पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६७२

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तुम्बर-तुम्बुरु तुम्बर ( म० क्लो० ) तुम्बतढाकार रातिरा-क । वादा तोक्षणकएक, तोहाफल, तोहापात्र, महामुनि, स्कटल, भेद, एक प्रकारका बाजा।२ तुम्बर गन्धर्व। सुगन्धि । इसके गुण-कफ, वात, शूल, गुल्म, तुम्बरचक (म क्लो०) तम्बर. चक, कर्म धा० । नरपति- उदराधान, मिनाशक और अग्निप्रदीलकारक जयचर्याक्त चक्रभेद । चक्र देखो। है। भावप्रकाशके मतमे इसके पर्याय-सौरभ, मौर, तुम्बक ( म० पु०) गन्धन भेद, एक गन्धर्व का नाम। वनज, मानुज और अन्धक । इसके गुण-तिक्त, तुम्बयन ( स० पु० ) सहमपितार्क अनार एक देश। कट रस, कट, विपाक, रुक्ष्म, लष्णवो, पग्निदीप्ति. यह दक्षिणा में १२।१।१४ नक्षत्र के मध्यवस्थित है। कारक, तीक्ष्ण, रुचिकारक, लघु, विदाहो एवं वात. नम्बा ( म० स्त्रो.) तुम्ब-टाप । १ अलावु, कड़ा ने भिक गेग. चक्षुरोग, कर्ण रोग, प्रोष्ठगत रोग, गिरो. कद्द । २ गयो, एक प्रकारका जङ्गलो धान। यह गेग शरीरका गुरुत्व, कमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, खास नदिया या साम्लों के किनारे श्रापमे आप होता है। और लोहा प्रभृति रोग नाशक। सुम्बि ( स० स्त्रो० ) तुम्वति नागयति अरुचि तुम्ब-इन् । तुम्बुक (म. पु.) १ एक गन्धर्वका नाम। ये मधु अलावु, कड़ा कद्द। अर्थात् चैत्र मासमें म य के रथ पर रहते हैं। सङ्गोत. तुम्बि का (म स्त्रो० ) सम्ब-गवुन टापि प्रत इत्व। विद्यामें ये विशेष पारदर्शी थे। इन्होंने बाके निकट १ अन्नाव, कद, ! २ कट तुम्बा, कङमा रह। मङ्गोतविद्या सोवो थो। ये विशु के अत्यन्त प्रिय पानं - तुम्बिनो ( स्तो.) तुम्ब णिनि-डोप । कटुतुम्बो, घर थे। का कह तित मौको। ___ अद्भुत रामायण में लिखा है, बेतायुगमें कोगिक सुम्यो (म स्त्रो०) तुम्बि-ङोष । १ अलावु. छोटा कड़ा नाम एक ब्राह्मण थे। ये वासुदेव के अत्यन्त भक्त थे कह । २ कुनिक वृक्ष, बहेड़े का पेड़। (नमाला ) और सर्वदा उन्होंका गुण गान किया करते थे । हरिगुण तुलौतेन म' को) अलावतेल, कह का तेल।। गान सिवा उनका काई दूमर कार्य हो न था ! वे तुम्बापुष्य ( म क्लो) तुम्बाः पुष्पमिव पुष्पमस्य । अम्ल वु विणुस्थल नामक अनुत्तम हरिक्षेत्र जा कर वहां पुष्प, कर का फन्न । मूकमा उतियोगर्म सारवण से पूरित अत्यन्त तुम्बु : ( म० को.) तुम्ब बाहुलकात् उकः । अलावु भक्ति के साथ रिगुण हरनमें प्रवृत्त हुए तथा भिना हारा फल, २६ का फल। जोवनयात्रा निर्वाह करने लगे। व पद्माक्ष नामक तम्बुको-भार वर्षीय एक प्राचीन आना यन्त्र, चमड़ में एक ब्राह्मण रहते थे । वे कौगिक का गान सुन कर सर्वदा मदा हा एक प्रकारका बाजा। उन्हें अन्न दान करते थे। जब कोगिकका अब चिन्ता तुम्बगुठ महाराष्ट्र ब्राह्मण जातिका एक भेद। जाती रहा, तब वे और भो हरिप्रेममें उन्मत्त होकर हरि तुम्वुर ( म० पु. ) विन्ध्यपर्व त-स्थित जातिभेद, विध्य गुण गान करने लगे। पद्माक्ष भो उस गानको भक्ति पड़ पर रहनवाली एक जाति । ( हरिश ५ अ०) पृषक मवदा सुनते थे। धीरे धीरे कोशिक के सात्रिय, तुम्नग (मो .) तुम्बर प्राकार राति राक ङ.ष वश्य और ब्रह्माकुलोत्पत्र जान पोर विद्याम श्रेष्ठ ७ प्रपंदरादित्व दुत्वं। १ कुक्कुरो, कुतिया।२ धन्धा, शिय हो गये। पद्माक्ष मभोको अवदान देने लगे। उमो दिया। स्थान में मालव नामक विष्णुभक्तिपरायण एक वैद्य रहते तम्ब (मल'. ) १ धन्याक, धनिया। (पु. को०) थे। वे इष्टचित्तसे हरिको प्रतिदिन दोपमाला प्रदान करते २ तपस्वाविशेष, एक तपस्खो का नाम । ३ एक जिन उपा. थे। मालतो नामको उनको पतिव्रता स्त्रो भो प्रोत-मनसे मकका नाम । 6 फन्न वृक्षविशेष । इसका बीज धनिये के हरिक्षेत्र के चारों ओर गोमय लेपन करतो थीं। हरिके श्राकारका पर कु. कुछ फटा हुआ होता है। इसके निमित्त कुथस्थलसे ५. ब्राह्मण आकर कोशिकके कार्य संस्कृत पर्याय-फूलन, मौरज, सौर, बनज, सानुन, चिज, | साधनार्थ वहां रहने लगे। क्रमशः यह गान अत्यन्त