पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६५६

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तुकाराम धार्मिग तु कामम अपर पत्याचार करने लगे। अपा करें।" मन्यांची तकारामक रस बहारमै मन्यानो बाबा गुसाई नामक एक बागाने नर्क प्रति एकदम सभित हो गये, उमो दिनसे सनका बिष पहले पत्याचार पार किया माजोरम ग्राम एक भाव जाता सा भोर सकाराम प्रति पान्तरिक प्रेम मठ बनाकर वहांका महन्त हो गये थे, पहले इनका मन उत्पन्न हो पाया। कोई भति करते थे। पब तुकारामके प्रति मभा का अनु दोक्षा नहीं होनेसे ज्ञान पम्प प नहीं होता, रसो गग देख कर वे उन सामयुत करने के लिये विशेष से एक दिन विठोबाने स्वप्रमें ब्राह्मणाका रूप धारण कर चेष्टा करने लगे। तुकारामको एक भसने एक दिन तुकारामको 'राम, मण, हरि' म मासे दोजित मन्दिरको तोड़ फोड़ दिया। इस पर गोसाई ने उह' किया। खप्रष्ट महापुरुषके पन्समिसे तुकाराम गाली दो। एक दिन सन्ध्या ममय एकादयोको अत्यन्त व्याकुल हो गये। उन्हें कुछ भो शान्ति न मिलो। विठोवाका दान करनेके लिये इस मन्दिरमें बहतसे अन्त में उन्होंने सोचा कि पुनः संसार में प्रवेश शान्ति लोग एकतिम हुए थे. चारों ओर काटेके रहने नहीं पानका कारण है। यह सोच कर फिर कुछ दिन- कारण दर्शकोंको पत्यन्त कष्ट होता था इसलिये का- के लिये उन्होंने संसार परित्याग किया। उस ग्राम रामने अपने साथसे काटेको उखाड़ कर स्थान पनि निकट वालर बन नामक एक भरण्य में जाकर वे सपने किया था। मयाजी गोमाई तुकारामको काटा उखा- लगे और प्रति दिन प्राताकाल इन्द्रायणी नदी में स्नान इसे देख क्रोषित हो उठे और उौ काटेसे नकारामको कर विठोबाका. दर्शन करनेके लिये परस्य जाते थे। मारने लगे। एक के बाद एक करके १०१५ काटेकी एक दिन जब वे कहांसे न लोटे तब उनको खो पबलाई छड़ो तुकारामको पीठ पर टूट गई। बाद इसके अत्यन्त व्याकुल हो उन्हें खोजने लगों; पन्त इन्द्रायणो मन्बाजी लान्त हो कर बैठ गये। गोसाई प्रभ इस तोर पर उनसे भेंट हुई और बहुत का मन कर उन्हें तरहसे तुकारामको प्रहार कर मन्दिर में प्रत्यावत्तए, घर लौटा लायो और बोलो "पाज दिनसे में फिर कभी सुवागमन विमा पद किये रस कष्ट को सहन कर धर्म कार्य में व्याघात न करूगो।" किन्तु अबलाई पस लिया। तुकारामको ऐसी अवस्खा देख सबके नेत्र में प्रतिभाको पनेक दिन तक पालन न कर सकी, क्योंकि पाचू भर पाये। तुकारामनेरम प्रचारको उपलक्ष तुशारामके तीन कन्या और दो पुत्र थे। तोनों कन्यानों- करके कई एक प्रभाकी रचना की। का नाम भागीरथी, काशी और गङ्गा तथा पुत्रका नाम सकाराम किस तरह असाधारण पुरुष थे, उसका महादेव पौर विठोपा था। एक तो पुत्र कन्यानोंका वर्णन करना पमाध्य । वे इस प्रकारमे दण्डित प्रतिपालन, दूसरा प्रभूत अतिधि-समागम, इससे पबलाई हो कर घरको लोटे, उनको खो सा उमको अङ्ग बहुत व्यस्त रहती थीं। सो कारण पनेक बार वह वेदनाको दूर करने के लिये सेवा एषामें लग गई। तुकारामको दो चार बाते कहा करतो थीं। इसके तुकारामके सुस्थ होने पर एकादशीके हरिजागरणके मिवा प्रथमा बन्या विवाह के योग्य हो गई थी, जिसके लिये ममस्त प्रायोजन इमा, कोर्सन सुननेके लिये मुण्ड के लिये वह मर्वदा बर बढ़ने के लिये हठ करतो थो। एक भागद मनष्य पान लगे; किन्तु मन्याजो गुसाई नहीं दिन तुकाराम पावानुसन्धानको गये पौर स्वजातीय पाये। इस पर तुकाराममे उनको बुलाने के लिये किसो सोन बालकको देखकर उन्हें अपने घर लाया और एक एकको भना। अगर प्रमुख करकर गुमाईजोने दो दिन तीनों सड़कीका विवाह करा दिया गया। उस पाटमोको लोटा दिया। तब तुकारामने खयं जा तुकारामने इस बार पबलाईके हाथ पुटकारा दण्डाद कर कहा, "अपने से बहुत तक बड़ी पाया। इनकी ख्याति धीरे धीरे फैलने लगी। दूर 'प्रसार करने में प्रभु धक गये होंगे, इसमें मेरा हो दोष दूर देयोंसे मनुष्य पाकर उनका उपदेश ग्राप करने है। पमो सकीचमा कारकीर्तनमें योगदानबारको लगे। तुकारामद होकर माथको उपदेश देने थे,