पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६६३

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तुपरिकता गया । ६३१ हिजरी में लक्ष्मणांवतोके शासनकर्ता मालिक पाये। राजधानोमें पाकर उन्होंने अपने मन्बोको युधनतातको मृत्य होने पर तु धान खां हो शामन- दिल्ली भेजा। मर्कउल-मुल्कने दिलो-दरबारमें पा कर कर्ता हुए। जब सुम्लतान अल तमसको मृत्व, हुई तब मबाट पलाहोन मसायद शाहसे माहाको प्रार्थना त धान खां और पाक नामक राढ़प्रदेशके शामन को। सम्राट ने काली जलालउहोन कनानोको खिलात, कमि विवाद हुआ। मिनहाजने लिखा है, कि रस समय चन्द्रासप, साज और राजचित्र देकर प्रेरण किया लक्ष्मणावती दो भागों में विभक्त थो-एक भाग लखन तथा कमरउहोनक धोम बिन्दुसानो मन्य दलको या राढ़ और दूसरा भाग वसनकोट वा वरेन्द्र था। एवंगा नदोके पूर्वोय स्थानक सैन्यदलको भेजा। तुधान खां वरेन्द्रभूम के पोर पावक राढ़के शासनकर्ता अयोध्याके शासनकर्ता तमरखाने भो किनारको ससैन्य थे। लक्ष्मणावतो नगरोके अन्तर्गत वसनकोट शहरके लक्ष्मणावतोके महायतार्थ प्रेरण किया। . . अधिकार के लिये दोनों में लड़ाई छिड़ो । आरवक साइमी ६४२ हिजगेम जाजनगराधिपति कतासोन्के बुद्धका पुरुष थे, इन्हें सब कोई पापोर खाँ कहते थे। युद्धमें प्रतिशोध लेनेके लियं, मध्यणावती पर पाक्रमणक तधाम खाँन पापोर खाँक मम स्थानमें शराघात कर उद्देश्य से बहुमख्यक पखारोहो पौर पदाति मेंन्य लेकर मार डाला। पारवकके मरने पर दोनों प्रदेश तु धान- वहां जा पहुंचे। राढ़में रम समय तवामक पधोन क अधीन आ गये। फखर-उल-मुल्क करोम-उदोन लाधरी पासनकात थे । सुलताना रजियाके राजत्वकालमें सुधान खाँने दिल्ली- जाजनगरके सेनापतिने पाले गढ़ देश पर हो चाक- के दरबारमें प्रमेक उपयुक्त व्यक्ति और उपहार प्रेरण मण किया। युबमें करोम-उदोन्को बहुतसो मेना किया। सुलतानाने भी चद्रताप, राजदण्ड, पञ्जा, मारो गई। अन्तमें करोम दल-सहित नसावतीका नहबत इत्यादि प्रदान करके तुधानको मम्मानित किया। भाग गये । चाटेश्वर शब्द देखो। जामनगरके मेमापति- इसके बाद तुघानने त्रिहत पर भाक्रमण किया और ने उनका पोछा किया, किन्तु जब उन्होंने सुना कि दिलो. बहुत धनरत्न लेट कर घर लाये। से मेमा पा रहो है तब वे कूच करनेको वाध्य सुलतान मुइज-उद्दीन बारम शाहके राजत्वकालमें हुए। दिखोसे प्रेरित मण्यदलने उपस्थित होकर देखा भो सुधान खाँ सम्राट के साथ सद्भाव रखते थे। सुलतान कि विपक्ष नहीं है और न युद्ध हो हो रहा है। पन्तम अलाउद्दो मसायद शाह राजत्वके पहले तुधानके समर खाँके माध तु घान खाँका युद्ध छिड़ा। किन्तु हितैषो विश्वासो मन्त्रो बहाउद्दीन हिलाल सुरियानोने कई एक घंटा युद्ध करने के बाद एक व्यक्तिको मध्यस्थता- अयोध्या, कोग-माणिकपुर और उदेश अधिकारमें लाने से लड़ाई बन्द हो गई। नगरकहार पर ही धान लिये प्रतिज्ञा की। ६४. हिजरोमें तुघान खाँ कोरा- खाँका शिविर था, वे ससैन्य शिविरमें जा पनादि त्याग माणिकपुरमें उपस्थित हुए, बाद अयोध्याको सोमामें कुछ कर विवामका उद्योग करने लगे। किन्तु तमर खाँक दिन रह कर लक्ष्मणावताको लौट पाये। शिविरमे कुछ दूरहो में रह कर उन्होंने पत्रादि स्वागत • ६४१ हिजरीमें जाजनगर ( उकल ) के राजाने छलसे शिविरम जा अवशिष्ट में न्योको परास्त किया और लक्ष्मणावतो राज्यमें सत्यात पारम्भ किया । तु धान खाँने हठात् पा कर त धान खाँ पर पाक्रमण किया। न घाम जाजनगर-सन्यके उत्पात-निवारण के लिये उन्हें जतामीन खाँन घोड़े पर सवार हो मगरमें प्रवेश कर अपने प्राण के निकट दो नहरके पार मार भगाया । वे एक बैंसक बचाये । त.घानके अनुरोधले मिनहाज होन सिराजी- जङ्गलमें छिप रहे । अन्त में जब मुसलमान. सैनिक ने दोनों में सन्धिका प्रस्ताव किया। तमरखाने प्रस्ताव खाने पोने के लिये शिविरको पाये, तब हिन्द-सैन्यने किया कि तु धान खाँ यदि उन्हें साणावतो राज्य छोड़ 'गेछेसे भाक्रमण कर बहुतसे मुसलमानोंको विनष्ट कर कर दिल्ली चले जाय, तो सन्धि हो सकता है।त.घान ला। तुघाममा विफल मनोरथ हो राजधानी सोट खा रस अजब प्रस्तावसे समझ गये किया समरखा-