पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६५२

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अत्यन्त कष्टदायक मातम पड़ने सगा। भवितव्य मार द्रश्यादि देते थे। इस व्यवसायमें लाभतो बात तो पतिक्रमयीय है, यह सोचकर वे संसारिक कार्य के दूर रहे, असममें भी बहुत घाटा एपा। जब रहोंने देखा करने में यात्रवान् हुए । दुःखके बाद दुःख पाता है. इस वि दूकानदारी में कोई लाभ नहीं ; तो वे एक नवीन समय एक दूसरो दुर्घटनामें उन्हें और विपद में डाल । व्यवसायमें प्रपत्त हुए। किन्तु उसमें भी उन्हें सुविधा न दिया। रम समय इनके बड़े भाई को बोका अकाल हो। हुई। इस समय चारों पोरमे इनको निन्दा होने लगो। प्राणान्त हुमा मान्सजो एक तो सब विषयांम उदासोन एक तो सामारिक कष्ट और दमो चारों पोरसे पात्मीय थे हो. दूसरे माता पिताको मृत्य मे उनको उदासीनता खजनों के कटुवचनको बौछार; वे अधोर हो उठे। कोई और ज्यादा बढ़ गई। अब मोके मर जाने पर अपने को कहता कि तुकाराम प यन्त निर्बोध है; कोई कहता संसारके सब बन्धनसे मुक ममझ कर उन्होंने तो पर्य- कि तुकाराम अकर्मण्य पोर व्यवमाय-कार्य में नितान्त टन और धर्म चर्चा के लिये घर छोड़ दिया। मूर्ख है। रहीं कारणोंसे तुकारामका मन अत्यन्त इस समय तुकारामको उम्म पठारह वष को थो। चाल हो उठा। अनेक चेष्टा करने पर भो वे अपने मनको तुकाराम जिस कार्य के लिये इस पृथिवी पर पाये हुए संसारके प्रति पालष्ट कर न सके। उनका उदय जिस थे, नामशः उनका वह पथ उन्मुक्त होने लगा। भावमे पूर्ण हो गया था, उसके वेगको दमन करना मादजायाको मृत्य और ज्येष्ठ माताके रहत्यागसे प्रसाध्य था। तुकाराम काम-कान तो करते थे; किन्तु भगवति तुकागमके उदयमें नागरित हो गई और वे उनका पन्तःकरण सर्वदा हरिभक्रिम रहा करता था। .क्रमशः भगवद प्रेम निमम्म होने लगे तथा समारके धोरे धोर तुकारामका समस्त मूलधन जाता रहा । इस प्रति प्रमशः उनको उदासीनता झलकने लगी। व्यवसमय उनके पत्यन्त सांसारिक कष्ट उपस्थित एमा। मायके प्रति ध्यान नहीं रहनेसे वाणिज्यमें उन्हें तुकाराम रस कष्टको निवारण करने के लिए फिर भो बहुत घाटा लगा। तुकारामका धन क्रमशः नाश होने व्यवसाय कार्यमें प्रवृत्त हुए । किन्तु अब उनके पास मूल. लगा। व्यवसाय वाणिज्य चलाने में पादान प्रदान धन कुछ भी न बचा था। तब से भार ढोनेवाले बला. विशेष पावश्यक है, किन्तु मे शाम होते देख व्यव. को पोठ पर धान लाद कर गांव गांव बेचने लगे। रात साधिगण तुकारामके माथ पादान-प्रदान बंद करने लगे; दिनके परिश्रममे, आहार-निद्रा ममय पर न होनेमे, मोत परन्तु तुकाराम जिनसे रुपये पाते थे, वे रहे व्यवसाय प्रोबसे किसोसे भो वे विचलित न हुए ; किन्तु इस कार्य ४दाम देख कर अप-परिशोधमें बिलम्ब करने लगे। में भी उन्हें लाभ न हुआ। उनका दुः५ जितना हो सुतरां दिनों दिन तुकारामको पवनति होने लगो। अधिक बढ़ने लगा, उतना हो वे विठोवाक घरबमें पाली सांसारिक व्यय जैसाका तैसा बना र पायका पथ समर्पण करने लगे। इस समय तुकारामका अनाहौर श्रमशः घटने लगा। तुकाराम अत्यन्त विपद में पड़ गये। इत्यादि जो कुछ था, वह धोरे धीरे निःशेष होने लगा। पूर्वको अवस्थाको पलटानको रन्होंने संकड़ों यन किये तब प्रतिवासो बणिक् आ कर उनका कागज पत्र देखने लेकिन वे मफलता प्राप्त न कर मके। उनका उदय लगे। बाद उन्होंने अनुमान किया कि तुकारामको रक्षाका जिस भगवद्भलिसे पूर्ण था, वह क्रमशः बढने लगा। पब कोई उपाय नहीं है, तुकाराम दिवालिया हो गये। इस समय तुकारामने पहलेको नाई महाजनो व्यवमायमें व्यवसायोके लिए दिवाला निकलने और निन्दा फलनेसे बतिको सम्भावना न देख कर एक साधारण दाल- बढ़ कर और कोई कष्ट नहीं। यह मम्बाद सब जगह पावसकी दूकान खोलो। म समय तुकाराम जहां बिजखोकी तरह फैल गया । सब महाजनोंने पा कर बडीचे, वहीं हरि-कीतन करते थे। उनका दरवाजा घेर लिया। इसी समय तुकाराम पर पापडके गाने पर वे सोचते थे कि उन्हें द्रव्य वाम देने बड़ी भारो विपत्ति थी, वे बिलकुन्त हतबुषि हो गये। से पचमोगा यह सोच कर पायको पकाके पनु. तब उनके पानीयखजनोमने किसोने पर्षसे सहायता