पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६५४

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६४२ तुकाराम अत्यन्त स्नेह करते थे। पुत्रको अकालमृत्युम तुकाराम तुकारामको इस पवस्था में देख लोग तरह तरहको बात हृदय पर गहरो चोट पहुँची। उड़ाने लगे। कोई करता था जि वावमार्यमें क्षतिग्रस्त तुकारामका जान अब तक पूर्ण विकशित न हो कर तुकारामका मस्तिष्क विक्षत हो गया है, कोई हमा था; किन्तु इस तरह बार बार विपत्तियांक महते कहता था कि तुकारामने अविका के लिये यह माधु- रहनेमे वे अच्छी तरह समझ गये. कि रम ममारकप भाव धारण किया है ; इत्यादि किन्तु तकारामके लिए कम क्षेत्रमें कहीं भो मुखका स्थान नहीं है। मामारिक- निन्दा और स्तुति एक हो समान थी। वे इच्छानुमार सुख अनोक और भान्तिमाव है। पहली स्त्री और पुत्र- माना स्थानों में धूम-घूम कर धर्म चिन्तामें समय वातोन को मृत्य मे तुकारामका ममार मोह इतने दिनों तक करते थे। अलक्षय था । तुकाराम मोचा. मामारिक सुखका तुकारामके पूर्व पुरुष विश्वम्भरने देहतमें बिठमेवा पाशासे कितनी ही चेष्टाये को: किन्त कुछ फलम हुआ, के लिये जो मन्दिर निर्माण किया था, वह मस्कार के बग्न दुःखही बढ़ता गया। ममारका दःख पर्वत-प्रमाण प्रभावसे भग्नप्राय: हो गया था। तुकारामने मन्दिर पौर सुख धान्तिमात्र है। मा विचार कर तुकाराम संस्कार कराना चाहा : किन्तु इतना धन उनके पास नहीं मंमार-बन्धनको लिख कर देहत के निकटवर्ती भास्वनाथ जिससे उनका प्रभीष्ट मिड हो; परन्तु साधु-उद्देश्यसे नामक पर्वत पर जा भगवदाराधनामें लोन हो गये। रस निरस्त होना म भगवद्भक्त के लिये सुकठिन थे। तुका. पर्वत पर पहुंच कर उन्होंने शान्ति लाभ के लिये मनाह गमने अपने हाथमे मन्दिर-मस्कारका संकल्प किया व्यापी अविश्वाम पाराधना और चिन्तनके बाद शान्ति एवं स्वयं मट्टो खोद कर मन्दिरनिर्माणका कार्य प्रारम्भ लाभ को। किया। सदिच्छा-प्रणोदित कार्य कभी अस पूर्ण नहीं तुकाराम जब भावनाथ चले गये, तब उनके पात्मीय- रहता। क्रमशः प्रतिवामी इस कार्य में सहायता देने खजन चार्ग मोर उनको पर्यटन कर उमी स्थान पर पा लगे। तुकारामने आदिमे अन्त तक साधारण श्रम पहुंचे। बार बार अनुरोध करने पर तुकाराम पर्वतमे जीवियोंकी तरह मन्दिर निर्माण के कार्य में परिश्रम उतर कर इन्द्रायणोके किनारे पाये। मात दिनों तक किया तथा सर्वसाधारणको सहायतामे मन्दिरको प्रतिष्ठा उन्होंने कुछ खाया-पोया न था। भोजन करने के बाद कर दो। अब तो तुकाराम नव-अनुरागसे विठोवाको उन्होंने रोते हुए अपने भाईसे सांसारिक अवस्था कही। पूजा करने लगे और रामकोर्स नमें नियुक्त हुए । अन्यान्य वावसायमें तुकारामको ममम्त मम्पत्ति मष्ट हो जाने पर भक्तगण अभिनव पदावनो रचना कर बिठोवाके चरण में भी उनके पितान. लोगों को जो ऋण दिया था, वह उपहार प्रदान करते थे : किन्तु तुकारामके इम तरः- उन्होंने पूर्णतया वसूल म किया था। भाईने रोते हुए को पदावलो रचकर भेंट देने को यथेष्ट इच्छा करने पर एनसे कागजात मांगे । तुकारामने कागजात मा कर छोटे भो भक्ति ग्रन्थों में अभिजतः न होने से उनको वासनाको भाईमे कहा--'भाई अब तथा पाशा क्यों करते हो. पूर्ण न होतो थो। इमलिये वे पूर्व तन साधु भोको प्राज इन कागजातो को रन्द्रायणीके जलमें फेक दी।' ग्रन्थावलो का मनोयोग के साथ पाठ करने लगे। महाराष्ट्र इस पर भाईने कहा-"पाप संसारत्यागो हैं, पापमे देशोय माचोन भक्त-कवि नामदेवको अभङ्ग, कवोरको या काम हो मकता है। किन्तु मुझे जब इस परिवार- पदावलो जानवर क्कत गोतायाख्या, अमृतानुभव नामक वर्गका प्रतिपादन करना हो है तब मुझसे यह काम अध्यात्म-ग्रन्थ. योगवाशिष्ठ और श्रीमद्भागवत प्रभृति होना पमम्भव है।" तुकारामने छोटे भाई को इस बातको भक्ति-ग्रन्यांका अनुगोलन करनेम उनका हृदय और भी सुन कर उसका अडांग उन्हें दे दिया और पीशको भनिसे परिपूर्ण हो गया। इनको स्मृति शक्ति अत्यन्त इन्द्रायणौके जन्नम फेंकते हुए कहा, 'आजसे तुम सोचा थो, उससे थोड़े ही समयमें व उत्त ग्रन्थों के निवितोलामो, भिक्षासे हो मैं जीवन निर्वाह करूंगा।" तत्वावधारण में समर्थ हुए। उस समय वे ध्यान, धारणा,