पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६७

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गेडा मीम-टोरे उसकी दशक्रिया शेती है। फिलहाल इस प्रथम २ पायात चोर पालो रहते हैं। इसका तबका कुछ परिवर्तन गया है। पब कुटर और द्रव्यादि बोल यों है- मुरदेव साथ भस्मीभूत नहीं की जाती, बल्कि उसके भा. दिन, जिनता, . गैदिन, धा। जलाने के लिये एक धारी कुट र बनाई जाती है। मब मिल कर जो दो एक तेजसपत्र देते हैं, मात्र की अथवा मुरदे के साथ जलाया जाता है। शवदाहके बाद युवक टोना (हि.सी.) १ जादू चलानेवाली खी, नजर सोग मिल कर ८१० महिषोंको मारत है और स्त्रियाँ लगानेवालो। २जो सो मन्त्र पौर झारफंक करती मुर बाँध कर रोती है। इनमें स्त्रियां नाचती नहीं है। और पुरुष गाते नहीं। ये मांस-मच्छी कुछ नहीं खाते टोनहाया ( पु.) वह मनुष्य जो टोना करना हो, और इसीलिए मृत्य भोजके लिये उनका वध भी नहीं जादू करनेवाला पादमो । करते। टोना (हि. पु.) १ मन्त्र तन्त्रका प्रयोग, जादू । २ इस मृत्स सवक सिवा एनमें और कोई भी उत्सव विवाहके पवसरमें गाये जानेका एक गीत। ६ एक नहीं होता। और तो क्या, विवादमें भी कोई उत्मव शिकारो चिड़िया । नहीं होता। पितामाता मिल कर निश्चय कर लेते हैं टोनाहाई (हिस्सो ) टोनहाई देखो । . . कि हम अपनी कायाका व्याह तुम्हारे पुत्रके माथ करेंगे। टोप (हि.पु.) १ बड़ो टोपी, सिरका बड़ा पहरावा।२ बम, इसके बाद किसी दिन कन्या स्वामीके घर जा कर शिरस्त्राण, लोहको वह टोपो शो लड़ाईकै समय. सिरको रहने लगती है। इनमें लड़कीका व्याह ३।४ वर्ष की रक्षाके लिये पहनी जातो है, खोद, कूड ।। ३ खोल, उममें और लडकेका १० वर्षको उममें होता है। गिलाफ । ४ गुस्ताना, उगली पर पहिममेको कोई टोडा भीम-राजपूतानेके जयपुर गज्यके अन्तर्गत एक महर। या पोतलको एक टोपो। इसे दरजो लोग सोते समय यह प्रक्षा• २६ ५५ उ० और देशा० ७६४८. पू. के मध्य एक उंगली में पहन लेते है। जयपुर शहरमे ६२ मोलको दूरी पर पवस्थित है। लोक टोपन (हि.पु.) टोकरा।. .. मख्या प्रायः ६६२८ है। शहरमें केवल ८ स्कल है। टोण (हि.पु.) बड़ी टोपी। टोड़ी (हि. स्त्री.) रागिणीका एक भेद। इसके टोपो (हि. स्त्रो.) १ मस्तक पाच्छादन वस. गिर गानेका समय १० दण्डमे १६ दण्ड तक है। इसका परका पहरावा। २ राजमुकुट, ताज। ३ कोई गोन्त स्खाग्राम इस प्रकार-सारेगमपधनिस सनिध वस्तु जिसका पाकार गोल और गहराहो, कटोरो। ४ गरेस। रेस नि स निधध निसरी गरे बन्दकाका पड़ाका। ५धिकारो जानवरके सुपर स निध। प ग ग म ग रे गरे सरे नि म नि ध म रे ग म चढ़ाई जानेको थैलो । लिगका पगला भाग, सुपारा। पधध प. मग मगर म नि स र रेस निध ध ध नि टोपोदार (हि. वि.) टोपो लगी हुई। म। हनुमत्क मतानुसार इसका स्वरग्राम यह है- टोपीवाला (हि.पु.) १ टोयो पहना एपा पादमी। २ म प ध नि स रेगम अथवा सरगम पध मिम। अहमदशाह और नादिरशारको सेनाके सिपाही। ये से सम्पर्य जातिको गगिणी मानते हैं। इसमें शुद्ध लाल टोपिया पहन कर भारतवर्ष पाये थे और टोपीवाले मध्यम और तीव्र मध्यमके सिवा शेष सब स्वर कोमल कहलाते थे । ३ पंगरेज या यूरोपियन जो इट (hat) होते। यहभैरव राणको स्रो । इसका रूप लगाते है। इस प्रकार है-हाथमें बीणा लिये हुए प्रियके विरहमें टोर (हिं. स्त्रो.) नमककी कलमोंको.छान कर निकाल गातो है, शरीर पर सफेद वापौर बांस बहुत लेने पर बचा एषा बोरकी मौका पानी। इसे फिर सदर । १.चार मावानोंका एक तास। इसमें सवाल पौर शन बार मोरा निकाला जाता है।