पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६७५

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तुरंगमिष-तुरासार ६६३ सुरणप्रिय (स'. पु.) तुणस्य प्रियः, ६ तत् । यव, जो। तरपाना ( क्रि०)) तुरपपाना देगे। . तुरङ्गम (स'• पु०-सो.) तुर' गच्छति गम्-खच मुम्। तुरपना (हिं कि०) लठियाना। १ घोटक, घोड़ा। २ चित्त। ३ एक हत्तका नाम। तरम् (सं० पश्य० ) तर पम् । खरा, जल्दो। इसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और दो गुण होते है। तुरम (हिं. पु.) तुरहो।। (वि.) शीघ्रगामी, जल्दी चनर्मवाला। तुरमतो (हि.स.) एक चिड़िया जो शाज को तरस तरङ्गमशाला (सं० स्त्रो०) तुरङ्गमस्य शाला ग्र -तत्। शिकार करतो है। इसका पाकार बाजसे छोटा पखशाली, घुड़सार। होता है। तु गम्मेध ( स० पु०) प्रखमेध। तुरमनो (हि..) नारियल रतनको रेती। तरणवत (म पु०) तुरङ्गस्य व वनामस्व । पशमुखा तुरया ( त्रि. ) सूर्ण, शोध, जन्द । कार विवरभेद, धोड़े कासा मुखवाला किवर। तुरस (सलो .) खरा, गोत्र। । तुरङ्गवदन ( म० पु.) तुरणस्थ व वदनमस्य । प्रश्नमुखा तुरस्पेय ( को० ) तुरस-पा-यत् । तूग पेय। कार किवरभेद, घोड़ कासा मुहवाला किवर। तुरहो (हिजो) एक प्रकारका बाजा जो मुंह तुरङ्गारि (म. पु. ) तुरङ्गस्य परिः ६-तत्। १ करवीर, पक कर बनाया जाता है। कनेर । २ महिष, मस। तुरा-पासामके गारोहिल जिलेका एक प्रहर। या तुरनिका ( स० स्त्रो०) तुरगवत् प्राकारोऽस्तास्याः । पक्षा. २५३१ उ० पोर देशा ८०.१४ पू में पर्यास्थान तुरङ्ग ठन्। देवदालो सता, घघरबल। है। लोकसंस्था प्रायः १३७५ है । यहांको पायावा, सुरङ्गिन् ( स० वि०) तुरङ्ग वाहनत्वेन पस्तास्य । तुरङ्ग गरम चोर भस्वास्थकर है। यहां एक छोटा कारागार इन्। भखारोहो, घुड़सवार। . पोर एक अस्पताल है। तुरङ्गी (स. स्त्री० ) तरङ्गस्तत् गन्धोस्तास्याः पच, गोरा- तुराब-एक प्रसिद्ध हिन्दी कवि। इनकी रम- दित्वात् डोष । १ अश्वगन्धा, असगन्ध । जातो डोषः । पक्षको कविता सराहनीय है। उदाहरणार्थ एक भोचे २ प्रखो, घोड़ी। तुग्ण ( स० लो . ) तुर भावे का । क्षिप्र गमन, जल्दीसे ___ "आयोरी आयो बसन्त सुहावन । जानको क्रिया। भावोरीसखियां सब हिलमिलके नए नए रेग्रसों वखन रंगावन । तुरस्य ( स० पु.) तुरण्य कखादित्वात् भावे घन। नईरहार नई ऋतु लागी नई नई नई विसों पियाको रिक्षावन ।' त्वरा, शीध्र । तुरण्यसद (स.वि.) तुरण्य-सद-विप । जो बहुत थक अवको वसमत पिया आगनमें भायो मो घर फाग मचावन ॥ . जाते हों। भई तुराब पिय की कृपा काहे न होरीको धूम मचावन ॥" तुरत ( रिव्य ) तुरायण ( म० क्लो० ) तुर क, तस्य अपत्य। १५सङ्ग । तरत-हिन्दोके एक कवि। ये १७५४ में विद्यमान २ यत्रभेद, एका प्रकारका यह जो चैत्र शुक्ला पञ्चमी और थे। सुजानचरित्र में इनका नाम आया है। बैशाख मा ५मोको होता है । ३ परायण, पामता, सुरपई (हि. स्त्री०) एक प्रकारको सिलाई। लोनता। तुरपन (हिं. स्त्रो.) एक प्रकारको सिलाई। इसमें तरावत् (हिं० वि० ) वेगयुक्त, वेगवाला। जोड़ोंको पहले लम्बाई के बल टांके डाल कर मिला लेते स गवतो (हिं० वि० ) वेगवालो, झोंबके साथ है, फिर निकले हुए छोरको मोड़ कर तिछे टांकोंसे बहनेवालो। जमा देते है । लुढ़ियावन। तु रावान (हि. वि. ) तुरावत् देखो। तरपवाना (हिं.वि.) तरपाना, हरपानका काम तुराबाट (स.पु.) इन्द्र। • दूसरसे करामा। ... तरामा (स.पु.) तर त्वरित माध्यति सम-विष. चटपट।