशअतिशय देखा। इसके बाद जब उनको मोक्षको प्राप्ति प्रादि 'जय जय' शब्द उच्चारण करते है। अनन्तर भगा होतो , सब खर्ग से इन्द्रादि देव पात । चन्दमादिके वानको ऐरावत हस्तो पर चढ़ा कर महासमारोहके साथ पग्निकुमार जाति के देवों के माटोको पम्निसे साथ सुमेरु पर्वत पर ले जाते है। वहां बर्षचन्द्राकार . दार-क्रिया सम्पब होती है। इन्द्रादि देव मका भस्म पागा कशिला पर रखे हुए रखमयो सिंहासन पर भग मस्तासे लगाते और स्तति पूजादि करते है। वानको विराजमान करते हैं। उस समय अनेक प्रकारके तोर मया २४ ही होते है, इसमें ग्यमाधिक्य वाज बजते है, शचिया मालगान करतो और देवा नहीं होता ; न तेईम हो हो सकते है और न पचीस । जनाएं नृत्य करतो है। देवगण हार्थों हाथ चोर-समुद्रसे' जैनागममें उमाविको और भवसर्पिोरन दो काल १००८ कलश भर कर लाते और सौधर्म एवं ईशान विभागोवा उमे । जैनधर्म देखो । उत्सर्पिणो कासमें इन्द्र उनमे भगवानका अभिषेक करते हैं। फिर इन्द्राणो निम्नलिम्विन २४ तोहरो गये हैं, जिन्हें साधारणत: सोथं कर भगवान को वस्त्राभूषण पहनाती है। पचात् उस 'प्रतीत चीयोमो" कहते है। यथा - प्रकार समारोहके साथ नगरको और लोटते हैं और भग- (१)श्रीनिर्वाण, (२) सागर, (३) महासाधु, (४) मानको माताके हाथ सौप कर ताण्डवनृत्य करते है। विमलप्रभु (1) बोधर, (६) मुदत्त (७) पमप्रभु, अनन्तर माताको सेवाके लिए कुवेरको नियुक्त कर इन्द्र, (८) उहर, () पनिर, (१०) सम्मति, (११) सिन्धु- इन्द्राणियां और समस्त देव पपने अपने स्थानको चले नाथ, (१२) कुसुमाञ्जलि, (१३) शिवगण, (१४) आते है। बालक अवस्थामें तोपरी के साथ खर्ग के उत्साह, (१५) शनिखर, (१६) परमेश्वर, (१७) देवगण बालकका रूप धारण कर क्रीड़ा करते है। विमलेश्वर, (१८) यशोधर (१९) छष्णमति, (१०) तीर्थ र किसीके निकट अध्ययन नहीं करते। ज्ञानमति, (२१) बमति, ( २२) बोभद्र (२३) पतिकाम, सी तरह जब भगवान राज्यादि त्याग कर दोक्षा. पोर (२४) शान्ति। ग्रहण करते हैं, तब ५म अधखग के ब्रह्मर्षि नामक देव वर्तमान अवसर्पिणोकालमें जो २४ तोर हो पा कर उनके पैराग्यको प्रशंसा करते है पोर इन्द्र पालक गये. सन साधारण, "वर्तमान चौषोमो" कहत. पर चढ़ा कर उन्हें वन में पहुंचा पाते है। तीर्थर और उनके नाम इस प्रकार है-(१) ऋषभदेव वा "नमः सिहभा" कह कर केशलुचन करते है। इन्द्र पादिनाथ, (२) अजितनाथ, (३) सम्भवनाथ, (४) उन केशोंको रत्नमयो पिटारमें रख कर चोरसागरमें अभिनन्दननाथ, (५) सुमतिनाथ, (६) पनामभ, (७) निःक्षेप करते है। इसके बाद केवलज्ञान प्राप्त होने पर सुपारख नाथ, (८) चन्द्रप्रभ, (८) पुष्पदन्त, (१०) बोतल इन्द्रको पालासे कुवेर श्रादि देवगण समवमरण ( तार्थ नाथ; ( ११) श्रेयांसनाथ, (१२) वासुपूज्य, (१३) रोको संभा) की रचना करते है। इसके सिवा निन- विमलनाथ, (१४) अनन्तनाय ( १५) धर्मनाथ, (१६) लिखित विशेषताएं हो जाती है। एक मौ योजन तक शान्तिनाथ, (१७) कुन्य नाथ, ( १८) परनाथ, ( १८) सुभिक्ष हो जाता है। सोर्थ र विमाछाके पाकाश. महिनाव, (२.) मुनिसुव्रतनाथ, (२१) नमिनाथ) मार्गसे विज्ञार करते हैं पोर उसके चरणों के नीचे देव कमल (२२) नेमिनाथ, (२३) पार्श्वनाथ और (२४) वर्षमान रचते जात. समका मुख चारों दिशाओं में दोखता है, या महावीर स्वामी। विन्द होता एकोनपर किसी तरह का उपसर्ग .भीमनागवतके मतसे यही विष्णु के प्रथम अवतारा : Vol. 1x. 158 - -