पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६४३

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वीर्यपात्रा-वीर्यवत् तीर्थ यात्रा (स. स्त्रो०) तीर्घ मुद्दिश्य यात्रा। पवित्र यहां पाये पोर समाखक नामक गणपतिको सामने स्थानाम दर्शन स्नानादिके लिये जाना। रख कर पवस्थाम कर रहे हैं। मण्डसेखर चवमे तीर्थराज (स० पु०) तोर्थामा राजा, ६-तत् । प्रयागतोर्थ । योकण्ठ नाम सिका पागमन हुमा है, ये मण्ड नामक तो राजि (सं० स्त्रो०) तोर्यानां राजिरत्र, बहुबो०। विनायकको उत्तरदिशामें रख कर प्रस्थान कर प्रविमुक्त काशीक्षेत्र। यहां सभी तीर्थ विराजित हैं, रहे हैं। इसलिये कामीको तीर्थराजि कहा जा सकता है। किस छागलाण नामक महातीर्थ से भगवान् कपींवर किस क्षेत्रसे कोन कोन तीर्थ कायोमें पाये है, उसका विशाचमोचमतो में स्वयाविभूत हुए है। पाम्बान वर्णन कायोखण्ड में इस प्रकार लिखा है,- के खरवसे सूक्ष्मखर पाये जो विकटदम्भ गणपतिक समोप खग, मत्य और पातालमें जितने भो मुक्षिप्रद शुभ अवस्थित है। मधुकेवर से जयन्त नामक महालिका पायतन हैं, वे सभी कामों में लाये गये हैं। कुरुक्षेत्रसे .प्रागमन हुमा, ये लम्बोदर गणपति के मामने अवस्थित देवदेवके स्थाणु नामक महालिङ्ग यस माविर्भूत हुए हैं, है। थोशेलपे देवदेव त्रिपुरान्त म पाये, जो विशेखर यहाँ उनको कलामात्र अवस्थित है। इसके पास ही स्थानमे भगवान् कुछ टेखर, जानेश्वरमे भगवान् त्रिशूलो लोलाकैसे पश्चिमको तरफ सबिहतो नामक महापुष्करिणो रामेश्वरम जटोदेव, विमन्ध्याक्षेत्र मे देवदेव नाम्बक, हरि. है, यहीं कुरुक्षेत्रतीर्थ है। नैमिषक्षेत्र मे देवदेव चन्द्र क्षेत्रसे भगवान् हरेखर, मयखरमे भगवान् गर्व, ब्रह्मावर्त कूपके साथ पाये, जो दुण्डिराज उत्तरको पोर स्थलेश्वरसे यशेखर महालिङ्ग, हर्षितनेवसे तमोहारो अवस्थित है और उनके पास ही ब्रह्मावत कूप है। गो. इसिसिका, वृषभध्वजक्षेत्रमे भगवान् वषेश्वर, कुदारक्षेत्रसे कर्ण से महाचल नामक लिङ्ग और प्रभामतीर्थ से शशि थानेश्वर लिङ्ग, ईशानक्षेत्रमे ममोहर भैरवमूति, कम- भूषण नामक लिङ्ग पाये, जो ऋणमोचनतीय के पूर्वको खुलतो मे सिक्षिप्रद भगवान उग्र, वखापय नासक पोर अवस्थित है। उज्जयिनोसे पापनाशन लिङ्ग आये, महाक्षेत्रमे भगवान् भवदेव, दारवनमे भगवान् दडो, जो प्रोझारेश्वरलिङ्ग के पूर्वको तरफ विद्यमान है । पुष्कर- भकर्णदसे भद्रक सहित माहात् शिव, हरिश्चन्द्र, मे पायोगन्धखर लिङ्ग पाये जो मत्स्योदरोमे उत्तर में हैं, पुरसे भगवान् शङ्कर और कायारोहणक्षत्रमे पाचाय नकु. अट्टहास से महानादेखरलिङ्ग आये जो त्रिलोचनासे उत्तर लोश पाशुपतत्रतावलम्बो अपने शिष्यों के साथ पाकर यहाँ में हैं, मरकोटसे महोल्काटेखालिङ्ग पाये जो काम खरसे अवस्थान कर रहे है। गङ्गासागरमे प्रमरेखर, सात- उत्तरमें है,विश्वस्थान विमलेखर लिङ्ग पाये जो खीन- गोदावरोसे भगवान् भीमखर, भूतेश्वरचेवसे भगवान् से पश्चिममें हैं, महेन्द्रपर्व नसे महाव्रत नामक महालिङ्गा भस्मगाव, नकुलोखरसे भगवान् स्वयम्भ, हेमकूट पर्वत आये जो स्कन्दर के पास है, और गयातोथ से फल्गु से विरूपाक्ष गङ्गाहारमे हिमादोखा, वेलामसे सम्म कोटि आदि सार्यकोटि परिमित तोों-सहित पितामहेश्वर यह अन्यान्य महाबल गणनिचोंके साथ गणाधिप, गन्धमादन पा कर अवस्थान कर रहे है। गयातोध से शूलटकर पर्वतसे भूभुवः नामक लिङ्ग, जनलिङ्गस्थलसे पवित्र नामक महखर तोर्थ राज सहित पाकर निर्वाणमण्डपसे जलप्रिय लिङ्ग और कोटोखरतीर्थ मे श्रेष्ठलिङ्गका यहाँ दक्षिण अवखान कर रहे है तथा महादेव सहकर्णसे पागमन हुमा है। ये मभो तोर्थ कागो में पवस्वान कर महातजोवहिप्रद महातेज लिङ्ग, रुद्रकोटितीर्थ से महा रहे है, इसलिये रस का नाम तोथ राजि पड़ा है। उप- योगोखर लिङ्ग, भुवनेश्वर क्षेवसे स्वयं सत्तिवास और युक्त तो में नान, दान प्रादि करनेसे जितना पुण्य कुराजाङ्गलसे चण्डोखर यहाँ पाये है। होता है, कापोस्थ उन्हों तोमि स्नामादि करने में कालघर तोर्थ से खय भगवान् नीलकण्ठ पाये है, होता है उससे कहीं सोगुना अधिक पुण्य होता है। तथा काम्बोरसे विजयलिङ्ग पा कर गासहटाने पूर्व में - (काशीखण्ड ६६ म०, काशी देखो। अवस्वान कर रहे हैं। विदखापुरोले भगवान् जरिता तो वत् (स'० वि०) सोच विद्यतेऽस्वतीय-मतुप मन,